पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्सी बोर्ड (IBBI) ने कॉर्पोरेट देनदारों के व्यक्तिगत गारंटरों से संबंधित इन्सॉल्वेंसी समाधान कार्यवाहियों में लेनदारों के हितों की सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए चार प्रमुख संशोधनों का प्रस्ताव किया है।
पृष्ठभूमि
- इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 (IBC) के अंतर्गत, किसी कंपनी के ऋण की गारंटी देने वाले व्यक्तिगत गारंटर के विरुद्ध उस स्थिति में इन्सॉल्वेंसी कार्यवाही प्रारंभ की जा सकती है, जब कॉर्पोरेट देनदार अपने ऋण का भुगतान करने में चूक करता है।
- इस व्यवस्था का उद्देश्य लेनदारों की ऋण-वसूली, ऋण समाधान तथा गारंटर के वैध हितों के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना है।
- हालाँकि, वर्तमान में व्यक्तिगत गारंटरों से संबंधित नियम लेनदारों को कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी समाधान प्रक्रिया (CIRP) के अंतर्गत उपलब्ध सुरक्षा उपायों की तुलना में अपेक्षाकृत कम संरक्षण प्रदान करते हैं।
भारतीय इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्सी बोर्ड द्वारा प्रस्तावित प्रमुख संशोधन
- संबंधित पक्षों को मतदान से वंचित किया जाएगा: व्यक्तिगत गारंटर के संबंधित पक्ष के रूप में अर्हता रखने वाले लेनदारों को पुनर्भुगतान योजना पर मतदान करने से बाहर रखा जाएगा।
- वर्तमान में व्यक्तिगत गारंटर से संबंधित व्यवस्था में किसी सहयोगी पक्ष को मतदान से प्रतिबंधित किया गया है, किंतु ‘सहयोगी पक्ष’ की परिभाषा ‘संबंधित पक्ष’ की तुलना में अधिक संकीर्ण है।
- परिहार्य लेन-देन की अधिक गहन जाँच: समाधान पेशेवरों के लिए यह जाँचना अनिवार्य किया जाएगा कि संबंधित अवधि के दौरान गारंटर किसी अधिमान्य लेन-देन, कम मूल्य पर किए गए लेन-देन या अनुचित रूप से अत्यधिक ऋण-संबंधी लेन-देन में शामिल था या नहीं।
- उनके निष्कर्षों को पुनर्भुगतान योजना पर मतदान से पहले लेनदारों के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
- लेनदारों की स्वीकृति के पश्चात, समाधान पेशेवर ऐसे लेन-देन से संबंधित मामलों में उपयुक्त कानूनी कार्यवाही भी प्रारंभ करेंगे।
- संपत्तियों का स्वतंत्र मूल्यांकन: गारंटर की संपत्तियों का उचित मूल्य तथा वसूली योग्य मूल्य निर्धारित करने के लिए एक पंजीकृत मूल्यांकनकर्ता नियुक्त किया जाएगा।
- मूल्यांकन रिपोर्ट को पुनर्भुगतान योजना के साथ लेनदारों के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।
- लेनदारों के निर्णय के कारणों का अभिलेखीकरण: समाधान पेशेवरों के लिए केवल मतदान के परिणाम दर्ज करने के बजाय लेनदारों द्वारा लिए गए निर्णयों के पीछे हुई विचार-विमर्श प्रक्रिया तथा निर्णय के कारणों को भी दर्ज करना अनिवार्य किया जाएगा।
इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता (IBC), 2016
- भारत में बढ़ती अनर्जक परिसंपत्तियों (Non-Performing Assets) तथा ऋण-वसूली की अप्रभावी व्यवस्थाओं से निपटने के लिए वर्ष 2016 में इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता लागू की गई।
- इन्सॉल्वेंसी समाधान के उद्देश्य हैं:
- व्यवसाय का पुनरुद्धार: पुनर्गठन, स्वामित्व में परिवर्तन या विलय के माध्यम से व्यवसायों को बचाना।
- परिसंपत्तियों के मूल्य का अधिकतमकरण: देनदार की परिसंपत्तियों के मूल्य को संरक्षित करना तथा उसे अधिकतम करना।
- उद्यमिता एवं ऋण को बढ़ावा देना: उद्यमिता को प्रोत्साहित करना, ऋण की उपलब्धता में सुधार करना तथा लेनदारों एवं देनदारों सहित सभी हितधारकों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करना।
- वर्तमान में इन्सॉल्वेंसी समाधान प्रक्रिया में शामिल किसी कंपनी के लिए समाधान खोजने हेतु अधिकतम 330 दिनों की अवधि निर्धारित है।
- अन्यथा, कंपनी का परिसमापन कर दिया जाता है।
संस्थागत ढाँचा
- भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI): यह शीर्ष नियामक संस्था है, जो इन्सॉल्वेंसी समाधान पेशेवरों, इन्सॉल्वेंसी समाधान पेशेवर संस्थाओं तथा सूचना उपयोगिताओं के कामकाज की निगरानी करती है।
- राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT): यह वह न्यायनिर्णायक प्राधिकरण है जो इन्सॉल्वेंसी याचिकाओं को स्वीकार करने, स्थगन की घोषणा करने तथा कंपनियों एवं सीमित दायित्व वाली भागीदारी संस्थाओं (LLPs) की समाधान योजनाओं को अनुमोदित करने के लिए उत्तरदायी है।
- इन्सॉल्वेंसी समाधान पेशेवर (IPs): ये संकटग्रस्त संस्थाओं के मामलों का प्रशासन करते हैं, परिसंपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं तथा लेनदारों की बैठकों को सुगम बनाते हैं। ये संहिता एवं लागू नियमों के अनुरूप समाधान प्रक्रिया की निगरानी करते हैं।
- लेनदारों की समिति (CoC): यह संकटग्रस्त संस्था के वित्तीय लेनदारों से मिलकर बना सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय है। यह समाधान योजना का मूल्यांकन करता है, उस पर मतदान करता है तथा उसे अनुमोदित करता है।
स्रोत: IE