पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी/GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- स्टॉकहोम अंतरराष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान (SIPRI) की 2026 की रिपोर्ट में पहली बार भारत के अनुमानित 190 परमाणु आयुधों में से 12 को संचालनात्मक रूप से तैनात श्रेणी में रखा गया है।
भंडारण और तैनाती:
- भंडारण (Stockpile): अपने अधिकांश परमाणु इतिहास के दौरान भारत ने अपने परमाणु आयुधों को डी-मैटेड अवस्था में रखा है। अर्थात् आयुधों को उनके प्रक्षेपण माध्यमों से अलग सुरक्षित रखा जाता था तथा उन पर कड़ा असैनिक एवं राजनीतिक नियंत्रण बना रहता था।
- इसका उद्देश्य अधिकतम सुरक्षा सुनिश्चित करना, आकस्मिक उपयोग के जोखिम को कम करना तथा अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष भारत के संयम का संकेत देना था।
- तैनाती (Deployment) का अर्थ है कि किसी परमाणु आयुध को उसके प्रक्षेपण माध्यम—जैसे मिसाइल, विमान अथवा पनडुब्बी—के साथ जोड़कर संचालनात्मक सैन्य बलों के पास तत्पर अवस्था में रखा जाए।
- इसका अर्थ यह नहीं है कि इन आयुधों का उपयोग किया जाने वाला है, बल्कि यह कि अधिकृत आदेश मिलने पर उनका उपयोग किया जा सकता है।
- डी-मैटेड (de-mated) आयुध को उपयोग हेतु तैयार करने और तैनात करने में समय लगता है, जबकि मैटेड (Mated) आयुध को सिद्धांततः अपेक्षाकृत शीघ्र प्रक्षेपित किया जा सकता है।
भारत द्वारा तैनाती का क्या अर्थ है?
- इसका अर्थ है कि भारत के परमाणु आयुधों का एक सीमित भाग अब संचालनात्मक तत्परता की अवस्था में रखा जा रहा है।
- SIPRI ने इस आकलन को भारत के परमाणु त्रिस्तरीय प्रतिरोधक तंत्र (Nuclear Triad), विशेषकर उसकी समुद्र-आधारित प्रतिरोधक क्षमता की परिपक्वता से जोड़ा है।
- रिपोर्ट के अनुसार, कुछ परमाणु आयुध अब परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों (SSBNs) पर तैनात हो सकते हैं, जो समय-समय पर प्रतिरोधक गश्त (Deterrence Patrols) करती हैं।
- SIPRI ने कैनिस्टरयुक्त अग्नि-श्रृंखला की मिसाइलों पर भारत की बढ़ती निर्भरता का भी उल्लेख किया है।
- इसका अर्थ है कि मिसाइलों को ईंधन सहित एक सीलबंद कैनिस्टर में रखा जाता है, जहाँ से उन्हें बिना अतिरिक्त तैयारी के सीधे प्रक्षेपित किया जा सकता है।
- इस प्रकार, कैनिस्टरकरण (Canisterisation) संचालनात्मक तत्परता के उच्च स्तर का संकेत देता है।
- समग्र रूप से, भारत की दीर्घकालिक प्रतिरोधक नीति अब स्थल तथा समुद्र-आधारित प्रक्षेपण प्रणालियों के माध्यम से अधिक संचालनात्मक स्वरूप ग्रहण कर रही है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत युद्ध की स्थिति में है।
परमाणु निरस्त्रीकरण से संबंधित प्रमुख संधियाँ
- परमाणु अप्रसार संधि (NPT): इस पर 1968 में हस्ताक्षर किए गए तथा 1970 में यह प्रभावी हुई। इसका उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना तथा परमाणु निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना है।
- यह विश्व को दो श्रेणियों में विभाजित करती है—परमाणु-हथियार संपन्न राज्य (Nuclear-Weapon States—NWS), जिन्हें संधि पर हस्ताक्षर के समय परमाणु हथियार रखने वाले देशों के रूप में मान्यता दी गई, तथा गैर-परमाणु-हथियार राज्य (Non-Nuclear-Weapon States—NNWS), जो परमाणु हथियारों के विकास या अधिग्रहण न करने के लिए सहमत होते हैं।
- यह संधि NWS को सद्भावनापूर्वक परमाणु निरस्त्रीकरण संबंधी वार्ताओं को आगे बढ़ाने के लिए भी बाध्य करती है।
