सौर ऊर्जा के निर्बाध एवं सतत विकास का सुनिश्चितीकरण

पाठ्यक्रम: GS3/नवीकरणीय ऊर्जा

संदर्भ

  • भारत ने वर्ष 2030 से पहले ही गैर-जीवाश्म स्रोतों से 50% स्थापित विद्युत क्षमता के अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है। इसके बावजूद वर्ष 2025 में 2.3 TWh सौर ऊर्जा कटौती तथा 44 GW क्षमता से संबंधित हस्ताक्षरित न होने वाले विद्युत क्रय समझौते (PPAs) यह दर्शाते हैं कि ऊर्जा संक्रमण अब क्षमता संबंधी चुनौती से आगे बढ़कर प्रणालीगत चुनौती बन गया है।

भारत की सौर ऊर्जा स्थिति : वर्तमान परिदृश्य

  • भारत सौर ऊर्जा उत्पादन में विश्व में तीसरे तथा कुल स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में चौथे स्थान पर है (IRENA, 2025)।
  • वर्ष 2025 में रिकॉर्ड 38 GW सौर क्षमता जोड़ी गई, जिससे कुल स्थापित सौर क्षमता लगभग 136 GW तक पहुँच गई।
  • भारत अपने वर्ष 2030 के NDC लक्ष्य से पहले ही आगे निकल चुका है तथा 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य की दिशा में अग्रसर है।
  • नीति आयोग के अनुसार वर्तमान नीतिगत परिदृश्य में वर्ष 2050 तक सौर क्षमता 1,500 GW तथा नेट-ज़ीरो परिदृश्य में 2,400 GW तक पहुँच सकती है।
  • उत्पादन के क्षेत्र में भारत का प्रदर्शन सशक्त है, किंतु शासन एवं प्रबंधन के क्षेत्र में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई है।

मूल समस्या : सौर ऊर्जा के लिए अपर्याप्त विद्युत ग्रिड

  • मई से दिसंबर 2025 के बीच भारत को 2.3 TWh सौर ऊर्जा उत्पादन में कटौती करनी पड़ी, जिसके लिए उत्पादकों को लगभग ₹575 करोड़ से ₹690 करोड़ तक का मुआवज़ा देना पड़ा।
  • यदि यह कटौती न हुई होती और इसके स्थान पर कोयला आधारित उत्पादन को प्रतिस्थापित किया गया होता, तो लगभग 21 लाख टन CO₂ उत्सर्जन को रोका जा सकता था।
  • राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में संचरण अवसंरचना की अनुपलब्धता के कारण सौर उत्पादन के चरम समय में 10% से 30% तक कटौती दर्ज की गई।

प्रमुख चुनौतियाँ

  • हस्ताक्षरित न होने वाले PPA : निवेश में ठहराव: सितंबर 2025 तक लगभग 44 GW स्वीकृत क्षमता विद्युत विक्रय समझौतों के अभाव में लंबित रही।
    • इसका कारण DISCOMs की अनिच्छा, खरीदारों की बदलती प्राथमिकताएँ तथा ग्रिड अवसंरचना में विलंब रहा।
    • हस्ताक्षरित PPA के अभाव में न तो वित्तीय समापन संभव है और न ही परियोजना निर्माण।
  • संचरण अवसंरचना की धीमी प्रगति: सौर ऊर्जा समृद्ध राज्य राजस्थान एवं गुजरात हैं, जबकि प्रमुख मांग केंद्र दिल्ली, महाराष्ट्र एवं पश्चिम बंगाल जैसे राज्य हैं।
    • संचरण नेटवर्क का विस्तार उत्पादन क्षमता की वृद्धि के अनुरूप नहीं हो पाया है।
  • DISCOMs पर वित्तीय दबाव: कुल तकनीकी एवं वाणिज्यिक (AT&C) हानियाँ लगभग 16% बनी हुई हैं।
    • साथ ही, टैरिफ वसूली में कमी की समस्या भी जारी है।
    • वित्तीय रूप से कमजोर DISCOMs PPA पर हस्ताक्षर में विलंब करते हैं, खरीद प्रतिबद्धताओं से बचते हैं तथा समय पर भुगतान नहीं करते।
    • इससे सौर निवेश एवं ग्रिड आधुनिकीकरण दोनों प्रभावित होते हैं।
  • कोयला आधारित संयंत्रों की सीमित लचीलापन क्षमता: भारत के कुल विद्युत उत्पादन का लगभग 75% भाग कोयला आधारित संयंत्रों से प्राप्त होता है।
    • इन संयंत्रों की न्यूनतम तकनीकी लोड (MTL) सीमा लगभग 55% है।
    • जब तक कोयला आधारित संयंत्रों को अधिक लचीला नहीं बनाया जाता या ऊर्जा भंडारण द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जाता, तब तक दोपहर के समय सौर ऊर्जा के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध नहीं होगा।
  • आपूर्ति शृंखला संबंधी बाधाएँ: वर्ष 2025 में 220 kV एवं 400 kV ट्रांसफॉर्मरों सहित उच्च वोल्टेज उपकरणों की आपूर्ति अवधि बढ़कर लगभग 20 माह हो गई।
    • इससे संचरण अवसंरचना परियोजनाओं में विलंब हुआ, जिन पर सौर परियोजनाओं की निर्भरता है।
  • रूफटॉप सौर कार्यक्रम का कमजोर प्रदर्शन: पीएम सूर्य घर योजना को DCR मॉड्यूल की कमी, पोर्टल पर डुप्लिकेट सीरियल नंबर त्रुटियों तथा राज्यों द्वारा नेट मीटरिंग संबंधी प्रतिबंधों जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

