भारतीय रुपये पर दबाव और भारत के बाह्य क्षेत्र में उभरती चुनौतियाँ 

पाठ्यक्रम: GS3/भारतीय अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारतीय रुपये के हालिया अवमूल्यन ने एक बार पुनः भारत के बाह्य क्षेत्र की संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर किया है।

परिचय

  • यह स्थिति भारत के भुगतान संतुलन (BoP), आयातित ऊर्जा पर निर्भरता, बढ़ते व्यापार घाटे और वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता से जुड़ी गहरी चिंताओं को दर्शाती है।
  • स्थिति विशेष रूप से गंभीर तब हो जाती है जब पश्चिम एशिया में तनाव होर्मुज़ जलडमरूमध्य को प्रभावित करता है।

भुगतान संतुलन (Balance of Payments) क्या है?

  • भुगतान संतुलन (BoP) किसी देश और विश्व के बीच एक निश्चित अवधि में होने वाले सभी आर्थिक लेन-देन का व्यापक अभिलेख है।
    • चालू खाता : इसमें वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार, प्रेषण एवं आय प्रवाह शामिल होते हैं। भारत सामान्यतः चालू खाते में घाटा दर्ज करता है क्योंकि आयात निर्यात से अधिक होते हैं।
    • पूँजी खाता : इसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI), बाहरी ऋण और बैंकिंग पूँजी शामिल होती है।
      • भारत अपने चालू खाते के घाटे को वित्तपोषित करने के लिए पूँजी प्रवाह पर अत्यधिक निर्भर है।

रुपया में गिरावट के कारण

  • कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि: भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85–90% आयात करता है।
    • तेल आयात अमेरिकी डॉलर में भुगतान किए जाते हैं, अतः वैश्विक कीमतें बढ़ने पर डॉलर की माँग बढ़ जाती है।
    • परिणामस्वरूप:
      • आयात बिल तेज़ी से बढ़ता है।
      • डॉलर की माँग बढ़ती है।
      • रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है।
    • महँगे ईंधन आयात से मुद्रास्फीति बढ़ती है।
      • इस प्रकार तेल कीमतों का झटका सीधे विनिमय दर अस्थिरता में बदल जाता है।
  • होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निर्भरता: यह विश्व का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग है जो फारस की खाड़ी को वैश्विक बाज़ारों से जोड़ता है।
    • भारत के कच्चे तेल और एलएनजी आयात का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आता है।
    • इससे भारत का व्यापार घाटा और बढ़ जाता है तथा रुपये पर दबाव पड़ता है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

  • चालू खाते का घाटा (CAD) बढ़ना: आयात बिल में वृद्धि और निर्यात में समान वृद्धि न होने से चालू खाते का घाटा बढ़ता है।
    • बढ़ता CAD विदेशी पूँजी पर अधिक निर्भरता, बाहरी आघातों के प्रति बढ़ी हुई संवेदनशीलता और निवेशकों के विश्वास में कमी को दर्शाता है।
    • यदि पूँजी प्रवाह एक साथ धीमा हो जाए, तो रुपये पर गंभीर अवमूल्यन का दबाव पड़ता है।
  • आयातित मुद्रास्फीति: कमजोर रुपया आयात को महँगा बना देता है। इससे आयातित मुद्रास्फीति उत्पन्न होती है, विशेषकर ईंधन, उर्वरक और रसोई गैस में।
    • उच्च ईंधन कीमतें परिवहन और उत्पादन लागत को सभी क्षेत्रों में बढ़ा देती हैं, जिससे उपभोक्ताओं एवं उद्योगों दोनों पर प्रभाव पड़ता है।
  • विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव: अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) प्रायः अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर हस्तक्षेप करता है।
    • लगातार हस्तक्षेप विदेशी मुद्रा भंडार को कम कर सकता है, नीतिगत लचीलापन सीमित कर सकता है और बाह्य क्षेत्र की स्थिरता को लेकर चिंताएँ बढ़ा सकता है।
    • यद्यपि भारत के पास कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सुदृढ़ भंडार हैं, फिर भी लंबे समय तक बाहरी आघात कमजोरियाँ उत्पन्न कर सकते हैं।
  • अस्थिर पूँजी प्रवाह का जोखिम: भारत अपने बाह्य घाटे का एक हिस्सा विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPIs) से वित्तपोषित करता है।
    • वैश्विक अनिश्चितता के दौरान निवेशक प्रायः उभरते बाज़ारों से पूँजी निकाल लेते हैं, डॉलर की माँग बढ़ती है और मुद्रा का अवमूल्यन तेज़ हो जाता है।
    • इससे वित्तीय बाज़ारों में अस्थिरता बढ़ जाती है।

भारत के बाह्य क्षेत्र को मज़बूत करने के उपाय

  • ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण: खाड़ी तेल पर अत्यधिक निर्भरता कम कर अन्य देशों से आयात बढ़ाना।
  • रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार: अस्थायी वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों से निपटने के लिए तेल और गैस भंडार बढ़ाना।
  • नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण को तटवर करना: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में निवेश बढ़ाना।
  • निर्यात प्रतिस्पर्धा को सुदृढ़ करना: विनिर्माण दक्षता, लॉजिस्टिक्स, आपूर्ति श्रृंखला और तकनीकी क्षमता में सुधार करना।
  • स्थिर पूँजी प्रवाह को प्रोत्साहित करना: दीर्घकालिक FDI, घरेलू विनिर्माण और अवसंरचना निवेश को प्राथमिकता देना।

निष्कर्ष

  • भारतीय रुपये पर दबाव अस्थायी वित्तीय व्यवधान नहीं, बल्कि भारत के बाह्य क्षेत्र की गंभीर संरचनात्मक चुनौतियों को दर्शाता है।
  • यद्यपि भारत के पास बड़े विदेशी मुद्रा भंडार और बढ़ती अर्थव्यवस्था जैसी सुदृढ़ता है, दीर्घकालिक स्थिरता के लिए ऊर्जा विविधीकरण, निर्यात प्रतिस्पर्धा, विनिर्माण और बाहरी निर्भरता में कमी जैसे संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं।
  • इन बुनियादों को सुदृढ़ करना व्यापक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने और अनिश्चित वैश्विक वातावरण में भारत की विकास यात्रा को सुरक्षित रखने के लिए अनिवार्य होगा।

Source: IE

 

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