पाठ्यक्रम: GS3/ भारतीय अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- वैश्विक ऊर्जा कीमतों में वृद्धि, भारतीय रुपये पर दबाव, बढ़ते राजकोषीय घाटे, सब्सिडी का भार और धीमी आर्थिक वृद्धि ने 1991 में किए गए आर्थिक सुधारों जैसे संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता पर परिचर्चा को पुनर्जीवित कर दिया है।
भारत आर्थिक दबाव का सामना क्यों कर रहा है?
- वैश्विक ऊर्जा कीमतों में वृद्धि: मध्य पूर्व में जारी संकट ने वैश्विक कच्चे तेल और उर्वरक कीमतों को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा दिया है।
- उच्च आयात लागत भारत के व्यापार संतुलन और चालू खाते के घाटे पर दबाव डाल रही है।
- ऊर्जा कीमतों में वृद्धि परिवहन और उत्पादन लागत को भी बढ़ा रही है।
- भारतीय रुपये का अवमूल्यन: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार गिर रहा है और लगभग ₹96.9–97 के रिकॉर्ड निम्न स्तर पर पहुँच गया है।
- कमजोर रुपया कच्चे तेल, उर्वरक और अन्य आवश्यक वस्तुओं के आयात की लागत बढ़ा देता है।
- निवेश भावना में गिरावट: वैश्विक अनिश्चितता और जोखिम से बचाव के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) निवेश वापस ले रहे हैं।
- घरेलू निवेशक भी मुद्रास्फीति दबाव और धीमी आर्थिक वृद्धि के कारण सतर्कता बरत रहे हैं।
- मुद्रास्फीति का दबाव: ईंधन, उर्वरक और खाद्य कीमतों में वृद्धि से अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ रहा है।
- यदि मुद्रास्फीति भारतीय रिज़र्व बैंक की सहनशीलता सीमा से ऊपर जाती है, तो RBI को रेपो दर बढ़ानी पड़ सकती है, जिससे व्यवसायों और उपभोक्ताओं के लिए उधारी लागत बढ़ेगी तथा आर्थिक वृद्धि धीमी होगी।
- जलवायु संबंधी चिंताएँ: प्रबल एल नीनो की आशंका ने कम वर्षा और कृषि उत्पादकता में गिरावट की चिंता बढ़ा दी है।
- कमजोर कृषि उत्पादन ग्रामीण आय को कम कर सकता है और खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ा सकता है।
सब्सिडी क्यों बड़ी चिंता बन रही है?
- उर्वरक सब्सिडी का भार: भारत अपनी यूरिया आवश्यकता का लगभग एक-चौथाई हिस्सा वैश्विक बाज़ार से आयात करता है।
- आयातित यूरिया किसानों को अत्यधिक सब्सिडी पर बेचा जाता है, जिससे भारी राजकोषीय भार उत्पन्न होता है।
- अत्यधिक सब्सिडी से यूरिया का दुरुपयोग और कालाबाज़ारी को बढ़ावा मिलता है।
- असंतुलित उर्वरक उपयोग मृदा के स्वास्थ्य और कृषि स्थिरता को प्रभावित करता है।
- खाद्य सब्सिडी का भार: सरकार 800 मिलियन से अधिक लोगों को मुफ्त या अत्यधिक सब्सिडी वाला खाद्यान्न प्रदान करती है।
- बड़े पैमाने पर खाद्य सब्सिडी व्यय सरकार की पूंजी निवेश और अवसंरचना विकास की क्षमता को सीमित करता है।
आवश्यक आर्थिक सुधार
- उर्वरक सब्सिडी सुधार: सरकार यूरिया सब्सिडी को सीधे किसानों तक पहुँचाने के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) प्रणाली अपना सकती है।
- सब्सिडी को भूमि स्वामित्व आकार से जोड़ा जा सकता है और PM-किसान डेटाबेस से एकीकृत किया जा सकता है।
- यूरिया को पोषक तत्व-आधारित सब्सिडी (NBS) योजना में शामिल किया जा सकता है।
- खाद्य सब्सिडी सुधार: सरकार खाद्य सुरक्षा योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या को तर्कसंगत बना सकती है।
- सब्सिडी लाभों को वास्तविक रूप से कमजोर वर्गों तक लक्षित किया जा सकता है।
- राजकोषीय समेकन उपाय: सब्सिडी का तर्कसंगतीकरण राजकोषीय घाटे को कम कर सकता है और व्यापक आर्थिक स्थिरता में सुधार कर सकता है।
- सब्सिडी सुधारों से हुई बचत को अवसंरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार सृजन में पुनर्निर्देशित किया जा सकता है।
चुनौतियाँ
- राजनीतिक प्रतिरोध: सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाएँ राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दे हैं।
- सामाजिक चिंताएँ: अचानक सब्सिडी में कटौती गरीब और सीमांत परिवारों के लिए कठिनाई बढ़ा सकती है।
- प्रशासनिक चुनौतियाँ: DBT आधारित सुधारों के लिए सटीक भूमि अभिलेख और विश्वसनीय लाभार्थी डेटाबेस आवश्यक हैं।
- किरायेदार किसान: यदि सुधार सावधानीपूर्वक डिज़ाइन न किए जाएँ तो किरायेदार और अनौपचारिक कृषक बाहर हो सकते हैं।
निष्कर्ष
- भारत की वर्तमान आर्थिक चुनौतियाँ कल्याणकारी उद्देश्यों और राजकोषीय स्थिरता के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
- सब्सिडी, राजकोषीय प्रबंधन और संसाधन आवंटन में संरचनात्मक सुधार आर्थिक लचीलापन बढ़ा सकते हैं तथा निवेशकों का विश्वास बहाल कर सकते हैं।
- हालाँकि, सुधारों को सावधानीपूर्वक लागू करना आवश्यक है ताकि कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके और दीर्घकालिक स्थिरता बनी रहे।
1991 आर्थिक सुधार
- पृष्ठभूमि: 1991 में भारत गंभीर भुगतान संतुलन संकट का सामना कर रहा था और विदेशी मुद्रा भंडार केवल कुछ सप्ताह के आयात के लिए पर्याप्त था।
- उच्च राजकोषीय घाटा, बढ़ती मुद्रास्फीति और बाहरी ऋण ने अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया था। भारत को आपातकालीन ऋण प्राप्त करने के लिए स्वर्ण भंडार गिरवी रखना पड़ा।
- मुख्य सुधार:
- उदारीकरण: अधिकांश क्षेत्रों के लिए औद्योगिक लाइसेंसिंग समाप्त कर दी गई।
- निजीकरण: सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों में विनिवेश और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा दिया गया।
- वैश्वीकरण: आयात प्रतिबंधों को कम किया गया और विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया गया।
- परिणाम: भारत ने आगामी दशकों में उच्च आर्थिक वृद्धि प्राप्त की।
- विदेशी मुद्रा भंडार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
- निजी क्षेत्र आर्थिक वृद्धि का प्रमुख चालक बनकर उभरा।
Source: IE
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