सरकारी पहलें

  • ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर (चरण-I एवं II): नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण हेतु अंतर्राज्यीय संचरण अवसंरचना का विकास।
    • इसका लक्ष्य 20 GW निकासी क्षमता विकसित करना है।
  • राष्ट्रीय स्मार्ट ग्रिड मिशन: स्मार्ट मीटर, स्वचालन तथा मांग-प्रतिक्रिया प्रणालियों के माध्यम से वितरण अवसंरचना का आधुनिकीकरण।
  • संशोधित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS): AT&C हानियों में कमी तथा DISCOM अवसंरचना उन्नयन हेतु परिणाम-आधारित वित्तपोषण।
  • पीएम-कुसुम योजना: कृषि क्षेत्र में विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा को प्रोत्साहन देना।
    • इससे DISCOMs पर निर्भरता एवं ग्रिड पर दबाव कम होता है।
  • सौर पीवी हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI): घरेलू सौर मॉड्यूल एवं सेल निर्माण को प्रोत्साहन।
    • आयात निर्भरता तथा ALCM अनुपालन जोखिमों में कमी।
  • बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) हेतु PLI: ऊर्जा भंडारण अवसंरचना के विकास को प्रोत्साहित करना।
    • इससे नवीकरणीय ऊर्जा के बेहतर एकीकरण में सहायता मिलती है।

आगे की राह

  • तकनीकी उन्नयन एवं परिचालन सुधारों के माध्यम से कोयला संयंत्रों की MTL सीमा 55% से स्तर पर लाई जाए, जिससे दोपहर के समय सौर ऊर्जा के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध हो सके।
  • CERC की निगरानी में केंद्रीय नियामक व्यवस्था के माध्यम से परियोजना आवंटन के 90 दिनों के अंदर PPA पर हस्ताक्षर अनिवार्य किए जाएँ।
  • राजस्थान एवं गुजरात के प्रमुख संचरण केंद्रों पर बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) की स्थापना की जाए तथा वर्ष 2027 तक 10 GW भंडारण क्षमता का लक्ष्य रखा जाए।
  • जिन राज्यों में AT&C हानियाँ 20% से अधिक हैं, वहाँ समयबद्ध निजीकरण अथवा पेशेवर प्रबंधन मॉडल अपनाकर DISCOMs की वित्तीय स्थिति में सुधार किया जाए।
  • PPA-आधारित डिस्पैच प्रणाली के स्थान पर राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा-नियंत्रित आर्थिक डिस्पैच (SCED) लागू किया जाए, जिससे राज्य सीमाओं के पार न्यूनतम लागत पर नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग संभव हो सके।
  • वर्ष 2028 तक 25 करोड़ परिवारों को स्मार्ट मीटर से जोड़ते हुए समय-आधारित टैरिफ लागू किया जाए, ताकि मांग को सौर ऊर्जा उत्पादन के चरम समय की ओर स्थानांतरित किया जा सके।

निष्कर्ष

  • भारत की सौर ऊर्जा यात्रा स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण एवं जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। यद्यपि वर्ष 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य प्राप्त करना संभव प्रतीत होता है, तथापि अहस्ताक्षरित PPA तथा सौर ऊर्जा कटौती जैसी समस्याओं के समाधान हेतु त्वरित कदम उठाना आवश्यक है।
  • संचरण नेटवर्क को सुदृढ़ करना, ऊर्जा भंडारण अवसंरचना का विस्तार करना, DISCOMs की वित्तीय स्थिति में सुधार लाना तथा स्पष्ट एवं स्थिर नीतिगत ढाँचा सुनिश्चित करना सौर ऊर्जा के सतत विकास एवं भारत के वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अत्यंत आवश्यक होगा।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: भारत में सौर ऊर्जा कटौती के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारकों की चर्चा कीजिए। सौर ऊर्जा के निर्बाध एवं सतत विकास को सुनिश्चित करने हेतु एक समग्र रणनीति सुझाइए। 

स्रोत: BL

 

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