पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- भू-राजनीतिक तनावों में वृद्धि, डी-ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण में कमी), आपूर्ति शृंखलाओं के विखंडन और भारत के विकास मॉडल पर हो रही परिचर्चाओं के बीच अर्थशास्त्री यह पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं कि क्या 1991 का उदारीकरण ढांचा भारत की विकासात्मक आकांक्षाओं के लिए अब भी पर्याप्त है।
भारत की आर्थिक रणनीति के बारे में
- 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारत के राज्य-आधारित विकास मॉडल से एक उदारीकृत, बाजार-उन्मुख अर्थव्यवस्था की ओर निर्णायक परिवर्तन किया।
- व्यापार उदारीकरण, विदेशी निवेश, विनियमन में छूट और वैश्विक बाजारों के साथ एकीकरण विकास के प्रमुख स्तंभ बन गए।
- इस रणनीति से महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त हुईं:
- 1991 के बाद भारत का GDP लगभग 15 गुना बढ़ा।
- गरीबी स्तरों में उल्लेखनीय कमी आई।
- भारत सेवाओं के प्रमुख निर्यातक के रूप में उभरा।
- विदेशी मुद्रा भंडार और वैश्विक आर्थिक एकीकरण में सुधार हुआ।
- हालाँकि, चीन के विपरीत, भारत ने तुलनीय स्तर का विनिर्माण आधार या तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र विकसित नहीं किया।
- चीन ने व्यापार उदारीकरण के साथ-साथ आक्रामक औद्योगिक विकास, तकनीकी अधिग्रहण और घरेलू क्षमता निर्माण किया, जबकि भारत ने वैश्विक बाजारों में मुख्यतः सेवाओं के प्रदाता एवं उपभोक्ता बाजार के रूप में एकीकरण किया।
भारत को नई आर्थिक रणनीति की आवश्यकता क्यों है?
- वैश्वीकरण की बदलती प्रकृति: हाइपर-ग्लोबलाइजेशन का युग धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। व्यापार युद्ध, रणनीतिक टैरिफ और प्रौद्योगिकी प्रतिबंधों ने WTO-आधारित वैश्विक व्यवस्था को कमजोर किया है।
- अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को पुनर्गठित कर रही है। राष्ट्र अब आर्थिक सुरक्षा और औद्योगिक आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दे रहे हैं।
- IMF भी आर्थिक विकास में औद्योगिक नीति और रणनीतिक राज्य हस्तक्षेप की बढ़ती भूमिका को स्वीकार करता है।
- कमजोर विनिर्माण आधार: भारत का विनिर्माण क्षेत्र GDP का लगभग 15–17% पर स्थिर बना हुआ है, जो पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अत्यंत कम है।
- 2025 में भारत-चीन व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर से अधिक हो गया।
- भारत ने चीन से लगभग 114 अरब डॉलर के वस्तुओं का आयात किया, जिनमें अधिकांश विनिर्मित उत्पाद और उच्च-तकनीकी उपकरण शामिल हैं।
- यह इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, नवीकरणीय ऊर्जा उपकरण और रक्षा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में कमजोरियों को उजागर करता है।
- आय और रोजगार में धीमी वृद्धि: आम नागरिकों की आय वृद्धि, GDP वृद्धि की तुलना में कम परिवर्तनकारी रही है।
- चीन की प्रति व्यक्ति आय 1991 के बाद लगभग 38 गुना बढ़ी।
- भारत की प्रति व्यक्ति आय लगभग 8 गुना बढ़ी।
- स्वदेशी तकनीकी क्षमता की आवश्यकता: भारत अपने GDP का केवल लगभग 0.65% अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर व्यय करता है, जो प्रमुख नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत कम है।
- कम निवेश के कारण तकनीकी आत्मनिर्भरता, उच्च-मूल्य विनिर्माण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा सीमित होती है।
- घरेलू अर्थव्यवस्था में मांग संबंधी बाधाएँ: किसानों, श्रमिकों और छोटे उद्यमियों की कमजोर क्रय शक्ति घरेलू मांग को सीमित करती है।
