लद्दाख के सभी सात जिलों में स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदों का गठन 

पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • गृह मंत्रालय तथा लद्दाख के नेताओं के बीच अनुच्छेद 371 के अंतर्गत केंद्रशासित प्रदेश को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करने संबंधी सैद्धांतिक सहमति बनने के बाद लद्दाख प्रशासन ने सभी सात जिलों में स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदों के गठन का निर्णय लिया है।

पृष्ठभूमि

  • वर्ष 2019 में लद्दाख को विधानसभा रहित केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा प्रदान किया गया।
  • पाँच नए जिलों के गठन के बाद वर्तमान में लद्दाख में कुल सात जिले हैं—
    • लेह,
    • कारगिल,
    • शाम,
    • नुब्रा,
    • ज़ांस्कर,
    • द्रास,
    • चांगथांग।
  • अब तक केवल लेह एवं कारगिल में ही निर्वाचित स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदें कार्यरत थीं।

स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदों के बारे में

  • स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदें निर्वाचित स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ हैं, जिनकी स्थापना लद्दाख के भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम एवं सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र में विकेंद्रीकृत प्रशासन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई है।
  • ये परिषदें लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद अधिनियम (LAHDC अधिनियम) के अंतर्गत कार्य करती हैं।
  • LAHDC अधिनियम की धारा 3(1) के अनुसार, प्रत्येक जिले में राजपत्र में प्रकाशित सरकारी अधिसूचना के माध्यम से एक परिषद का गठन किया जा सकता है।
  • नई परिषदों को निम्नलिखित प्रमुख शक्तियाँ प्राप्त होंगी—
    • भूमि के स्वामित्व एवं आवंटन का अधिकार,
    • जिला संवर्ग के कर्मचारियों की भर्ती एवं पदोन्नति,
    • जिला विकास योजनाओं का निर्माण,
    • स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन, स्थानीय अवसंरचना तथा सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों का प्रशासन।
  • प्रत्येक परिषद का अपना पृथक परिषद निधि होगी तथा उसे विधि के अनुसार कर, शुल्क एवं अन्य प्रभार अधिरोपित करने का अधिकार भी प्राप्त होगा।

AHDC और छठी अनुसूची के अंतर्गत स्वायत्त परिषदों के बीच अंतर

स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदें (AHDCs) छठी अनुसूची के अंतर्गत स्वायत्त जिला परिषदें (ADCs) 
संसद अथवा केंद्रशासित प्रदेश के अधिनियम द्वारा स्थापित। संविधान के अनुच्छेद 244(2) एवं अनुच्छेद 275(1) के अंतर्गत संवैधानिक दर्जा प्राप्त। 
केवल लद्दाख में लागू। असम, मेघालय, मिजोरम एवं त्रिपुरा के अधिसूचित जनजातीय क्षेत्रों में लागू। 
मुख्यतः प्रशासनिक एवं विकासात्मक कार्यों का निर्वहन करती हैं। विधायी, न्यायिक, कार्यपालिका तथा वित्तीय शक्तियों का प्रयोग करती हैं। 
न्यायिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं। परंपरागत जनजातीय कानूनों के आधार पर स्थानीय विवादों के निपटारे हेतु ग्राम न्यायालयों की स्थापना कर सकती हैं। 

अनुच्छेद 371 एवं विशेष संवैधानिक संरक्षण

  • संविधान का अनुच्छेद 371 कुछ राज्यों एवं क्षेत्रों को विशेष संवैधानिक संरक्षण तथा स्वायत्तता प्रदान करता है, ताकि उनकी स्वदेशी संस्कृति, जनजातीय पहचान, प्रथागत विधियों, भूमि स्वामित्व, स्थानीय रोजगार तथा प्रशासनिक स्वायत्तता का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
  • संविधान के भाग-XXI में इन विशेष प्रावधानों का उल्लेख किया गया है, जिनमें अनुच्छेद 371A से 371J तक विभिन्न राज्यों एवं क्षेत्रों के लिए विशेष व्यवस्थाएँ की गई हैं।

महत्त्व

  • सीमावर्ती क्षेत्रों का प्रशासन: लद्दाख के अनेक जिले भारत की चीन (तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र) तथा पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्रों से लगी सीमाओं पर स्थित होने के कारण सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
    • सुदृढ़ स्थानीय प्रशासन से सीमावर्ती अवसंरचना, सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता तथा प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार होगा।
  • क्षेत्र-विशिष्ट योजना निर्माण: लद्दाख में अत्यधिक शीत मरुस्थल, उच्च हिमालयी चारागाह, हिमनदों से पोषित नदी घाटियाँ तथा सीमावर्ती गाँव जैसे विविध पारिस्थितिक क्षेत्र विद्यमान हैं।
    • जिला स्तर पर योजना निर्माण से स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप नीतियाँ तैयार करना अधिक प्रभावी होगा।
  • बुनियादी स्तर पर सुशासन: निर्णय-निर्माण की शक्तियाँ स्थानीय समुदायों को प्राप्त होने से विकास संबंधी प्राथमिकताओं की बेहतर पहचान संभव होगी।
    • इससे सरकारी परियोजनाओं का क्रियान्वयन अधिक तीव्र एवं प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा।

चुनौतियाँ

  • संवैधानिक संरक्षण की व्यापक माँगें: यह प्रस्ताव छठी अनुसूची के अंतर्गत संरक्षण, पूर्ण राज्य का दर्जा तथा विधानसभा की स्थापना जैसी माँगों का पूर्णतः समाधान नहीं करता।
    • लद्दाख की जनसंख्या का एक वर्ग अभी भी इन माँगों को निरंतर उठाता रहा है।
  • संस्थागत अधिकार-क्षेत्र का संभावित अतिव्यापन: प्रस्तावित केंद्रशासित प्रदेश स्तरीय निर्वाचित निकाय, स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदें (AHDCs) तथा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) के कार्यों एवं अधिकारों में स्पष्ट सीमांकन न होने की स्थिति में उनके अधिकार-क्षेत्र में अतिव्यापन की संभावना बनी रह सकती है।

Source: HT, IE

 

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