पाठ्यक्रम: जीएस-3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
सन्दर्भ
- पिछले बारह वर्षों में भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम राष्ट्रीय आत्मविश्वास, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक महत्वाकांक्षा का प्रतीक बनकर उभरा है।
एक वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति का उदय
- वर्तमान में भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का मूल्य लगभग 8 अरब डॉलर है तथा वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में इसकी हिस्सेदारी 2–3% है।
- अगले दशक में इसके पाँच गुना बढ़कर 40–45 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, जबकि वर्ष 2030 तक इसकी वैश्विक हिस्सेदारी 8% तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।
- भारत ने वर्तमान में संचालित PSLV, GSLV तथा LVM3 प्रक्षेपण यानों के माध्यम से निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में 10 टन तक तथा भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा (GTO) में 4.2 टन तक के उपग्रहों के प्रक्षेपण हेतु अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियों में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली है।

चंद्र अन्वेषण – चंद्रयान कार्यक्रम
- भारत की चन्द्रयात्रा की नींव वर्ष 2008 में चंद्रयान-1 के साथ रखी गई, जो चंद्रमा के लिए भारत का पहला मिशन था।
- इस मिशन ने चंद्रमा की सतह पर जल अणुओं तथा हाइड्रॉक्सिल की उपस्थिति के प्रमाण खोजे। इसके बाद वर्ष 2019 में प्रक्षेपित चंद्रयान-2 ने भारत के चंद्र कार्यक्रम को और सुदृढ़ किया।
- 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सफल सॉफ्ट लैंडिंग कर भारत को ऐसा करने वाला विश्व का पहला देश बना दिया। साथ ही, भारत संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन के बाद चंद्र सतह पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला चौथा देश बना।
मंगल ऑर्बिटर मिशन (मंगलयान)
- 24 सितंबर 2014 को मंगलयान सफलतापूर्वक मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश कर गया, जिससे भारत अपने प्रथम प्रयास में ही मंगल तक पहुँचने वाला विश्व का पहला देश बन गया।
- इस उपलब्धि के साथ, इसरो (ISRO) संयुक्त राज्य अमेरिका की नासा (NASA), रूस की रोस्कोस्मोस (Roscosmos) तथा यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के बाद मंगल की कक्षा में अंतरिक्ष यान स्थापित करने वाली विश्व की चौथी अंतरिक्ष एजेंसी बन गई।
आदित्य-L1 : भारत की पहली सौर वेधशाला
- वर्ष 2023 में प्रक्षेपित इस अंतरिक्ष यान को पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर स्थित सूर्य-पृथ्वी L1 लाग्रांज बिंदु के चारों ओर हेलो कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया।
- यह मिशन सौर कोरोना, सौर पवनों तथा अंतरिक्ष मौसम की उन घटनाओं का अध्ययन करता है जो पृथ्वी के पर्यावरण और तकनीकी प्रणालियों को प्रभावित करती हैं।
अंतरिक्ष खगोल विज्ञान एवं अंतरिक्ष डॉकिंग
- भारत की पहली बहु-तरंगदैर्ध्य अंतरिक्ष वेधशाला एस्ट्रोसैट (AstroSat) ने सितंबर 2025 में कक्षा में अपने दस वर्ष पूरे किए और अनेक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजों में योगदान दिया।
- वर्ष 2024 में प्रक्षेपित एक्सपोसैट (XPoSat) ने एक्स-किरण खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भारत की क्षमताओं का और विस्तार किया।
- स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (SPADEX) के माध्यम से भारत अंतरिक्ष में स्वायत्त डॉकिंग एवं अनडॉकिंग का सफल प्रदर्शन करने वाला संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथा देश बन गया।
शुक्र ऑर्बिटर मिशन
- भारत सरकार द्वारा अनुमोदित शुक्र ऑर्बिटर मिशन का प्रक्षेपण वर्ष 2028 में प्रस्तावित है।
- यह मिशन शुक्र ग्रह के भूविज्ञान, सतही संरचना, वायुमंडल, आयनमंडल तथा पुनःसतहीकरण प्रक्रियाओं का अध्ययन करेगा।
गगनयान : भारत का पहला मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम
- इस मिशन का उद्देश्य अधिकतम तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को 400 किलोमीटर की कक्षा में तीन दिनों तक भेजना और सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाना है। इस कार्यक्रम में दो मानव-रहित मिशन तथा एक मानव-सहित मिशन शामिल हैं।
- भारत ने वर्ष 2025 में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए इसरो-नासा समर्थित एक्सिओम-4 (Axiom-4) मिशन में भाग लिया।
- ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने वर्ष 2025 में फाल्कन-9 द्वारा प्रक्षेपित स्पेसएक्स ड्रैगन अंतरिक्ष यान से यात्रा की।
राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन
- भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) भारत का प्रस्तावित अंतरिक्ष स्टेशन है तथा स्पेस विज़न 2047 का एक प्रमुख स्तंभ है।
- BAS निम्न पृथ्वी कक्षा में स्थापित पाँच-मॉड्यूल वाला अंतरिक्ष स्टेशन होगा, जिसे दीर्घकालिक मानव अंतरिक्ष अभियानों तथा सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण में उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए विकसित किया जा रहा है।
पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (RLV)
- इसरो का RLV-TD कार्यक्रम कम लागत वाले और पुनः प्रयोज्य अंतरिक्ष परिवहन तंत्रों की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
