पाठ्यक्रम: GS2/स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे
संदर्भ
- आयुष्मान भारत स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों (HWCs) तथा आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) की प्रभावशीलता ने एक बार फिर सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) के क्षेत्र में भारत की जनस्वास्थ्य नीतियों की सफलता पर प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं।
भारत में जनस्वास्थ्य : एक परिचय
- भारत की जनस्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना है, जिसमें निवारक, प्रोत्साहक तथा उपचारात्मक सेवाओं पर विशेष बल दिया जाता है।
- यह व्यवस्था राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों, राज्य स्तरीय पहलों तथा स्थानीय स्वास्थ्य सेवा वितरण तंत्र के माध्यम से संचालित होती है।
- भारत में संक्रामक एवं गैर-संचारी रोगों के दोहरे भार तथा स्वास्थ्य संबंधी व्यापक असमानताओं के कारण जनस्वास्थ्य व्यवस्था का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है।
- जनस्वास्थ्य नीतियां नागरिकों को विभिन्न निवारक, प्रोत्साहक, उपचारात्मक तथा पुनर्वास संबंधी सेवाएं प्रदान करके उनके स्वास्थ्य स्तर को प्रभावित करती हैं।
- भारत जैसे देश के लिए, जो अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाना चाहता है, एक सुदृढ़ जनस्वास्थ्य व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है।
सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) से संबंध
- UHC यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी वित्तीय कठिनाई के गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त कर सके।
- UHC की अवधारणा सतत विकास लक्ष्य (SDG)-3 : अच्छा स्वास्थ्य एवं कल्याण में निहित है।
- UHC के प्रति भारत की प्रतिबद्धता: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP), 2017 के अंतर्गत भारत सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को GDP के 2.5% तक बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया है।
- आयुष्मान भारत कार्यक्रम को वर्ष 2018 में एक प्रमुख UHC कार्यक्रम के रूप में प्रारंभ किया गया।
- स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों (HWCs) के माध्यम से सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया गया।
- प्रमुख चुनौतियां: स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच।
- उच्च आउट ऑफ़ पॉकेट व्यय ।
- अपर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना।
- स्वास्थ्य सेवाओं की निम्न गुणवत्ता।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (MoHFW) के अनुसार, भारत में OOPE कुल स्वास्थ्य व्यय के लगभग 62.6% (2014-15) से घटकर 43.89% (2023) रह गया है।
भारत की प्रमुख जनस्वास्थ्य नीतियां
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP), 2017: इसके प्रमुख लक्ष्यों में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज शामिल है।
- यह निवारक एवं प्रोत्साहक स्वास्थ्य सेवाओं के महत्व को रेखांकित करती है।
- साथ ही, प्राथमिक स्वास्थ्य संस्थानों को सुदृढ़ बनाने पर बल देती है।
- आयुष्मान भारत कार्यक्रम (2018): यह कार्यक्रम दो प्रमुख स्तंभों पर आधारित है:
- स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र (HWCs): SCs, PHCs एवं CHCs को व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में परिवर्तित करने के उद्देश्य से विकसित किए गए हैं। इन केंद्रों पर निम्न सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं—
- मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएं।
- गैर-संचारी रोगों (NCDs) की जांच एवं स्क्रीनिंग।
- मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं।
- उपशामक एवं वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल।
- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY): आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए प्रारंभ की गई स्वास्थ्य बीमा योजना।
- प्रत्येक परिवार को द्वितीयक एवं तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं हेतु प्रतिवर्ष ₹5 लाख तक का स्वास्थ्य बीमा कवरेज प्रदान करती है।
- स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र (HWCs): SCs, PHCs एवं CHCs को व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में परिवर्तित करने के उद्देश्य से विकसित किए गए हैं। इन केंद्रों पर निम्न सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं—
- आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM): वर्ष 2021 में प्रारंभ इस मिशन का उद्देश्य एकीकृत डिजिटल स्वास्थ्य पारितंत्र का निर्माण करना है। इसके प्रमुख घटक हैं—
- आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाता (ABHA) आईडी।
- स्वास्थ्य संस्थानों एवं स्वास्थ्य पेशेवरों की रजिस्ट्री।
- इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य अभिलेख ।
- राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य पारितंत्र (NDHE): डिजिटल स्वास्थ्य अभिलेखों की अंतरसंचालनीयता (Interoperability) सुनिश्चित करना।
- स्वास्थ्य सेवाओं की पोर्टेबिलिटी एवं निरंतरता को प्रोत्साहन देना।
