पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन–2 / अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सन्दर्भ
- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की मोल्दोवा की आधिकारिक यात्रा के दौरान भारत और मोल्दोवा ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (UNSC) सहित बहुपक्षीय संगठनों में सुधारों पर चर्चा की।
परिचय
- वर्ष 1992 में दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना के बाद पूर्वी यूरोप के स्थलरुद्ध (Landlocked) देश मोल्दोवा की यह किसी भारतीय राष्ट्राध्यक्ष की पहली यात्रा है।
- दोनों देश डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, नवाचार, खाद्य प्रसंस्करण, रसद (लॉजिस्टिक्स) तथा कौशल विकास के क्षेत्रों में भी सहयोग की संभावनाओं का पता लगा रहे हैं।
- पूर्वी यूरोप के प्रति भारत की सक्रियता का उद्देश्य फ्रांस और जर्मनी जैसी प्रमुख पश्चिमी यूरोपीय शक्तियों से आगे बढ़कर यूरोप के साथ अपने संबंधों में विविधता लाना है।
- आगामी दिनों में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु उत्तरी मैसिडोनिया तथा रोमानिया की भी यात्रा करेंगी।
मोल्दोवा का परिचय
- मोल्दोवा चारों ओर से ज़मीन से घिरा हुआ देश है, जिसकी सीमाएँ यूक्रेन और रोमानिया से लगती हैं। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद यह एक स्वतंत्र गणराज्य के रूप में उभरा।
- मोल्दोवा कार्पेथियन पर्वतों की विशाल चाप(great arc) के पूर्व में स्थित है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद्
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (UNSC) संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख अंगों में से एक है, जो अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने के लिए उत्तरदायी है।
- इसकी स्थापना वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अंतर्गत की गई थी। इसमें 15 सदस्य देश होते हैं, जिनमें वीटो शक्ति वाले पाँच स्थायी सदस्य—चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम तथा संयुक्त राज्य अमेरिका।
- संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा दो वर्ष के कार्यकाल के लिए निर्वाचित 10 अस्थायी सदस्य शामिल होते हैं।
- इसका मुख्यालय न्यूयॉर्क नगर में स्थित है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में सुधारों की आवश्यकता
- वर्तमान संरचना: सुरक्षा परिषद् की वर्तमान संरचना में कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों का अपर्याप्त अथवा बिल्कुल प्रतिनिधित्व नहीं है।
- संघर्षों का समाधान करने में अक्षमता: वर्तमान संरचना के कारण परिषद् अनेक गंभीर संघर्षों का प्रभावी समाधान करने तथा अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने में सक्षम नहीं रही है।
- विश्व व्यवस्था में परिवर्तन: वर्ष 1945 के बाद विश्व व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। इसलिए इन नई वास्तविकताओं का प्रतिबिंब सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता में भी दिखाई देना चाहिए।
- वीटो शक्ति: वर्तमान में केवल पाँच स्थायी सदस्यों के पास वीटो शक्ति है। इसके प्रयोग के कारण यूक्रेन तथा गाज़ा जैसे वैश्विक संकटों और संघर्षों पर परिषद् की प्रभावी कार्रवाई कई बार बाधित हुई है।
- परिषद् के शेष 10 सदस्य केवल दो वर्ष के लिए अस्थायी सदस्य चुने जाते हैं तथा उन्हें वीटो शक्ति प्राप्त नहीं होती।
- वैधता: पाँच स्थायी सदस्यों, विशेषकर उनकी वीटो शक्ति, के पास असंतुलित अधिकार होने से परिषद् की निष्पक्षता और वैधता पर प्रश्न उठते हैं।
स्थायी सदस्यता के लिए भारत के दावे को मजबूत करने वाले कारक
- वैश्विक जनसंख्या एवं प्रतिनिधित्व: भारत विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है तथा विश्व की लगभग 18% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है।
- इतनी बड़ी जनसंख्या के कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् जैसे वैश्विक निर्णयकारी निकायों में भारत का अनुपातिक प्रतिनिधित्व उचित है।
- आर्थिक महाशक्ति: भारत सकल घरेलू उत्पाद (नाममात्र) तथा क्रय शक्ति समता (PPP) के आधार पर विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है।
- भारत की आर्थिक शक्ति वैश्विक स्थिरता एवं विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है, जो सुरक्षा परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य के अनुरूप है।
- शांति स्थापना के प्रति प्रतिबद्धता: भारत संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना अभियानों में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक रहा है, जो वैश्विक शांति एवं सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
- सामरिक महत्त्व: भारत दक्षिण एशिया तथा व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भू-राजनीतिक स्थिति रखता है।
- इसका प्रभाव क्षेत्रीय सीमाओं से आगे तक फैला हुआ है, जिससे आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन तथा समुद्री सुरक्षा जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने में इसकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
- लोकतांत्रिक मूल्य: विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत बहुलवाद, सहिष्णुता तथा समावेशिता के सिद्धांतों का पालन करता है, जो संयुक्त राष्ट्र की मूल भावना के अनुरूप हैं।
- सदस्य देशों का समर्थन: भारत को संयुक्त राष्ट्र के अनेक सदस्य देशों का व्यापक समर्थन प्राप्त है। यह समर्थन वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका तथा सुरक्षा परिषद् की क्षमता को सुदृढ़ करने में उसके संभावित योगदान की मान्यता को दर्शाता है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में सुधार लागू करने की सीमाएँ
- स्थायी सदस्यों की वीटो शक्ति: सुरक्षा परिषद् की संरचना या कार्यप्रणाली में किसी भी प्रकार के सुधार के लिए पाँचों स्थायी सदस्यों की स्वीकृति आवश्यक होती है।
- इन देशों के हित एक-दूसरे से भिन्न हैं और वे ऐसे परिवर्तनों का समर्थन करने से हिचकिचाते हैं, जिनसे परिषद् में उनका प्रभाव कम हो सकता है।
- क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरण: क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता तथा भू-राजनीतिक तनाव परिषद् में सुधार के प्रयासों को जटिल बना देते हैं।
- सुधार प्रक्रिया की जटिलता: संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन के लिए बड़ी संख्या में सदस्य देशों द्वारा अनुमोदन आवश्यक होता है। यह प्रक्रिया लंबी एवं जटिल होने के कारण सार्थक सुधारों को लागू करना कठिन हो जाता है।
- चीन का विरोध: सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य होने के कारण चीन भारत की स्थायी सदस्यता के प्रयासों में प्रमुख बाधा बना हुआ है।
आगे की राह
- यह आवश्यक है कि सुरक्षा परिषद् की स्थायी एवं अस्थायी दोनों प्रकार की सदस्यता आज की विश्व व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करे, न कि केवल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों का।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में सुधार उसकी प्रासंगिकता, वैधता तथा प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं, ताकि वह 21वीं शताब्दी की जटिल वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके।
- तथापि, इन सुधारों पर संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के बीच सर्वसम्मति प्राप्त करना अब भी एक कठिन तथा निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
स्रोत: IE
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