- इसरो ने वर्ष 2016 में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC SHAR), श्रीहरिकोटा से RLV-TD का सफल उड़ान परीक्षण किया, जिसमें स्वायत्त नेविगेशन, मार्गदर्शन एवं नियंत्रण प्रणाली, पुनः प्रयोज्य तापीय सुरक्षा प्रणाली तथा पुनःप्रवेश मिशन प्रबंधन तकनीकों का सत्यापन किया गया।
स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक्स एवं ऑन-बोर्ड प्रणालियाँ
- इसरो ने सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला (SCL), चंडीगढ़ के साथ मिलकर विक्रम3201, भारत का पहला पूर्णतः स्वदेशी 32-बिट अंतरिक्ष माइक्रोप्रोसेसर तथा उच्च विश्वसनीयता वाले अंतरिक्ष अभियानों हेतु कल्पना32 विकसित किया है।
- इससे विदेशी घटकों पर निर्भरता कम होती है तथा मिशनों की सुरक्षा में सुधार होता है।
नाविक (NavIC) – भारत की स्वदेशी नौवहन प्रणाली
- यह भारत तथा उसकी सीमाओं से 1,500 किलोमीटर तक के क्षेत्र में सटीक स्थिति निर्धारण, नौवहन और समय-निर्धारण सेवाएँ प्रदान करती है।
- यह प्रणाली उपग्रहों के एक समूह (Constellation) के माध्यम से निरंतर क्षेत्रीय कवरेज उपलब्ध कराती है।
भारत के अंतरिक्ष परिवर्तन को गति देता निजी क्षेत्र
- वर्ष 2020 में निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र को खोलने तथा उसके बाद भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 के लागू होने से अंतरिक्ष मूल्य श्रृंखला के विभिन्न क्षेत्रों में निजी भागीदारी को बढ़ावा मिला।
- वर्ष 2024 में सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नीति को उदार बनाया, जिसके अंतर्गत चयनित गतिविधियों में 100% तक FDI की अनुमति दी गई।
- उपग्रह निर्माण एवं संचालन, उपग्रह डेटा उत्पादों तथा ग्राउंड/उपयोगकर्ता खंड सेवाओं में 74% तक FDI स्वचालित मार्ग से अनुमत है।
- प्रक्षेपण यानों, संबंधित प्रणालियों तथा स्पेसपोर्ट्स में 49% तक FDI की अनुमति है, जबकि उपग्रह एवं ग्राउंड-सेगमेंट घटकों तथा उप-प्रणालियों के निर्माण में 100% FDI स्वचालित मार्ग से अनुमत है।
- पिक्सेल (Pixxel), ध्रुव स्पेस (Dhruva Space), स्कायरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace), अग्निकुल कॉसमॉस (Agnikul Cosmos) तथा बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस (Bellatrix Aerospace) जैसी कंपनियाँ भारत के नए अंतरिक्ष युग की अग्रणी बनकर उभरी हैं।

भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का विस्तार
- भारत अपनी “पड़ोसी प्रथम” (Neighbourhood First) नीति के अंतर्गत बिम्सटेक (BIMSTEC) अंतरिक्ष कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहा है।
- उत्तर-पूर्वी अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (NESAC) बिम्सटेक देशों के लिए अंतरिक्ष अनुप्रयोगों तथा उपग्रह प्रौद्योगिकियों पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करता है।
- यह पहल अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, आपदा प्रबंधन तथा क्षमता निर्माण के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग को सुदृढ़ करती है।
- भारत-रूस साझेदारी: दशकों पुराने अंतरिक्ष सहयोग को आगे बढ़ाते हुए, इसरो (ISRO) और रोस्कोस्मोस (ROSCOSMOS) ने वर्ष 2018 में गगनयान मिशन के समर्थन हेतु एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।
- भारत की बढ़ती वैश्विक साझेदारियाँ तृष्णा (TRISHNA – Thermal InfraRed Imaging Satellite for High-resolution Natural Resource Assessment) मिशन में भी परिलक्षित होती हैं, जिसे इसरो और फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसी CNES द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया जा रहा है।
भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र की चुनौतियाँ
- प्रतिस्पर्धा एवं वैश्विक बाजार हिस्सेदारी: वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में 8% हिस्सेदारी प्राप्त करने के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष कंपनियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी प्रतिस्पर्धा करनी होगी।
- प्रौद्योगिकी विकास एवं नवाचार: पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान, लघुकरण किए गए उपग्रह तथा उन्नत प्रणोदन प्रणालियों जैसी अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के विकास हेतु बड़े पैमाने पर निवेश और अनुसंधान की आवश्यकता होती है।
- नियामक ढाँचा एवं लाइसेंसिंग: लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं, निर्यात नियंत्रणों तथा अनुपालन संबंधी आवश्यकताओं का प्रबंधन जटिल हो सकता है।
- अवसंरचना एवं सुविधाएँ: ऐसी उन्नत अवसंरचना का विकास और रखरखाव पर्याप्त पूंजी निवेश की मांग करता है।
निष्कर्ष
- पिछले बारह वर्षों में भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम राष्ट्रीय विकास का एक महत्त्वपूर्ण प्रेरक बन गया है, जिसने स्वदेशी नवाचार के माध्यम से सुशासन, आर्थिक वृद्धि तथा जनकल्याण को समर्थन प्रदान किया है।
- स्पेस विज़न 2047 की दिशा में आगे बढ़ते हुए भारत अंतरिक्ष-आधारित नवाचार के माध्यम से आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक प्रगति और सामाजिक विकास को और अधिक सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहा है।
स्रोत: PIB
Previous article
भारत के सांख्यिकीय डेटाबेस में आवश्यक उन्नयन