भारत के वस्त्र क्षेत्र के भविष्य में सततता का समावेश 

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारत का वस्त्र क्षेत्र सततता, संसाधन दक्षता तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने के उद्देश्य से सर्कुलर अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को तीव्र गति से अपना रहा है।

भारत में वस्त्र उद्योग का महत्व

  • वस्त्र एवं परिधान उद्योग भारत के सबसे बड़े विनिर्माण उद्योगों में से एक है।
  • यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 2 प्रतिशत का योगदान देता है तथा विनिर्माण क्षेत्र के सकल मूल्य संवर्धन (GVA) में लगभग 11 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है।
  • भारत विश्व का छठा सबसे बड़ा वस्त्र एवं परिधान निर्यातक है तथा वैश्विक निर्यात में इसकी लगभग 4 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
  • यह उद्योग प्रत्यक्ष रूप से 4.5 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है, जिनमें महिलाओं एवं ग्रामीण श्रमिकों की संख्या उल्लेखनीय है।

वस्त्र उद्योग के लिए सर्कुलर अर्थव्यवस्था 

  • सर्कुलर  अर्थव्यवस्था का उद्देश्य पुनः उपयोग , मरम्मत , पुनर्चक्रण , उन्नत पुनर्चक्रण  तथा संसाधन पुनर्प्राप्ति के माध्यम से संसाधनों के उत्पादक उपयोग की अवधि को अधिकतम करना है।
  • पारंपरिक “उत्पादन–उपयोग–त्याग” मॉडल के विपरीत, सर्कुलर अर्थव्यवस्था अपशिष्ट को कम करती है, जल एवं ऊर्जा की बचत करती है, कार्बन उत्सर्जन घटाती है तथा नए कच्चे माल पर निर्भरता कम करती है।
  • वस्त्रों की मरम्मत, पुनः उपयोग एवं पुनर्चक्रण की भारत की पारंपरिक परंपराएँ इस मॉडल के अनुरूप हैं।

भारत की वस्त्र मूल्य शृंखला में परिपत्रता

  • भारत में प्रतिवर्ष लगभग 78 लाख टन (7.8 मिलियन टन) वस्त्र अपशिष्ट का प्रबंधन किया जाता है।
  • इसमें 90 प्रतिशत से अधिक अपशिष्ट घरेलू पूर्व-उपभोक्ता तथा उपभोक्ता-पश्चात स्रोतों से प्राप्त होता है।
  • लगभग 70 प्रतिशत वस्त्र अपशिष्ट का पुनर्चक्रण, पुनः उपयोग, अपसाइक्लिंग अथवा डाउनसाइक्लिंग के माध्यम से पुनर्प्रयोग किया जाता है।
  • कारखानों से उत्पन्न पूर्व-उपभोक्ता अपशिष्ट का लगभग 95 प्रतिशत पुनर्प्राप्त कर लिया जाता है।
  • उपभोक्ता-पश्चात वस्त्र अपशिष्ट का लगभग 55 प्रतिशत लैंडफिल में जाने से रोका जाता है।
  • वस्त्र पुनर्चक्रण पारिस्थितिकी तंत्र 40–45 लाख लोगों, विशेषकर महिलाओं, को पुनर्चक्रण योग्य सामग्री के संग्रहण एवं छँटाई के माध्यम से आजीविका प्रदान करता है।

भारत में सफल सर्कुलर वस्त्र मॉडल

  • नवी मुंबई वस्त्र पुनर्प्राप्ति सुविधा: यह भारत की प्रथम नगर निगम आधारित वस्त्र पुनर्प्राप्ति सुविधा है।
    • इसमें वस्त्र संग्रहण, छँटाई, अपसाइक्लिंग, आधुनिक प्रौद्योगिकी तथा आजीविका सृजन को एकीकृत किया गया है।
    • इस पहल के अंतर्गत हजारों वस्त्र उत्पादों का प्रबंधन किया गया है, सैकड़ों अपसाइक्लिंग उत्पाद विकसित किए गए हैं, एक लाख से अधिक परिवारों तक पहुँच बनाई गई है तथा महिला शिल्पकारों को बाज़ार तक पहुँच प्रदान कर सशक्त बनाया गया है।
  • पानीपत (भारत का वस्त्र पुनर्चक्रण केंद्र): पानीपत भारत के सबसे बड़े डाउनस्ट्रीम वस्त्र पुनर्चक्रण क्लस्टर के रूप में उभरा है।
    • यहाँ संग्रहण, छँटाई, प्रसंस्करण, बुनाई तथा पुनर्चक्रण के माध्यम से प्रतिदिन 3,500 से 5,250 टन वस्त्र अपशिष्ट का प्रबंधन किया जाता है।
    • इस क्लस्टर में वस्त्र-से-वस्त्र उच्च मूल्य पुनर्चक्रण की व्यापक संभावनाएँ हैं।
  • कतरन बाज़ार, मंगोलपुरी (दिल्ली) — अनौपचारिक सर्कुलर अर्थव्यवस्था: यह मॉडल सततता में अनौपचारिक क्षेत्र के महत्वपूर्ण योगदान को दर्शाता है।
    • यहाँ श्रमिक परिधान उद्योगों से निकलने वाली कतरनों को एकत्र कर रंग एवं गुणवत्ता के आधार पर अलग करते हैं तथा पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को पानीपत भेजते हैं, जिससे भारत की सर्कुलर मूल्य शृंखला को सुदृढ़ता मिलती है।

