पाठ्यक्रम: GS1/भौतिक भूगोल
संदर्भ
- भारत में मृदा कृषि उत्पादकता, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका को सहारा प्रदान करती है।
परिचय
- मृदा एक प्राकृतिक निकाय है, जो ठोस पदार्थों (खनिज एवं कार्बनिक पदार्थ), तरल और गैसों से मिलकर बनी होती है। यह भूमि की सतह पर पाई जाती है, स्थान घेरती है और इसकी पहचान निम्नलिखित में से एक या दोनों विशेषताओं से होती है: मृदा संस्तर या परतें, जो पदार्थों के जुड़ने, हानि, स्थानांतरण तथा ऊर्जा के परिवर्तन के कारण मूल पदार्थ से अलग दिखाई देती हैं।
- मृदा संस्तर मृदा की स्पष्ट क्षैतिज परतें होती हैं, जो भूमि की सतह से लेकर आधार शिला तक मृदा प्रोफ़ाइल का निर्माण करती हैं। मुख्य मृदा संस्तरों को O, A, E, B, C और R अक्षरों द्वारा दर्शाया जाता है।
- मृदा पौधों और जीव-जंतुओं के जीवन को बनाए रखने, जल के प्रवाह को नियंत्रित करने, प्रदूषकों को छानने और उनके प्रभाव को कम करने, पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखने तथा भौतिक स्थिरता प्रदान करने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य करती है।

भारत में मृदा विविधता
- भारत की विविध जलवायु, भूगर्भीय संरचना और स्थलाकृति के कारण यहाँ विभिन्न प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों की कृषि पद्धतियों को सहारा देती हैं।
- इन मृदाओं की संरचना और उर्वरता अलग-अलग होती है, जिससे विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती संभव हो पाती है और विभिन्न क्षेत्रों की कृषि की सहनशीलता भी बढ़ती है।

महत्त्व
- खाद्य एवं पोषण सुरक्षा : मृदा भारत की कृषि की रीढ़ है। भारत के कुल भूमि क्षेत्र का लगभग 59% भाग खेती के अंतर्गत है और 46% से अधिक कार्यबल अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है।
- स्वस्थ मृदा कृषि उत्पादकता, खाद्य सुरक्षा और जलवायु सहनशीलता को बढ़ावा देती है। साथ ही, यह सतत विकास लक्ष्य-2 (SDG 2: शून्य भूख) और सतत विकास लक्ष्य-13 (SDG 13: जलवायु कार्रवाई) की प्राप्ति में भी योगदान देती है।
- जल का नियमन और भंडारण : स्वस्थ मृदा प्राकृतिक स्पंज की तरह कार्य करती है। यह भूजल भंडारों को पुनर्भरित करती है, सूखे के दौरान मृदा में नमी बनाए रखती है तथा सतही बहाव को कम करती है।
- कार्बन अवशोषण : मृदा जलवायु परिवर्तन के शमन और अनुकूलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह प्राकृतिक कार्बन सिंक के रूप में वायुमंडलीय कार्बन को मृदा कार्बनिक कार्बन के रूप में संग्रहित करती है।
- मृदा में अधिक कार्बन होने से मृदा की संरचना, नमी बनाए रखने की क्षमता, पोषक तत्वों की उपलब्धता, उर्वरता और जलवायु परिवर्तन का सामना करने की क्षमता बेहतर होती है।
- कार्बन खेती जैसी सतत कृषि पद्धतियाँ कार्बन अवशोषण को और बढ़ाती हैं, जिससे मृदा जलवायु-स्मार्ट कृषि का एक महत्त्वपूर्ण आधार बन जाती है।
- पारिस्थितिक संतुलन और जैव विविधता : स्वस्थ मृदा में लाखों सूक्ष्मजीव, कवक और केंचुए पाए जाते हैं, जो वैश्विक पोषक तत्व चक्र (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और सल्फर) को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मुद्दे और चिंताएँ
- मृदा अपरदन : जल और हवा हर वर्ष बड़ी मात्रा में उपजाऊ ऊपरी मृदा को बहाकर या उड़ाकर ले जाते हैं।
- जल अपरदन विशेष रूप से हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र, पश्चिमी घाट और चंबल के बीहड़ों में अधिक गंभीर है।
- पोषक तत्वों का असंतुलन और कमी : कई दशकों से रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग के कारण मृदा में जिंक, बोरॉन और लौह जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी हो गई है।
