पनडुब्बी केबलें: डिजिटल युग की महत्त्वपूर्ण आधारभूत संरचना 

पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान और प्रौद्योगिकी

संदर्भ

  • ब्रिटिश साम्राज्य की “ऑल-रेड लाइन “ ने संचार नेटवर्कों के सामरिक महत्व को प्रदर्शित किया था। वर्तमान समय में यही भूमिका डिजिटल विश्व को जोड़ने वाली अंडर-सी फाइबर-ऑप्टिक केबलें निभा रही हैं।

अंडर-सी टेलीग्राफ केबलें क्या थीं?

  • अंडर-सी टेलीग्राफ केबलें ऐसी इन्सुलेटेड संचार तारें थीं जिन्हें महासागरों के तल पर बिछाया जाता था ताकि समुद्रों के पार टेलीग्राफ संदेशों का संचार किया जा सके।
  • इन्होंने लंबी दूरी के संचार में क्रांतिकारी परिवर्तन लाते हुए संदेश प्रेषण का समय सप्ताहों अथवा महीनों से घटाकर कुछ मिनटों तक सीमित कर दिया।
  • ये वर्तमान की फाइबर-ऑप्टिक पनडुब्बी केबलों की पूर्ववर्ती तकनीक थीं, जिनके माध्यम से आज अधिकांश वैश्विक इंटरनेट यातायात संचालित होता है।
  • वर्ष 1851 में सबमरीन टेलीग्राफ कंपनी द्वारा इंग्लिश चैनल के आर-पार विश्व की प्रथम सफल अंडर-सी टेलीग्राफ केबल बिछाई गई।

“ऑल-रेड लाइन” का उद्भव

  • उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटेन ने अपने उपनिवेशों में समुद्रतलीय टेलीग्राफ केबलों का एक विशाल नेटवर्क स्थापित किया।
    • इस नेटवर्क को “ऑल-रेड लाइन” कहा गया क्योंकि मानचित्रों में ब्रिटिश उपनिवेशों को लाल रंग से दर्शाया जाता था।
  • इस नेटवर्क ने ब्रिटिश साम्राज्य के विभिन्न भागों को आपस में जोड़ा तथा ब्रिटेन को अपने उपनिवेशों के साथ तीव्र संचार की सुविधा प्रदान की।
  • प्रतिद्वंद्वी शक्तियों पर निर्भरता से बचने के लिए यह नेटवर्क ब्रिटिश नियंत्रण वाले क्षेत्रों से होकर गुज़रता था।
  • केबलों को जिब्राल्टर जलडमरूमध्य से भूमध्य सागर में, वहाँ से माल्टा और स्वेज नहर के माध्यम से लाल सागर तक तथा आगे हिंद महासागर से होकर बम्बई (मुंबई) और हांगकांग तक विस्तारित किया गया था।

अंडर-सी केबलों से जुड़ी प्रमुख संवेदनशीलताएँ

  • अवसंरचना का संकेंद्रण: अनेक सबमरीन केबलें समुद्र तल पर समान मार्गों से होकर गुजरती हैं, जिससे विफलता के एकल एवं अत्यधिक जोखिमपूर्ण बिंदु उत्पन्न हो जाते हैं।
  • मरम्मत कार्यों में कठिनाई: क्षतिग्रस्त सबमरीन केबलों की मरम्मत हेतु विशेष जहाजों, तकनीकी विशेषज्ञता तथा अंतरराष्ट्रीय समन्वय की आवश्यकता होती है।
    • सैन्य तनाव अथवा समुद्री संघर्षों की स्थिति में मरम्मत कार्य अधिक जटिल हो जाते हैं।
  • विधिक एवं नियामकीय अस्पष्टता: जानबूझकर केबलों को क्षति पहुँचाने से संबंधित अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढाँचे अभी भी कमजोर एवं अस्पष्ट हैं, विशेषकर हाइब्रिड वॉरफ़ेयर अथवा ग्रे-ज़ोन संघर्षों की परिस्थितियों में।

