पाठ्यक्रम: GS3/साइबर सुरक्षा
संदर्भ
- हाल ही में इस्राइल-ईरान संघर्ष से जुड़ी साइबर गतिविधियों ने यह उजागर किया कि अब पारंपरिक सैन्य हमलों के साथ-साथ डिजिटल हमले भी किए जा रहे हैं।
साइबर वॉरफेयर के बारे में
- साइबर वॉरफेयर का अर्थ है डिजिटल तकनीकों का उपयोग करके किसी अन्य राज्य की प्रणालियों और अवसंरचना को बाधित करना, क्षति पहुँचाना या रणनीतिक लाभ प्राप्त करना।
- यह साइबरस्पेस में संचालित होता है और पारंपरिक वॉरफेयर के विपरीत संचार, वित्तीय एवं रक्षा नेटवर्क को लक्षित करता है।
साइबर वॉरफेयर के घटक
- साइबर जासूसी: संवेदनशील सैन्य या रणनीतिक जानकारी की चोरी।
- साइबर हमले: मैलवेयर, रैनसमवेयर या DDoS हमलों के माध्यम से नेटवर्क, वेबसाइट या अवसंरचना को बाधित करना।
- सूचना वॉरफेयर: गलत सूचना और प्रचार के माध्यम से जनमत को प्रभावित करना।
- महत्वपूर्ण अवसंरचना पर हमला: विद्युत ग्रिड, बैंकिंग प्रणाली, रक्षा प्रणाली और स्वास्थ्य नेटवर्क को निशाना बनाना।
- मनोवैज्ञानिक अभियान: डिजिटल माध्यम से मनोबल और जन धारणा को प्रभावित करना।
वॉरफेयर के नए साधन के रूप में साइबर अभियान
- आधुनिक संघर्षों में भौतिक हमलों के साथ साइबर अभियानों का संयोजन बढ़ रहा है।
- अमेरिका-इस्राइल-ईरान तनाव के दौरान समाचार पोर्टलों और संचार अनुप्रयोगों की हैकिंग की रिपोर्टें सामने आईं।
उभरते रुझान
- भौतिक हमलों से पूर्व संचार और रक्षा प्रणालियों को निष्क्रिय करने हेतु साइबर अभियानों का प्रयोग।
- डिजिटल हमले भौगोलिक सीमाओं से परे संघर्ष को विस्तारित करते हैं।
- गैर-राज्य हैकर समूह प्रॉक्सी के रूप में कार्य करते हैं, जिससे जवाबदेही कठिन हो जाती है।
- राज्य साइबर उपकरणों का प्रयोग आक्रामक और रक्षात्मक दोनों रणनीतिक उद्देश्यों हेतु करते हैं।
- इस प्रकार, भूमि, समुद्र, वायु और अंतरिक्ष के बाद साइबरस्पेस वॉरफेयर का ‘पाँचवाँ क्षेत्र’ बन गया है।
साइबर वॉरफेयर से जुड़े मुद्दे और चिंताएँ
- जिम्मेदारी तय करने में कठिनाई: साइबर हमले कई न्यायक्षेत्रों और गुमनाम नेटवर्कों से होकर गुजरते हैं, जिससे वास्तविक अपराधी की पहचान कठिन होती है।
- अंतरराष्ट्रीय कानून में अस्पष्टता: संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) बल प्रयोग को प्रतिबंधित करता है और सिद्धांततः साइबरस्पेस पर भी लागू होता है।
- किंतु यह स्पष्ट नहीं है कि कब साइबर हमला ‘बल प्रयोग’ की श्रेणी में आता है।
- कानूनी उपायों की कमी: पीड़ितों को न्याय मिलना दुर्लभ है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों को राज्य की सहमति चाहिए; घरेलू न्यायालयों में संप्रभु प्रतिरक्षा राज्यों की रक्षा करती है; और साक्ष्य प्रायः गोपनीय या तकनीकी रूप से जटिल होते हैं।
- महत्वपूर्ण अवसंरचना पर खतरा: साइबर हमले बैंकिंग प्रणाली, ऊर्जा ग्रिड, स्वास्थ्य सेवाओं और शासन प्लेटफॉर्म को बाधित कर सकते हैं। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर जोखिम उत्पन्न होता है।