- भारत, इज़राइल, उत्तर कोरिया तथा पाकिस्तान ने NPT पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
- परमाणु हथियार निषेध संधि (TPNW): संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2017 में अपनाई गई तथा 2018 में हस्ताक्षर के लिए खोली गई यह संधि परमाणु हथियारों के विकास, परीक्षण, उत्पादन, भंडारण, तैनाती, हस्तांतरण, उपयोग तथा उपयोग की धमकी पर प्रतिबंध लगाने का उद्देश्य रखती है।
- यह परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है, यद्यपि किसी भी परमाणु-हथियार संपन्न देश ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
- व्यापक परमाणु-परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT): 1996 में हस्ताक्षर के लिए खोली गई इस संधि का उद्देश्य असैनिक तथा सैन्य—दोनों उद्देश्यों के लिए सभी प्रकार के परमाणु विस्फोटों पर प्रतिबंध लगाना है।
- यद्यपि इस पर 185 देशों ने हस्ताक्षर तथा 170 देशों ने अनुसमर्थन (Ratification) किया है, फिर भी यह अभी तक प्रभावी नहीं हुई है, क्योंकि इसके लागू होने के लिए परमाणु-हथियार संपन्न देशों द्वारा अनुसमर्थन आवश्यक है।
- बाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty): यह बहुपक्षीय संधि 1967 में प्रभावी हुई तथा बाह्य अंतरिक्ष में सामूहिक विनाश के हथियारों (WMD) की तैनाती पर प्रतिबंध लगाती है।
- जिन नौ देशों के पास परमाणु हथियार होने का अनुमान है, वे सभी इस संधि के पक्षकार हैं।
परमाणु हथियारों के प्रति भारत की नीति
- पहले उपयोग न करने की नीति (No First Use): भारत ने पहले उपयोग न करने की घोषित नीति अपनाई है, जिसके अनुसार वह युद्ध के साधन के रूप में परमाणु हथियारों का प्रयोग तब तक नहीं करेगा, जब तक उस पर पहले परमाणु हथियारों से हमला न किया जाए।
- गैर-परमाणु-हथियार संपन्न देशों के विरुद्ध उपयोग नहीं: भारत ने यह प्रतिबद्धता व्यक्त की है कि वह गैर-परमाणु-हथियार संपन्न देशों के विरुद्ध परमाणु हथियारों का प्रयोग नहीं करेगा।
- केवल प्रतिघात (Retaliation Only): भारत का परमाणु सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि परमाणु हथियारों का उद्देश्य केवल प्रतिरोधक क्षमता (Deterrence) बनाए रखना है तथा भारत केवल प्रतिघात (Retaliation Only) की नीति का पालन करेगा।
- बहुपक्षीय कानूनी व्यवस्थाएँ: भारत इन प्रतिबद्धताओं को बहुपक्षीय कानूनी व्यवस्थाओं का स्वरूप देने के लिए भी तैयार है।
निष्कर्ष
- भारत के परमाणु संबंधी निर्णयों को बदलते हुए सुरक्षा परिवेश के संदर्भ में समझना आवश्यक है।
- SIPRI के अनुसार, भारत का आधुनिकीकरण कार्यक्रम अब ऐसे लंबी दूरी के प्रक्षेपण माध्यमों के विकास पर अधिक केंद्रित है, जो चीन के पूरे भूभाग तक पहुँचने में सक्षम हों, जबकि पाकिस्तान को भी रणनीतिक गणना में शामिल रखा गया है।
- भारत का SSBN कार्यक्रम भी केवल पाकिस्तान के साथ रणनीतिक स्थिरता बनाए रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि चीन के विरुद्ध विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने की दिशा में भी उन्मुख प्रतीत होता है।
- अतः भारत की विकसित होती प्रतिरोधक नीति को एक पृथक घटना के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक सामरिक परिवेश में हो रहे व्यापक परिवर्तन के एक भाग के रूप में देखा जाना चाहिए।
स्रोत: TH
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