स्टार्ट-अप से स्केल-अप तक: भारत को वैश्विक कॉर्पोरेट चैंपियनों की आवश्यकता क्यों है?

पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था 

सन्दर्भ

  • हाल ही में भारतीय कंपनियों जैसे रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (RIL) और अमूल ने उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कीं, किन्तु वे अभी भी वैश्विक स्तर पर प्रभुत्वशाली, नवाचार-संचालित तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था के उच्च-लाभ वाले क्षेत्रों में पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हैं।
  • रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड 10 अरब डॉलर से अधिक का लाभ अर्जित करने वाली पहली भारतीय कंपनी बन गई।
  • अमूल 1 लाख करोड़ रुपये (₹1 ट्रिलियन) का कारोबार (Turnover) करने वाली भारत की पहली एफएमसीजी (FMCG) कंपनी बन गई।

भारत में स्टार्ट-अप: प्रमुख विशेषताएँ

  • उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के अनुसार, स्टार्टअप इंडिया पहल के अंतर्गत 1.6 लाख से अधिक स्टार्ट-अप को मान्यता प्रदान की जा चुकी है।
  • अमेरिका और चीन के बाद भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप पारितंत्र (Ecosystem) है।
  • भारत में 100 से अधिक यूनिकॉर्न (ऐसे स्टार्ट-अप जिनका मूल्यांकन 1 अरब डॉलर से अधिक हो) विकसित हो चुके हैं।
  • हाल के वर्षों में फिनटेक, एडटेक, ई-कॉमर्स, SaaS, हेल्थ-टेक तथा डीप-टेक क्षेत्रों में तीव्र वृद्धि देखी गई है।
  • अनेक स्टार्ट-अप विकसित करने में सफलता के बावजूद, भारत वैश्विक स्तर पर प्रभुत्वशाली कंपनियाँ विकसित करने में पीछे है।

वैश्विक तुलना: भारत बनाम अन्य अर्थव्यवस्थाएँ

  • जहाँ भारत वैश्विक स्तर की अग्रणी कंपनियाँ विकसित करने में पीछे रह गया है, वहीं अनेक स्टार्ट-अप विकसित करने में उसने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है।
पैरामीटरभारत यूएसएचीन South Korea
वैश्विक कॉर्पोरेट दिग्गज (Giants)बहुत कमअनेक (एप्पल,माइक्रोसॉफ्ट,NVIDIA) अलीबाबा,टेनसेंट(Tencent), BYDसैमसंग, एसके हाइनिक्स(SK Hynix)
अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय (GDP का %)1% से कम~3.5%~2.5%~5%
उच्च-लाभ वाली प्रौद्योगिकी कंपनियाँसीमितव्यापकतीव्र गति से बढ़ रहीमजबूत
वैश्विक ब्रांडबहुत कममजबूत वैश्विक उपस्थितिविस्तारशीलस्थापित
  • अमेरिका और चीन के विपरीत, भारतीय कंपनियाँ मुख्यतः घरेलू बाजार पर निर्भर हैं। ब्रांड, पेटेंट तथा बौद्धिक संपदा (IP) के माध्यम से वैश्विक मूल्य का दोहन (Capture) सीमित है।

भारतीय स्टार्ट-अप से जुड़ी समस्याएँ

  • अधिकता की समस्या (Problem of Plenty): भारत में स्टार्ट-अप की संख्या बहुत अधिक है, किन्तु उनमें से बहुत कम वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कंपनियों के रूप में विकसित हो पाते हैं। अर्थात संख्या अधिक है, परन्तु उनका विस्तार सीमित है।
  • घरेलू बाजार की ओर झुकाव: अधिकांश कंपनियाँ भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार पर केंद्रित रहती हैं, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी हिस्सेदारी तथा मूल्य-निर्धारण क्षमता (Pricing Power) सीमित रहती है।
  • उच्च-लाभ वाले क्षेत्रों में कंपनियों का अभाव: सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), विनिर्माण तथा जैव-प्रौद्योगिकी जैसे अग्रणी प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में भारत की बहुत कम कम्पनियाँ हैं। आज भी वैश्विक लाभ का अधिकांश भाग अन्य देशों में स्थित कंपनियों को प्राप्त होता है।
  • अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर कम व्यय: भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 1 प्रतिशत से भी कम R&D पर व्यय करता है, जो अन्य अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत कम है और नवाचार को बाधित करता है।
  • धैर्यपूर्ण पूंजी (Patient Capital) का अभाव: डीप-टेक और अनुसंधान-आधारित उद्यमों के लिए दीर्घकालिक पूंजी आवश्यक होती है, किन्तु भारत में उद्यम पूंजी (Venture Capital) का ध्यान त्वरित लाभ पर अधिक रहता है, नवाचार पर नहीं।

भारत को स्टार्ट-अप नहीं, बल्कि स्केल-अप की आवश्यकता क्यों है?