- आय में व्यापक वृद्धि के बिना उपभोग उच्च-स्तरीय वर्ग तक सीमित रहता है, निजी निवेश धीमा होता है और असमानता बढ़ती है।
नई आर्थिक रणनीति को समर्थन देने वाली वर्तमान पहलें
- उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: यह इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, दूरसंचार उपकरण, सौर मॉड्यूल और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करती है।
- यह भारत को उच्च-मूल्य वैश्विक उत्पादन नेटवर्क में एकीकृत करने का प्रयास करती है।
- आत्मनिर्भर भारत अभियान: यह महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता पर केंद्रित है और वैश्विक रूप से जुड़े रहते हुए घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन देता है।
- राष्ट्रीय सेमीकंडक्टर मिशन: यह सेमीकंडक्टर निर्माण, पैकेजिंग और डिज़ाइन पारिस्थितिकी तंत्र को समर्थन देता है तथा आयातित चिप्स पर निर्भरता को कम करता है।
- स्टार्टअप इंडिया और डीप-टेक पारिस्थितिकी तंत्र: यह AI, जैव प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और उन्नत विनिर्माण में नवाचार को प्रोत्साहित करता है।
- पीएम गति शक्ति और राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति: ये बुनियादी ढांचे की दक्षता में सुधार करते हैं, लॉजिस्टिक्स लागत घटाते हैं और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाते हैं।
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI): UPI, आधार, डिजिलॉकर और ONDC नवाचार तथा उत्पादकता वृद्धि की सुदृढ़ आधार प्रदान करते हैं।
आगे की राह: भारत नई विकास रणनीति कैसे निर्माण कर सकता है?
- घरेलू औद्योगिक गहराई विकसित करना: भारत को केवल असेंबली स्तर से आगे बढ़कर पूर्ण विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना होगा।
- मुख्य क्षेत्र: इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, हरित प्रौद्योगिकी और उन्नत मशीनरी।
- R&D निवेश में वृद्धि: भारत को समय के साथ R&D व्यय को GDP के कम से कम 2% तक बढ़ाने का लक्ष्य रखना चाहिए।
- उपायों में कर प्रोत्साहन, विश्वविद्यालय-उद्योग सहयोग, डीप-टेक स्टार्टअप्स के लिए वेंचर कैपिटल समर्थन और नवाचार वित्तपोषण में पेंशन फंड की भागीदारी शामिल है।
- घरेलू मांग का विस्तार: विकास के लिए आय वृद्धि आवश्यक है। इसके लिए कृषि उत्पादकता बढ़ाना, वेतन अनुपालन, कौशल विकास और MSME सुदृढ़ीकरण जरूरी है।
एक बड़ा घरेलू बाजार सतत विकास का आधार बन सकता है। - योजनाबद्ध शहरीकरण को प्रोत्साहन: नए शहर और विकास केंद्र वर्तमान महानगरों पर दबाव कम कर सकते हैं, निर्माण और विनिर्माण रोजगार उत्पन्न कर सकते हैं तथा बेहतर बुनियादी ढांचे के माध्यम से उत्पादकता बढ़ा सकते हैं।
- अमरावती जैसे भूमि-पूलिंग मॉडल उपयोगी उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
- मानव पूंजी में निवेश: भारत का जनसांख्यिकीय लाभ तभी आर्थिक लाभ बन सकता है जब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप और उद्योग-सम्बद्ध कौशल विकास हो।
- लक्ष्य यह होना चाहिए कि युवाओं के लिए “कमाते हुए सीखने” के अवसर बनाए जाएँ।
- संस्थानों और शासन का सुदृढ़ीकरण: पारदर्शी राजनीतिक वित्तपोषण, पूर्वानुमेय विनियमन, अनुबंध प्रवर्तन और व्यवसाय सुगमता में सुधार दीर्घकालिक निवेश एवं नवाचार के लिए अनिवार्य हैं।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] 1991 के सुधार प्रतिमान से परे भारत को एक नई विकास रणनीति की आवश्यकता क्यों है, इसका परीक्षण कीजिए। ऐसी रणनीति के प्रमुख स्तंभों पर चर्चा कीजिए। |
स्रोत: HT
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