वस्त्र मूल्य शृंखला में सरकारी पहलें

  • राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP): यह कार्यक्रम जैविक प्रमाणित उत्पादन को प्रोत्साहित करता है।
    • जैविक कपास का प्रमाणन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है।
    • इसके माध्यम से यूरोपीय बाजारों में निर्यात को बढ़ावा मिलता है।
  • जूट-आईकेयर (Jute-ICARE): यह कार्यक्रम जूट की वैज्ञानिक एवं सतत खेती को प्रोत्साहन देता है।
    • इसके अंतर्गत प्रमाणित बीजों एवं उन्नत रेटिंग तकनीकों को प्रोत्साहित किया जाता है।
    • इसका विस्तार अनेक राज्यों एवं कृषि क्षेत्रों तक किया गया है।
  • न्यू एज फाइबर मिशन: फ्लैक्स, सिसल तथा रेमी जैसे सतत रेशों को बढ़ावा देना इसका उद्देश्य है।
    • इसका लक्ष्य भारत को जलवायु-अनुकूल रेशा उत्पादन में वैश्विक अग्रणी बनाना है।
  • राष्ट्रीय फाइबर योजना : यह प्राकृतिक रेशों, मानव-निर्मित रेशों तथा उन्नत रेशों के विकास पर केंद्रित है।
    • इसका उद्देश्य आयात निर्भरता कम करना तथा नवाचार को प्रोत्साहित करना है।
    • पीएम मित्र पार्क: प्रधानमंत्री मेगा एकीकृत वस्त्र क्षेत्र एवं परिधान (PM MITRA) पार्क 5F दृष्टिकोण पर आधारित हैं— कृषि → रेशा → कारखाना → फैशन → वैश्विक बाज़ार
    • इन पार्कों की प्रमुख सततता विशेषताएँ—
      • सामूहिक अपशिष्ट जल शोधन संयंत्र (CETPs)
      • अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण
      • वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन
      • साझा हरित अवसंरचना
    • वर्तमान में विभिन्न राज्यों में सात एकीकृत पीएम मित्र पार्क विकसित किए जा रहे हैं।
  • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को सहायता: चूँकि भारत के वस्त्र उत्पादन की 80 प्रतिशत से अधिक क्षमता MSMEs के पास है, इसलिए उन्हें हरित परिवर्तन हेतु सहायता प्रदान की जा रही है।
    • MSE-GIFT
      • ब्याज सब्सिडी
      • ऋण गारंटी
      • हरित प्रौद्योगिकियों को अपनाने हेतु सहायता
    • MSE-SPICE
      • सर्कुलर अर्थव्यवस्था को बढ़ावा
      • संसाधन दक्ष प्रौद्योगिकियों का प्रोत्साहन
      • सतत मशीनरी हेतु पूंजीगत सब्सिडी
  • भारतीय कार्बन बाज़ार : कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS), 2023 के अंतर्गत वस्त्र उद्योगों को अपने कार्बन उत्सर्जन की रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
    • निर्धारित लक्ष्य से कम उत्सर्जन करने वाले उद्योगों को कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र प्रदान किए जाएँगे, जिससे उत्सर्जन में और अधिक कमी लाने हेतु वित्तीय प्रोत्साहन मिलेगा।

अपशिष्ट प्रबंधन एवं संसाधन पुनर्प्राप्ति

  • वस्त्र पुनर्चक्रण की संभावनाएँ: भारत का वस्त्र पुनर्चक्रण उद्योग वर्ष 2030 तक लगभग 3.5 अरब अमेरिकी डॉलर का होने की संभावना है।
    • आगामी पाँच वर्षों में इससे लगभग एक लाख हरित रोजगार सृजित होने की संभावना है।
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत अधिसूचित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 अपशिष्ट पृथक्करण, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR), संसाधन पुनर्प्राप्ति तथा सर्कुलर अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को और अधिक सुदृढ़ करते हैं।
    • ये नियम वस्त्र जैसे उच्च ऊष्मीय मान वाले अपशिष्टों से रिफ्यूज़ डिराइव्ड फ्यूल (RDF) के उपयोग को भी प्रोत्साहित करते हैं।
  • राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन (NTTM): यह मिशन वस्त्र अपशिष्ट के रूपांतरण, जैव-आधारित संसाधनों के उपयोग, कार्बन फाइबर तथा उन्नत सतत सामग्रियों पर अनुसंधान को प्रोत्साहित करता है।
  • अपशिष्ट जल मानक: वस्त्र उद्योगों के लिए अपशिष्ट जल शोधन संयंत्र (ETPs) तथा सामूहिक अपशिष्ट जल शोधन संयंत्र (CETPs) की स्थापना अनिवार्य है, ताकि वे पर्यावरण (संरक्षण) नियमों के अंतर्गत निर्धारित पर्यावरणीय निर्वहन मानकों का पालन कर सकें।

