भारत का उत्तर–दक्षिण विभाजन: संघवाद के लिए एक संरचनात्मक चुनौती

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन; संघवाद

संदर्भ

  • भारत का उत्तर–दक्षिण विभाजन अब चक्रीय नहीं बल्कि संरचनात्मक हो गया है, जिसके समाधान हेतु केवल क्रमिक नीतिगत सुधार पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए संस्थागत नवाचार की आवश्यकता है।

उत्तर–दक्षिण विभाजन क्या है?

  • यह व्यवस्थित सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक असमानताओं को संदर्भित करता है, जो निम्नलिखित क्षेत्रों के बीच विद्यमान हैं:
    • दक्षिणी/प्रायद्वीपीय राज्य: तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश
    • उत्तरी/हिंदी हृदयभूमि: उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़

विभाजन का स्वरूप

  • आर्थिक असमानता: दक्षिणी राज्यों की प्रति व्यक्ति आय उत्तरी राज्यों से 2–3 गुना अधिक है। जनसंख्या कम होने के बावजूद ये GDP में असमान रूप से अधिक योगदान करते हैं।
  • मानव विकास अंतर: दक्षिणी राज्यों में साक्षरता, स्वास्थ्य परिणाम और लैंगिक सूचकांक बेहतर हैं। उत्तरी राज्यों में HDI से संबंधित संकेतक काफी पीछे हैं।
  • जनसांख्यिकीय विरोधाभास: उत्तर में उच्च जनसंख्या वृद्धि और प्रजनन दर; दक्षिण में निम्न प्रजनन दर एवं वृद्ध होती जनसंख्या।
  • निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण समस्या: संसदीय सीटें जनसंख्या पर आधारित हैं।
    • उत्तरी राज्यों को अधिक सीटें मिलती हैं (अधिक राजनीतिक शक्ति), जबकि दक्षिणी राज्यों को आर्थिक योगदान के बावजूद कम प्रतिनिधित्व का जोखिम है।
    • इससे ‘जनसांख्यिकीय शक्ति बनाम आर्थिक शक्ति’ का असंतुलन उत्पन्न होता है।

तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य

  • अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे संघीय देशों में आर्थिक और जनसांख्यिकीय प्रभुत्व प्रायः एक-दूसरे से सामंजस्यशील हैं।
  • सोवियत संघ और यूगोस्लाविया जैसे मामलों में आर्थिक अल्पसंख्यक द्वारा राजनीतिक बहुसंख्यक को सब्सिडी देने से अस्थिरता उत्पन्न हुई।
    • भारत भी लोकतांत्रिक ढाँचे के अंदर इसी प्रकार के संरचनात्मक असंतुलन के जोखिम का सामना कर रहा है।

उत्तर–दक्षिण विभाजन को सुदृढ़ करने वाले कारक एवं समाधान

  • राजनीतिक प्रतिनिधित्व में सुधार
    • डिग्रेसिव प्रोपोर्शनैलिटी अपनाना: जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व और राज्यों की समानता के बीच संतुलन स्थापित करना; जनसंख्या अधिक वाले राज्यों के प्रभुत्व को रोकना।
    • संघीय संस्थाओं को सशक्त करना: अंतर-राज्य परिषद को पुनर्जीवित करना; परामर्श आधारित निर्णय-निर्माण सुनिश्चित करना; जनसांख्यिकीय न्याय के साथ राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना।
  • वित्तीय संघवाद एवं संसाधन समानता
    • वित्त आयोग अंतरण को सुदृढ़ करना: गरीब राज्यों को अधिक समानता अनुदान देना; केवल जनसंख्या और आय दूरी ही नहीं, बल्कि मानव विकास सूचकांकों को भी मानदंड बनाना।
    • GST क्षतिपूर्ति का युक्तिकरण: उत्पादक राज्यों में राजस्व हानि की चिंताओं का समाधान; कर वितरण में न्याय सुनिश्चित करना।
    • प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन: जनसंख्या नियंत्रण, शासन सुधार और सामाजिक क्षेत्र परिणामों के लिए राज्यों को पुरस्कृत करना।
  • उत्तरी राज्यों में मानव पूंजी विकास
    • प्राथमिक क्षेत्र: सार्वभौमिक विद्यालय शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना, और कौशल विकास।
      • मानव पूंजी की कमी क्षेत्रीय असमानता का मुख्य कारण है।
  • लक्षित क्षेत्रीय विकास
    • आकांक्षी जिला कार्यक्रम को सुदृढ़ करना: BIMARU राज्यों के पिछड़े जिलों पर ध्यान केंद्रित करना।
    • अवसंरचना निवेश: परिवहन, ऊर्जा, डिजिटल कनेक्टिविटी।
    • औद्योगिक विकेंद्रीकरण: कम विकसित क्षेत्रों में उद्योगों को प्रोत्साहित करना।
  • सहयोगी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद
    • सहयोगी संघवाद: नीति आयोग के माध्यम से केंद्र–राज्य सहयोग; केंद्रीय प्रभुत्व के बजाय नीति समन्वय।
    • प्रतिस्पर्धी संघवाद: शासन और सुधारों पर राज्यों को प्रतिस्पर्धा हेतु प्रोत्साहित करना।
    • स्वायत्तता और समानता के बीच संतुलन हेतु ‘नया संघीय समझौता’ आवश्यक है।
  • प्रवासन एवं श्रम एकीकरण का प्रबंधन: अंतर-राज्य प्रवासियों के अधिकारों की रक्षा; कल्याणकारी योजनाओं की पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करना (वन नेशन वन राशन कार्ड); सामाजिक एकीकरण नीतियों को बढ़ावा देना।
  • दक्षिणी राज्यों में आंतरिक सुधार: उन्नत राज्यों को भी राज्य के अंदर असमानता कम करनी होगी; श्रमिक वेतन और ग्रामीण समावेशन सुधारना होगा; विधि का शासन एवं शासन क्षमता को सुदृढ़ करना होगा।
    • समावेशिता के बिना विकास दीर्घकालिक स्थिरता को कमजोर करता है।

दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार

  • विकेंद्रीकरण: स्थानीय सरकारों (तीसरी श्रेणी) को सशक्त करना; अंतिम स्तर तक सेवा वितरण सुधारना।
  • संस्थागत सुदृढ़ीकरण: न्यायिक दक्षता और प्रशासनिक सुधार।
  • सामाजिक परिवर्तन: जाति और लैंगिक असमानता का समाधान; समावेशी सामाजिक नीतियों को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष

  • उत्तर–दक्षिण विभाजन का समाधान किसी एक नीति उपकरण से संभव नहीं है। इसके लिए बहुआयामी रणनीति आवश्यक है, जिसमें वित्तीय समानता, राजनीतिक संतुलन, मानव विकास और संस्थागत सुधार सम्मिलित हों।
  •  अंतिम लक्ष्य केवल असमानता कम करना नहीं, बल्कि एक सुदृढ़ और लचीला संघीय ढाँचा निर्मित करना है, जहाँ समानता एवं दक्षता दोनों सह-अस्तित्व में हों।
मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: भारत में क्षेत्रीय असमानताएँ एक विकासात्मक मुद्दे से बदलकर संघीय चुनौती का रूप ले चुकी हैं। उत्तर–दक्षिण विभाजन के संदर्भ में विवेचना कीजिए।

Source: TH

 

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