- वृद्धि का जोखिम: साइबर हमले प्रतिशोध को प्रेरित कर सकते हैं और पारंपरिक सैन्य सीमा पार किए बिना भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा सकते हैं।
- गैर-राज्य अभिनेताओं की भूमिका: हैक्टिविस्ट समूह और साइबर मर्सिनरी के सैनिक अंतरराष्ट्रीय कानून के अंतर्गत राज्य की जिम्मेदारी को जटिल बनाते हैं।
संबंधित अंतरराष्ट्रीय कानून
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर:
- अनुच्छेद 2(4): किसी अन्य राज्य के विरुद्ध बल प्रयोग या धमकी को प्रतिबंधित करता है।
- अनुच्छेद 51: सशस्त्र हमले की स्थिति में आत्मरक्षा की अनुमति देता है।
- टालिन मैनुअल: NATO विशेषज्ञों द्वारा तैयार, यह बताता है कि अंतरराष्ट्रीय कानून साइबर वॉरफेयर पर कैसे लागू होता है, यद्यपि यह बाध्यकारी नहीं है।
- बुडापेस्ट कन्वेंशन ऑन साइबरक्राइम: साइबर अपराध के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है। भारत संप्रभुता और प्रारूपण में भागीदारी न होने की चिंताओं के कारण हस्ताक्षरकर्ता नहीं है।
- संयुक्त राष्ट्र साइबरक्राइम कन्वेंशन: वैश्विक सहयोग को सुदृढ़ करने का प्रयास करता है, किंतु राज्य-प्रायोजित साइबर वॉरफेयर को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करता।
भारत द्वारा साइबर वॉरफेयर से निपटने के उपाय
- संस्थागत उपाय:
- CERT-In (भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल): साइबर घटनाओं की प्रतिक्रिया हेतु नोडल एजेंसी।
- राष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र (NCIIPC): महत्वपूर्ण क्षेत्रों की सुरक्षा।
- रक्षा साइबर एजेंसी (DCA): सैन्य साइबर अभियानों का संचालन।
- नीतिगत पहल:
- राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति, 2013।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023।
- क्षमता निर्माण हेतु साइबर सुरक्षित भारत पहल।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग:
- भारत संयुक्त राष्ट्र के ओपन-एंडेड वर्किंग ग्रुप ऑन साइबर सुरक्षा में सक्रिय भागीदारी करता है।
- अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ द्विपक्षीय साइबर सहयोग।
साइबर वॉरफेयर के विरुद्ध सुदृढ़ीकरण उपाय
- स्पष्ट साइबर प्रतिरोध विकसित करना: भारत को आक्रामक और रक्षात्मक क्षमताओं सहित व्यापक राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीति तैयार करनी चाहिए।
- जिम्मेदारी निर्धारण क्षमता में सुधार: AI-आधारित साइबर फॉरेंसिक और खुफिया साझाकरण में निवेश आवश्यक।
- महत्वपूर्ण अवसंरचना को सुदृढ़ करना: नियमित सुरक्षा ऑडिट और स्वदेशी साइबर सुरक्षा तकनीकों को बढ़ावा।
- कुशल कार्यबल का निर्माण: साइबर सुरक्षा शिक्षा और विशेष प्रशिक्षण का विस्तार।
- अंतरराष्ट्रीय साइबर मानदंडों को बढ़ावा देना: भारत को साइबरस्पेस में जिम्मेदार राज्य व्यवहार हेतु वैश्विक नियमों को सक्रिय रूप से आकार देना चाहिए।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी: उद्योग के साथ सहयोग आवश्यक है क्योंकि अधिकांश डिजिटल अवसंरचना निजी स्वामित्व में है।
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