भारत का अंडर-सी केबल नेटवर्क

  • भारत वैश्विक समुद्रतलीय केबल नेटवर्क का एक महत्त्वपूर्ण भागीदार है। भारत के पास 17 अंतरराष्ट्रीय समुद्रतलीय केबलें तथा 14 लैंडिंग स्टेशन हैं, जो मुख्यतः मुंबई और चेन्नई जैसे शहरों में स्थित हैं।
    • वर्ष 2022 के अंत तक इन केबलों की कुल प्रकाशमान क्षमता 138.606 Tbps तथा सक्रिय क्षमता 111.111 Tbps थी।
  • भारत कई अंतरराष्ट्रीय समुद्रतलीय केबलों के माध्यम से वैश्विक नेटवर्क से जुड़ा हुआ है, जिनमें प्रमुख हैं—
    • SMW4 (दक्षिण-पूर्व एशिया–मध्य पूर्व–पश्चिमी यूरोप 4)
    • IMEWE (भारत–मध्य पूर्व–पश्चिमी यूरोप)

भारत की अंडर-सी केबल संबंधी तकनीकी कमियाँ

  • विधिक सुरक्षा का अभाव: भारत के पास अपने प्रादेशिक जल एवं विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में समुद्रतलीय केबलों की सुरक्षा हेतु स्पष्ट कानूनी तंत्र का अभाव है।
    • ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने UNCLOS के अंतर्गत “केबल सुरक्षा क्षेत्र “ स्थापित किए हैं।
    • भारत ने अभी तक ऐसे क्षेत्रों को अधिसूचित नहीं किया है, जिसके कारण इसकी केबलें आकस्मिक तथा दुर्भावनापूर्ण दोनों प्रकार की क्षति के प्रति संवेदनशील बनी हुई हैं।
  • परिचालन तत्परता की कमी: भारत के पास स्वदेशी केबल मरम्मत पोत नहीं हैं।
    • रखरखाव के लिए विदेशी जहाजों पर निर्भरता के कारण क्षति होने पर पुनर्स्थापना कार्य में पर्याप्त विलंब होता है।
  • निगरानी संबंधी कमी: समुद्रतलीय केबल नेटवर्क की वास्तविक समय निगरानी हेतु पर्याप्त अवसंरचना उपलब्ध नहीं है।
    • इससे व्यवधानों की समय पर पहचान और त्वरित प्रतिक्रिया में कठिनाई उत्पन्न होती है।

सबमरीन केबल प्रत्यास्थता हेतु अंतरराष्ट्रीय सलाहकार निकाय

  • इसकी स्थापना वर्ष 2024 में अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) तथा अंतरराष्ट्रीय केबल संरक्षण समिति (ICPC) की साझेदारी में की गई।
    • इस पहल का उद्देश्य सब मरीन केबलों की प्रत्यास्थता को सुदृढ़ करना है।
  • यह निकाय बढ़ते डेटा यातायात, पुरानी होती अवसंरचना तथा पर्यावरणीय खतरों से संबंधित चुनौतियों के समाधान हेतु रणनीतिक मार्गदर्शन भी प्रदान करेगा।

अंतरराष्ट्रीय केबल संरक्षण समिति (ICPC)

  • ICPC की स्थापना वर्ष 1958 में की गई थी।
  • यह समुद्रतलीय केबल उद्योग से जुड़े सरकारों एवं व्यावसायिक संस्थाओं का एक वैश्विक मंच है।
  • इसका प्रमुख उद्देश्य तकनीकी, कानूनी तथा पर्यावरणीय जानकारी के आदान-प्रदान हेतु मंच प्रदान कर समुद्रतलीय केबलों की सुरक्षा को सुदृढ़ करना है।

स्रोत: IE, ITU, PIB

 

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