पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस में आयोजित 52वें जी-7 शिखर सम्मेलन में सहभागिता करने रहे हैं।
परिचय
- यह प्रधानमंत्री मोदी की निरंतर सातवीं तथा भारत की 14वीं जी-7 शिखर सम्मेलन में भागीदारी होगी, जो वैश्विक मामलों में भारत के बढ़ते महत्व को दर्शाती है।
- जी-7 के साथ भारत का जुड़ाव वर्ष 2003 में प्रारंभ हुआ था।
- भारत विश्व के सर्वाधिक औद्योगीकृत देशों के इस समूह में 15 बार आमंत्रित किए जाने वाला एकमात्र देश है।
जी-7 के बारे में
- जी-7 (ग्रुप ऑफ सेवन) विश्व की सात सबसे बड़ी उन्नत अर्थव्यवस्थाओं का एक अनौपचारिक संगठन है।
- ये देश विश्व की लगभग 10 प्रतिशत जनसंख्या तथा वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करते हैं।
- सदस्य देश:
- कनाडा
- फ्रांस
- जर्मनी
- इटली
- जापान
- यूनाइटेड किंगडम
- संयुक्त राज्य अमेरिका
- यूरोपीय संघ (EU) भी जी-7 की बैठकों में भाग लेता है, किंतु उसे सात सदस्य देशों में शामिल नहीं किया जाता।
- पृष्ठभूमि: वर्ष 1975 में तेल संकट के प्रत्युत्तर में यह समूह जी-6 (फ्रांस, पश्चिम जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका) के रूप में स्थापित हुआ।
- वर्ष 1976 में कनाडा के शामिल होने के बाद यह जी-7 बन गया।
- वर्ष 1998 में रूस के शामिल होने पर यह जी-8 बना, किंतु क्रीमिया के विलय के बाद वर्ष 2014 में रूस की सदस्यता निलंबित कर दी गई और समूह पुनः जी-7 बन गया।
- यद्यपि जी-7 के पास कोई औपचारिक विधायी शक्ति नहीं है, फिर भी इसके सदस्य वैश्विक आर्थिक उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा नियंत्रित करते हैं तथा अंतरराष्ट्रीय मामलों और विश्व अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली नीतियों का समन्वय करते हैं।
- अध्यक्षता: इसकी अध्यक्षता सात सदस्य देशों में से किसी एक द्वारा घूर्णन आधार पर प्रतिवर्ष ग्रहण की जाती है।
जी-7 शिखर सम्मेलन का महत्व
- आर्थिक प्रभाव: जी-7 में विश्व की कुछ सबसे बड़ी और विकसित अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हैं।
- इसके सदस्य वैश्विक GDP और व्यापार का एक बड़ा हिस्सा प्रतिनिधित्व करते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों एवं आर्थिक नीतिनिर्माण पर इनका व्यापक प्रभाव पड़ता है।
- निर्णयों का वैश्विक प्रभाव: जी-7 शिखर सम्मेलनों में लिए गए निर्णय एवं प्रतिबद्धताएँ वैश्विक व्यापार, वित्तीय स्थिरता, जलवायु नीति तथा मानवीय सहायता प्रयासों पर दूरगामी प्रभाव डाल सकती हैं।
- संकट समन्वय मंच: जी-7 आर्थिक मंदी, महामारी, युद्ध तथा भू-राजनीतिक तनाव जैसी वैश्विक चुनौतियों के प्रति अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया के समन्वय हेतु एक महत्त्वपूर्ण मंच प्रदान करता है।
- बहुपक्षवाद का प्रतीक: जी-7 प्रमुख शक्तियों के बीच बहुपक्षीय सहयोग एवं सहमति-निर्माण के सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करता है तथा नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को सुदृढ़ करता है।
जी-7 में भारत का महत्व
- आर्थिक महत्व: भारत विश्व की सर्वाधिक तीव्र गति से विकसित हो रही प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।
- विकसित देशों में आर्थिक ठहराव के बीच भारत के वैश्विक विकास का प्रमुख प्रेरक बने रहने की संभावना है।
- भारत का विशाल बाजार तथा जनसांख्यिकीय लाभांश इसे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के लिए अपरिहार्य बनाता है।
- ग्लोबल साउथ की आवाज़: भारत विकासशील देशों की एक प्रमुख आवाज़ के रूप में उभरा है।
- ब्रिक्स (BRICS) और जी-20 जैसे मंचों के माध्यम से भारत विकास, जलवायु वित्त, खाद्य सुरक्षा तथा ऋण स्थिरता से संबंधित चिंताओं को प्रभावी ढंग से उठाता है।
- उत्तर-दक्षिण विभाजन को कम करने के लिए जी-7 देश भारत के सहयोग को महत्त्वपूर्ण मानते हैं।
- हिंद-प्रशांत एवं सामरिक स्थिरता: भारत की भौगोलिक स्थिति एवं क्षमताएँ उसे एक मुक्त, खुला एवं समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका प्रदान करती हैं।
- चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में भारत एक महत्त्वपूर्ण साझेदार है।
- समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी सहयोग एवं सुदृढ़ आपूर्ति शृंखलाओं के क्षेत्र में सहयोग प्रमुख प्राथमिकता बन गया है।
- विश्वसनीय लोकतांत्रिक साझेदार: भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।
- इसकी स्थिर राजनीतिक व्यवस्था, बढ़ती तकनीकी क्षमताएँ तथा नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण इसे जी-7 देशों के लिए एक विश्वसनीय दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार बनाते हैं।
जी-7 से भारत को होने वाले लाभ
- उन्नत प्रौद्योगिकियों एवं निवेश तक पहुँच।
- महत्त्वपूर्ण खनिजों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), अर्धचालकों तथा स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग।
- वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधारों के लिए अधिक समर्थन।
- रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए प्रमुख शक्तियों के साथ साझेदारी को सुदृढ़ करने का अवसर।
चिंताएँ
- भारत अभी भी जी-7 की औपचारिक निर्णय-निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है।
- प्रतिबंधों, रूस-यूक्रेन संघर्ष तथा जलवायु प्रतिबद्धताओं जैसे मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं।
- जी-7 के साथ सहभागिता बढ़ाने के साथ-साथ ब्रिक्स, रूस और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ संबंधों को संतुलित बनाए रखना भारत के लिए एक जटिल कूटनीतिक चुनौती है।
निष्कर्ष
- जी-7 में एक अवसरिक अतिथि से लगातार आमंत्रित सहभागी के रूप में भारत का विकास उसकी बढ़ती आर्थिक शक्ति, भू-राजनीतिक महत्ता तथा ग्लोबल साउथ के नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरती भूमिका को दर्शाता है।
- यद्यपि औपचारिक सदस्यता वर्तमान में एजेंडे पर नहीं है, फिर भी जी-7 के साथ भारत की बढ़ती सहभागिता यह संकेत देती है कि वह उभरती हुई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को आकार देने में निरंतर अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है।
Source: IE
Previous article
दूरसंचार (टेलीविजन, रेडियो एवं संबद्ध सेवाएँ) नियम, 2026 का प्रारूप
Next article
भारत-नेपाल संबंधों में एक नया चरण