भारत के रोजगार परिदृश्य का मानचित्रण 

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • हाल के सार्वजनिक विमर्शों तथा युवाओं के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों ने भारत में रोजगार के विषय पर पुनः ध्यान केंद्रित किया है।

रोजगार संकेतक

  • बेरोजगारी दर (UER): बेरोजगारी दर श्रमबल में बेरोजगार व्यक्तियों के प्रतिशत को मापती है।
    • इसकी गणना सक्रिय रूप से रोजगार की खोज कर रहे बेरोजगार व्यक्तियों की संख्या को कुल श्रमबल से विभाजित करके की जाती है।
  • श्रमबल सहभागिता दर (LFPR): LFPR कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या के उस अनुपात को दर्शाती है जो या तो नियोजित है अथवा सक्रिय रूप से रोजगार की खोज कर रही है।
  • रोजगार दर (ER): रोजगार दर कार्यशील आयु वर्ग की कुल जनसंख्या में नियोजित व्यक्तियों के अनुपात को मापती है।

भारत में रोजगार की प्रमुख प्रवृत्तियाँ (2016-17 से 2025-26)

  • समग्र रोजगार दर में गिरावट: भारत की रोजगार दर वर्ष 2016-17 में लगभग 42.7 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2025-26 में 38.7 प्रतिशत रह गई।
    • यद्यपि नियोजित व्यक्तियों की संख्या लगभग 406 मिलियन से बढ़कर 438 मिलियन हो गई, किंतु रोजगार वृद्धि कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या में वृद्धि के अनुरूप नहीं रही।
  • लिंग-आधारित प्रवृत्तियाँ: पुरुष रोजगार दर लगभग 70.5 प्रतिशत से घटकर 64.8 प्रतिशत हो गई।
    • महिला रोजगार दर लगभग 11.8 प्रतिशत से घटकर 9.4 प्रतिशत रह गई।
  • आयु-आधारित प्रवृत्तियाँ: अधिकांश आयु वर्गों में रोजगार दर में गिरावट दर्ज की गई।
    • केवल 25–29 वर्ष तथा 55–59 वर्ष आयु वर्गों में मामूली सुधार देखा गया।
  • शैक्षिक समूहों पर प्रभाव:सभी शैक्षिक स्तरों पर रोजगार दर में कमी आई।
    • यह गिरावट अपेक्षाकृत कम शिक्षित व्यक्तियों में अधिक तथा स्नातकों में तुलनात्मक रूप से कम रही।

रोजगार संबंधी चुनौतियों के प्रमुख कारण

  • रोजगारविहीन वृद्धि : आर्थिक विकास मुख्यतः पूंजी-गहन क्षेत्रों में केंद्रित रहा है, जो सीमित रोजगार अवसर उत्पन्न करते हैं।
    • श्रम-गहन विनिर्माण क्षेत्र का पर्याप्त विस्तार नहीं हो पाया, जिससे बढ़ते कार्यबल को समाहित करने में कठिनाई हुई।
  • संरचनात्मक परिवर्तन की चुनौतियाँ: श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा अभी भी कम उत्पादकता वाली कृषि पर निर्भर है।
    • कृषि से विनिर्माण और आधुनिक सेवा क्षेत्रों की ओर संक्रमण अपेक्षा से धीमा रहा है।
  • कौशल असंगति : शिक्षा व्यवस्था के परिणाम अक्सर उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं होते।
    • अनेक स्नातकों को औपचारिक योग्यताएँ होने के बावजूद उपयुक्त रोजगार प्राप्त करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
  • वैश्वीकरण की धीमी गति: बढ़ते संरक्षणवाद, व्यापारिक प्रतिबंधों तथा वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं ने निर्यात-आधारित रोजगार अवसरों को सीमित किया है।
    • क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP) से भारत के बाहर रहने के कारण कुछ क्षेत्रीय मूल्य शृंखलाओं तक पहुँच सीमित हुई।
  • प्रौद्योगिकीय व्यवधान: स्वचालन एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) श्रम बाजारों को तीव्रता से परिवर्तित कर रहे हैं।
    • नियमित एवं दोहराव वाले कार्य तकनीकी प्रतिस्थापन के प्रति अधिक संवेदनशील होते जा रहे हैं।
  • महिला श्रमबल सहभागिता का निम्न स्तर: सामाजिक मान्यताएँ, सुरक्षा संबंधी चिंताएँ, अपर्याप्त बाल-देखभाल सुविधाएँ तथा वेतन असमानताएँ महिलाओं की श्रमबल सहभागिता को सीमित करती हैं।