सतत बाज़ारों को प्रोत्साहन

  • इको-मार्क योजना, 2024: भारत की इको-मार्क प्रमाणन योजना के अंतर्गत वस्त्रों को भी शामिल किया गया है।
    • इस योजना के अंतर्गत उत्पादों का मूल्यांकन संसाधन दक्षता, ऊर्जा उपयोग, जलवायु पर प्रभाव, अपशिष्ट उत्पादन तथा हानिकारक रसायनों की उपस्थिति के आधार पर किया जाता है।
  • अनुरेखणीयता एवं गुणवत्ता प्रमाणन: कस्तूरी कॉटन तथा सिल्क मार्क जैसी पहलें वस्त्रों की अनुरेखणीयता , उत्तरदायी स्रोतों से प्राप्ति तथा अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उनकी स्वीकार्यता को बढ़ावा देती हैं।
  • भारत टेक्स : भारत टेक्स भारत के प्रमुख वस्त्र प्रदर्शनी के रूप में उभरकर सामने आया है।
    • इसमें सतत वस्त्र , तकनीकी वस्त्र , MSMEs द्वारा विकसित नवाचार, सर्कुलर अर्थव्यवस्था से जुड़ी सर्वोत्तम प्रथाओं तथा अंतरराष्ट्रीय क्रेता-विक्रेता बैठकें प्रमुख आकर्षण हैं।
    • यह आयोजन सतत वस्त्र विनिर्माण के वैश्विक केंद्र के रूप में भारत की महत्वाकांक्षा को प्रतिबिंबित करता है।
  • हानिकारक रसायनों में कमी: भारत ने बेंज़िडीन (Benzidine) आधारित रंगों तथा विभिन्न हानिकारक एज़ो (Azo) रंगों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया है।
    • साथ ही, भारत ने स्थायी कार्बनिक प्रदूषकों (POPs) पर स्टॉकहोम अभिसमय के अंतर्गत अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करने का संकल्प व्यक्त किया है।
  • जन-जागरूकता अभियान: इस दिशा में प्रमुख कार्यक्रमों में सस्टेनेबल रेज़ोल्यूशन (SURE), सर्किल बैक अभियान , सर्कुलर संवाद तथा क्लस्टर एक्सचेंज मैकेनिज़्म शामिल हैं।
    • ये कार्यक्रम सतत उपभोग, पुनर्चक्रण तथा उद्योग में पर्यावरणीय, सामाजिक एवं सुशासन (ESG) मानकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

चुनौतियाँ

  • मिश्रित रेशों वाले वस्त्रों का सीमित पुनर्चक्रण।
  • पुनर्चक्रण क्षेत्र में अनौपचारिक क्षेत्र का प्रभुत्व।
  • वस्त्र-से-वस्त्र पुनर्चक्रण हेतु उन्नत प्रौद्योगिकियों का अभाव।
  • वस्त्र प्रसंस्करण में अत्यधिक जल की खपत।
  • रंगाई इकाइयों से होने वाला रासायनिक प्रदूषण।
  • सतत फैशन के प्रति उपभोक्ताओं में सीमित जागरूकता।
  • आपूर्ति शृंखलाओं में अधिक अनुरेखणीयता की आवश्यकता।

आगे की राह

  • वस्त्र क्षेत्र में विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
  • रेशा-से-रेशा पुनर्चक्रण प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा दिया जाए।
  • अनौपचारिक अपशिष्ट संग्राहकों का औपचारिकीकरण तथा उन्हें संगठित प्रणाली में सम्मिलित किया जाए।
  • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए हरित वित्त की उपलब्धता का विस्तार किया जाए।
  • डिजिटल प्रौद्योगिकियों के माध्यम से आपूर्ति शृंखला की अनुरेखणीयता को सुदृढ़ बनाया जाए।
  • सतत सार्वजनिक खरीद को प्रोत्साहित किया जाए।
  • जैव-आधारित रेशों तथा तकनीकी वस्त्रों पर अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा दिया जाए।
  • भारतीय मानकों को उभरते हुए वैश्विक सततता मानकों एवं विनियमों के अनुरूप बनाया जाए।

Source: PIB

 

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