पाठ्यक्रम: जीएस-1/ भूगोल
सन्दर्भ
- महाराष्ट्र में मूसलाधार मानसूनी वर्षा देखने को मिली, जिससे भूस्खलन और संरचनात्मक ध्वंस की घटनाएँ हुईं तथा पूरे राज्य में सड़क एवं संपर्क व्यवस्था बाधित हो गई।
भूस्खलन क्या है?
- भूस्खलन किसी ढाल पर चट्टानों, मिट्टी अथवा मलबे जैसे पदार्थों का सामूहिक रूप से नीचे की ओर खिसकना है। यह अचानक भी हो सकता है या लंबे समय में धीरे-धीरे भी घटित हो सकता है।
- जब किसी ढाल पर कार्य करने वाला गुरुत्वाकर्षण बल, उस ढाल का प्रतिरोध करने वाले बलों से अधिक हो जाता है, तब ढाल विफल हो जाती है और भूस्खलन होता है। भूस्खलन होने के पीछे कई बाहरी कारक हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं:
- अत्यधिक वर्षा, जिससे भूमि जलसंतृप्त (Saturated) हो जाती है।
- ढाल के आधार का अपरदन।
- अपक्षय (Weathering) के कारण पदार्थ की मजबूती में परिवर्तन।

भारत में भूस्खलन से संबंधित प्रमुख तथ्य
- भारत भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्र (ILSM) के अनुसार, भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 13.17% भाग भूस्खलन-प्रवण है, जबकि 4.75% क्षेत्र ‘अत्यधिक उच्च संवेदनशीलता’ श्रेणी में आता है।
- हिमालय, पूर्वोत्तर राज्य तथा पश्चिमी घाट देश के प्रमुख भूस्खलन हॉटस्पॉट हैं।
- सिक्किम में भूस्खलन-प्रवण क्षेत्र का सर्वाधिक हिस्सा (57.6%) है, जबकि केरल, हिमालयी क्षेत्र से बाहर होने के बावजूद, अपने लगभग 14% क्षेत्रफल के साथ ‘अत्यधिक उच्च संवेदनशीलता’ श्रेणी में आता है।
- विश्व स्तर पर भूस्खलन से होने वाली कुल मृत्यु का लगभग 8% भारत में होता है।
- भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों का मानचित्रण तथा भूस्खलन जोखिम (Hazard) का आकलन करने वाली प्रमुख संस्था भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) है।

भूस्खलन के प्रमुख कारण
- भूस्खलन का सामान्यतः कोई एक कारण नहीं होता; यह प्रायः प्राकृतिक संवेदनशीलता तथा मानवीय हस्तक्षेप के संयुक्त प्रभाव का परिणाम होता है।
- हिमालयी क्षेत्रों में युवा एवं विवर्तनिक रूप से सक्रिय पर्वत, जलविद्युत परियोजनाएँ, सड़कों का चौड़ीकरण, सुरंग निर्माण, तीव्र वर्षा तथा बादल फटने जैसी घटनियाँ प्रमुख कारण हैं।
- पश्चिमी घाट, यद्यपि भूवैज्ञानिक दृष्टि से हिमालय की तुलना में अधिक प्राचीन एवं स्थिर है, फिर भी भारी मानसूनी वर्षा, खनन, पत्थर खनन, पर्यटन तथा अव्यवस्थित निर्माण गतिविधियाँ भूस्खलन के जोखिम को बढ़ाती हैं।
भूस्खलन जोखिम को कम करने हेतु उठाए गए कदम
- राष्ट्रीय भूस्खलन पूर्वानुमान केंद्र (NLFC): भूस्खलन के पूर्वानुमान तथा समयपूर्व चेतावनी प्रणाली को सुदृढ़ करने के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) द्वारा कोलकाता में इसकी स्थापना की गई।
- भूसंकेत पोर्टल एवं भूस्खलन ऐप: ये मंच वास्तविक समय (Real-time) में भूस्खलन के पूर्वानुमान उपलब्ध कराते हैं तथा भूस्खलन की घटनाओं की रिपोर्टिंग की सुविधा प्रदान करते हैं।
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशानिर्देश: भूस्खलन एवं हिमस्खलन (Snow Avalanches) के प्रभावी प्रबंधन के लिए व्यापक दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।
- राष्ट्रीय भूस्खलन जोखिम प्रबंधन रणनीति: इसका मुख्य ध्यान जोखिम मानचित्रण, निगरानी, पूर्व चेतावनी प्रणाली, जन-जागरूकता, क्षमता निर्माण तथा ढालों के स्थिरीकरण पर केंद्रित है।
- सेंडाई फ्रेमवर्क (2015–2030): भारत आपदा जोखिम न्यूनीकरण तथा आपदा-प्रतिरोधक क्षमता (Resilience) के निर्माण के लिए इस वैश्विक रूपरेखा का अनुसरण करता है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) क्या कहता है?
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने एक स्पष्ट कार्य-योजना प्रस्तुत की है:
- भूस्खलन जोखिम क्षेत्रीकरण (Landslip Hazard Zonation—LHZ) मानचित्र तैयार किए जाएँ, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
- भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) को समय के साथ रुझानों तथा जोखिम की निगरानी के लिए राष्ट्रीय भूस्खलन डेटाबेस का रखरखाव करना चाहिए।
- ढालों को भौतिक रूप से स्थिर बनाने के लिए रिटेनिंग दीवारें, रॉक बोल्टिंग, तार-जाल (Wire Mesh) तथा वनस्पति आवरण का उपयोग किया जा सकता है।
- जल निकासी व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाए, ताकि पानी एकत्र होकर ढाल के भीतर न रिसे।
आगे की राह
- पश्चिमी घाट में पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र (ESA) फ्रेमवर्क को अधिसूचित कर प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, ताकि खनन, पत्थर खनन तथा बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं को विनियमित किया जा सके।
- पर्वतीय क्षेत्रों में विस्तृत भूस्खलन जोखिम क्षेत्रीकरण (Landslide Hazard Zonation—LHZ) मानचित्रों के आधार पर भूमि-उपयोग क्षेत्रीकरण (Land-use Zoning) को अनिवार्य बनाया जाए।
- संवेदनशील क्षेत्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित सेंसर तथा समयपूर्व चेतावनी प्रणालियाँ (Early Warning Systems) स्थापित की जाएँ, ताकि लोगों को समय पर चेतावनी मिल सके।
- संवेदनशील ढालों की निरंतर निगरानी के लिए ड्रोन, लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग (LiDAR) तकनीक तथा उपग्रह चित्रों का उपयोग किया जाए।
- वनीकरण तथा अन्य प्रकृति-आधारित समाधानों (Nature-based Solutions) को प्राथमिकता दी जाए। अनेक मामलों में ये कंक्रीट आधारित उपायों की तुलना में अधिक किफायती और दीर्घकालिक रूप से अधिक टिकाऊ सिद्ध होते हैं।
स्रोत: TH
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