केवल GDP वृद्धि की अपेक्षा रोजगार अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों है?

  • GDP वृद्धि आर्थिक उत्पादन के विस्तार को दर्शाती है, किंतु यह स्वतः रोजगार सृजन की गारंटी नहीं देती।
  • सतत रोजगार सृजन आय में वृद्धि करता है, निर्धनता को कम करता है, सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा देता है तथा घरेलू मांग को सुदृढ़ बनाता है।
  • भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाने के लिए रोजगार-प्रधान विकास अनिवार्य है।

रोजगार सृजन हेतु सरकारी पहलें

  • राष्ट्रीय करियर सेवा (NCS) परियोजना: यह एक डिजिटल मंच है, जो रोजगार खोजने वालों को करियर परामर्श, व्यावसायिक मार्गदर्शन तथा सरकारी एवं निजी क्षेत्र की रिक्तियों संबंधी जानकारी एक ही स्थान पर उपलब्ध कराता है।
  • ग्रामीण स्वरोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थान (RSETIs): स्वरोजगार को बढ़ावा देने हेतु उद्यमिता एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।
  • दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM): कौशल विकास तथा स्वरोजगार सहायता के माध्यम से शहरी गरीबों के लिए आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देता है।
  • पीएम स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि (PM SVANidhi): रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं को आजीविका समर्थन तथा स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने के लिए बिना जमानत के कार्यशील पूंजी ऋण उपलब्ध कराती है।
  • पीएम विश्वकर्मा योजना: पारंपरिक कारीगरों एवं शिल्पकारों को कौशल विकास, ऋण सहायता तथा बाजार संपर्क उपलब्ध कराकर उनकी आय एवं रोजगार अवसरों में वृद्धि करती है।
  • प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY): सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को बिना जमानत के ऋण उपलब्ध कराकर उद्यमिता और रोजगार सृजन को बढ़ावा देती है।
  • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY): युवाओं को उद्योग-संबंधित कौशल प्रशिक्षण प्रदान कर उनकी रोजगार क्षमता तथा श्रमबल सहभागिता में सुधार करती है।

आगे की राह

  • विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रोत्साहन: मेक इन इंडिया तथा उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) जैसी पहलों को सुदृढ़ कर श्रम-गहन विनिर्माण एवं निर्यात का विस्तार किया जाना चाहिए।
  • कौशल विकास का सशक्तिकरण: शिक्षा एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण को उद्योगों की आवश्यकताओं, उभरती प्रौद्योगिकियों तथा भविष्य के रोजगार बाजारों के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
  • वैश्विक मूल्य शृंखलाओं का लाभ उठाना: बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन के लिए भारतीय उद्योगों को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से अधिक गहराई से जोड़ा जाना चाहिए।
  • रोजगारों के औपचारीकरण को प्रोत्साहन: सामाजिक सुरक्षा कवरेज, श्रम संरक्षण तथा औपचारिक रोजगार को प्रोत्साहित करने वाले प्रोत्साहनों का विस्तार किया जाना चाहिए।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं स्वचालन: रोजगार विस्थापन की चुनौतियों का प्रबंधन करते हुए कार्यबल को नए रोजगार अवसरों की ओर संक्रमण हेतु सक्षम बनाना आवश्यक है।

Source: IE

 

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