भारत की जनस्वास्थ्य नीतियों से संबंधित चिंताएं एवं चुनौतियां
- जनसंख्या स्वास्थ्य से व्यक्तिगत कल्याण की ओर झुकाव: ‘स्वास्थ्य एवं कल्याण’ की अवधारणा के कार्यान्वयन से जनसंख्या-आधारित स्वास्थ्य रणनीतियों से ध्यान हटकर व्यक्तिगत कल्याण पर केंद्रित हो गया है।
- संस्थानों की भूमिका को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है।
- कल्याण की व्यक्तिपरक प्रकृति के कारण इसका मापन कठिन है।
- टीकाकरण कवरेज या मातृ मृत्यु दर जैसे संकेतकों के विपरीत, कल्याण का कोई सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत जनसंख्या-स्तरीय मापदंड उपलब्ध नहीं है।
- स्वास्थ्य का व्यक्तिकरण: कल्याण-आधारित दृष्टिकोण व्यक्तियों को उनके स्वास्थ्य व्यवहार के लिए अधिक उत्तरदायी बनाता है।
- इससे गरीबी, कुपोषण, खराब स्वच्छता, अपर्याप्त आवास तथा स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों की उपेक्षा होने का जोखिम रहता है।
- प्राथमिक स्वास्थ्य संस्थानों में अवसंरचनात्मक कमी: यद्यपि अनेक पहलें की गई हैं, फिर भी SCs, PHCs एवं CHCs में निम्न समस्याएं बनी हुई हैं—
- चिकित्सकों एवं विशेषज्ञों की कमी।
- पर्याप्त नैदानिक सुविधाओं का अभाव।
- कमजोर अवसंरचना।
- स्वास्थ्यकर्मियों के रिक्त पद।
- ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्रों में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है।
- पर्याप्त स्वास्थ्य सेवा वितरण के बिना डिजिटलीकरण: ABDM मुख्यतः डिजिटल स्वास्थ्य सूचना के निर्माण पर केंद्रित है।
- केवल स्वास्थ्य अभिलेखों का डिजिटलीकरण स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं कर सकता।
- डिजिटल आंकड़े अस्पतालों, दवाओं, स्वास्थ्यकर्मियों एवं जांच सुविधाओं का विकल्प नहीं बन सकते।
- अपर्याप्त अवसंरचना डिजिटल मंचों की उपयोगिता को सीमित कर देती है।
- आउट ऑफ़ पॉकेट व्यय (OOPE) की निरंतरता: निजी स्वास्थ्य सेवाएं आज भी अनेक परिवारों के लिए महंगी हैं।
- विभिन्न स्वास्थ्य सर्वेक्षणों के अनुसार, दवाइयों एवं जांचों पर होने वाला व्यय घरेलू स्वास्थ्य व्यय का बड़ा हिस्सा बना हुआ है।
- विनाशकारी स्वास्थ्य व्यय प्रतिवर्ष अनेक परिवारों को निर्धनता की ओर ले जाता है।
- साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण का अभाव: कुछ स्वास्थ्य पहलें प्रशासनिक एवं तकनीकी नवाचारों पर अधिक केंद्रित हैं।
- वे लोगों की मूलभूत स्वास्थ्य आवश्यकताओं, विशेषकर उपचारात्मक सेवाओं, का पर्याप्त समाधान नहीं कर पातीं।
- इससे UHC की दिशा में किए जा रहे प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं।
आगे की राह : जनस्वास्थ्य नीतियों का सुदृढ़ीकरण
- त्रिस्तरीय जनस्वास्थ्य अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण: SCs, PHCs एवं CHCs में पर्याप्त अवसंरचना, नैदानिक सुविधाएं तथा मानव संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।
- इनके बीच प्रभावी समन्वय एवं संदर्भन प्रणाली विकसित की जाए।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य निवेश में वृद्धि: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के अनुरूप स्वास्थ्य व्यय को GDP के 2.5% तक पहुंचाने के प्रयास तीव्र किए जाएं।
- प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
- साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण अपनाना: नीति-निर्माण को शिशु मृत्यु दर (IMR), मातृ मृत्यु दर (MMR), रोग-भार एवं स्वास्थ्य सेवा उपलब्धता जैसे संकेतकों पर आधारित किया जाए।
- डिजिटल स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य सेवा प्रावधान के बीच संतुलन: ABDM का कार्यान्वयन स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त बनाने वाला होना चाहिए, न कि उनका विकल्प।
- डिजिटल स्वास्थ्य को सुदृढ़ संस्थागत व्यवस्थाओं से जोड़ा जाए।
- स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों पर ध्यान: पोषण, स्वच्छता, पेयजल एवं सामाजिक सुरक्षा संबंधी कार्यक्रमों के साथ प्रभावी अभिसरण सुनिश्चित किया जाए।
- सामुदायिक सहभागिता को प्रोत्साहन : स्थानीय निकायों, आशा कार्यकर्ताओं तथा सामुदायिक संगठनों को स्वास्थ्य नियोजन एवं निगरानी प्रक्रिया का अभिन्न अंग बनाया जाए।
निष्कर्ष
- भारत की सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) की यात्रा केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य एवं डिजिटलीकरण तक सीमित नहीं है। जनस्वास्थ्य नीतियों का केंद्रबिंदु गुणवत्तापूर्ण, सुलभ एवं किफायती स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच तथा स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों को बनाना होगा। तभी एक समावेशी, सुदृढ़ एवं जन-केंद्रित स्वास्थ्य व्यवस्था का निर्माण संभव हो सकेगा।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: “भारत में जनस्वास्थ्य नीतियां लोगों की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं के समाधान से हटकर क्रमशः व्यक्ति-केंद्रित एवं प्रौद्योगिकी-आधारित हस्तक्षेपों की ओर अग्रसर होती जा रही हैं।” विवेचना कीजिए। सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) प्राप्त करने के लिए जनस्वास्थ्य को जन-आवश्यकताओं के साथ पुनः किस प्रकार संबद्ध किया जा सकता है? |
स्रोत: TH