  • उत्पादकता : बड़ी कंपनियाँ अनुसंधान एवं विकास, प्रौद्योगिकी तथा अनुपालन की स्थिर लागतों को अधिक उत्पादन मात्रा पर विभाजित कर देती हैं, जिससे प्रति इकाई लागत कम हो जाती है।
  • नवाचार: क्रांतिकारी नवाचार के लिए धैर्यपूर्ण पूंजी (Patient Capital), कुशल मानव संसाधन, जोखिम उठाने की क्षमता तथा व्यापक R&D की आवश्यकता होती है।
  • बड़ी कंपनियों के पास ये सभी क्षमताएँ होती हैं।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता: वैश्विक कॉर्पोरेट दिग्गजों के पास मजबूत ब्रांड, बौद्धिक संपदा (IP), सीमापार आपूर्ति श्रृंखला नेटवर्क तथा मूल्य-निर्धारण क्षमता होती है। ये सभी क्षमताएँ देशों को वैश्विक लेन-देन से अधिक मूल्य अर्जित करने में सहायता करती हैं।
  • रोज़गार सृजन : उच्च राजस्व वाली कंपनियाँ प्रत्यक्ष रोजगार सृजित करने के साथ-साथ आपूर्तिकर्ता पारितंत्र (Supplier Ecosystem), लॉजिस्टिक्स अवसंरचना तथा संबंधित उद्योगों का भी विकास करती हैं।
  • राजकोषीय प्रभाव : अत्यधिक लाभ अर्जित करने वाली कंपनियाँ करों के माध्यम से सरकार को बड़ी मात्रा में राजस्व प्रदान करती हैं। इससे सामाजिक व्यय हेतु सरकार की वित्तीय क्षमता सुदृढ़ होती है।
  • रणनीतिक एवं प्रौद्योगिकीय संप्रभुता: देशों के बीच प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा के इस दौर में, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), हरित ऊर्जा तथा रक्षा विनिर्माण जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू कंपनियों का होना आवश्यक है।

संबंधित सरकारी पहलें

  • स्टार्टअप इंडिया (2016): कर प्रोत्साहन , स्व-प्रमाणीकरण तथा फंड ऑफ फंड्स  की व्यवस्था।
  • डिजिटल इंडिया: डिजिटल अवसंरचना को सुदृढ़ किया तथा बाजार तक पहुँच को बेहतर बनाया।
  • उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करती है।
  • अटल नवाचार मिशन (AIM): नवाचार तथा उद्यमिता को बढ़ावा देता है।
  • राष्ट्रीय डीप-टेक स्टार्टअप नीति (विचाराधीन): अग्रणी प्रौद्योगिकियों पर विशेष ध्यान।

आगे की राह: भारत के वैश्विक कॉर्पोरेट दिग्गजों का विकास

  • R&D व्यय में वृद्धि: सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास व्यय को बढ़ाकर GDP के कम-से-कम 2 प्रतिशत तक किया जाए।
  • डीप-टेक इकोसिस्टम का विकास: AI, सेमीकंडक्टर, जैव-प्रौद्योगिकी तथा उन्नत विनिर्माण से जुड़े उद्यमों को दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराया जाए।
  • मजबूत बौद्धिक संपदा प्रणाली: पेटेंट सृजन, उनके व्यावसायीकरण (Monetisation) तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को प्रोत्साहित किया जाए।
  • व्यवसायों के विस्तार (Scale-up) को सरल बनाना: नियमों को सरल बनाया जाए तथा विभिन्न राज्यों की नीतियों का मानकीकरण किया जाए, जिससे अनुपालन लागत कम हो।
  • वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में गहरा एकीकरण: केवल असेंबली तक सीमित न रहकर डिज़ाइन, ब्रांडिंग तथा प्रौद्योगिकी नियंत्रण की दिशा में आगे बढ़ा जाए।
  • उद्यमों के प्रति सकारात्मक धारणा विकसित करना: प्रतिस्पर्धा तथा नवाचार के माध्यम से अर्जित लाभ को आर्थिक विकास, रोजगार सृजन तथा राष्ट्रीय विकास की अनिवार्य आवश्यकता के रूप में देखा जाना चाहिए।
  • वैश्विक विस्तार में सहायता: सरकार की कूटनीतिक, व्यापारिक तथा वित्तीय नीतियाँ भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजार में अधिक हिस्सेदारी प्राप्त करने में सक्षम बनाएँ।

निष्कर्ष

  • भारत एक गतिशील स्टार्ट-अप इकोसिस्टम विकसित करने में सफल रहा है। किन्तु विकास के अगले चरण के लिए ऐसी वैश्विक प्रतिस्पर्धी कंपनियों की आवश्यकता है, जिनके पास विशाल लाभ क्षमता (Profit Pools), मजबूत ब्रांड तथा प्रौद्योगिकीय श्रेष्ठता हो।
  • विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत को केवल यूनिकॉर्न की सफलता तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सैमसंग, एप्पल या NVIDIA जैसी वैश्विक कॉर्पोरेट चैंपियन कंपनियों का विकास करना होगा।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न 
[प्रश्न] भारत में वैश्विक कॉर्पोरेट चैंपियनों के उभरने में बाधा डालने वाली संरचनात्मक चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। चर्चा कीजिए कि सतत आर्थिक विकास तथा विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लिए भारत को ऐसी कंपनियों की आवश्यकता क्यों है।

स्रोत: IE

 

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