- दोषपूर्ण सिंचाई तकनीकों (विशेषकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाढ़ सिंचाई वाले क्षेत्रों में नहरों द्वारा अत्यधिक सिंचाई) के कारण केशिका क्रिया से भूमि के भीतर मौजूद लवण सतह पर आ जाते हैं। इससे बड़े क्षेत्र बंजर हो जाते हैं और क्षारीकरण की समस्या उत्पन्न होती है।
- शहरीकरण और प्रदूषण : शहरी और शहरों के आसपास की मृदाएँ औद्योगिक अपशिष्ट जल, रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अत्यधिक रिसाव, खनन अपशिष्ट और प्लास्टिक के जमाव के कारण प्रदूषित हो रही हैं।
भारत द्वारा उठाए गए विभिन्न कदम
- राष्ट्रीय हरित भारत मिशन : यह राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना के अंतर्गत शुरू की गई प्रमुख पहलों में से एक है।
- यह वनों और वृक्षों के क्षेत्रफल में वृद्धि करके जलवायु सहनशीलता को मजबूत बनाता है, जिससे प्राकृतिक कार्बन सिंक की क्षमता बढ़ती है।
- यह वर्ष 2030 तक 2.5–3.0 बिलियन टन CO₂ समतुल्य कार्बन सिंक बनाने के भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान के लक्ष्य को पूरा करने में सहायता करता है।
- राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA): इसे 2014-15 में राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के अंतर्गत शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य में सुधार, जल उपयोग दक्षता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के माध्यम से जलवायु-सहनीय और सतत कृषि को बढ़ावा देना है।
- यह वित्तीय सहायता और प्रोत्साहन प्रदान करके मृदा और जल प्रबंधन की बेहतर पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।
- राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF): इसे 2024 में शुरू किया गया। इसका उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य में सुधार, मृदा कार्बनिक कार्बन बढ़ाना, कृषि लागत कम करना और जलवायु सहनशीलता को बढ़ावा देकर सतत एवं प्रकृति-आधारित कृषि को प्रोत्साहित करना है।
- कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना, 2023: यह स्वैच्छिक कार्बन बाजार के माध्यम से किसानों और संस्थाओं को सत्यापित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, उत्सर्जन से बचाव या कार्बन हटाने जैसी गतिविधियों के आधार पर व्यापार योग्य कार्बन क्रेडिट अर्जित करने की सुविधा देकर जलवायु परिवर्तन के शमन को प्रोत्साहित करती है।
- प्रत्येक कार्बन क्रेडिट एक मीट्रिक टन CO₂ के बराबर होता है। किसान सत्यापित कार्बन मानक (VCS) और गोल्ड स्टैंडर्ड जैसे मानकों के तहत सतत कृषि पद्धतियाँ अपनाकर कार्बन क्रेडिट अर्जित और बेच सकते हैं। इससे उन्हें अतिरिक्त आय का स्रोत मिलता है और साथ ही पर्यावरणीय सततता को भी बढ़ावा मिलता है।
- मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता योजना : इसे 2015 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य कार्ड के माध्यम से मृदा का वैज्ञानिक प्रबंधन को बढ़ावा देना है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड में फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की जानकारी और उर्वरकों के संतुलित उपयोग के लिए सुझाव दिए जाते हैं।
- यह रासायनिक उर्वरकों, जैविक खाद और जैव उर्वरकों के संतुलित एवं विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देती है। साथ ही, किसानों के प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रमों के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य और कृषि उत्पादकता में सुधार किया जाता है।
- स्कूल मृदा स्वास्थ्य कार्यक्रम : इस कार्यक्रम के तहत छात्रों को मृदा परीक्षण और मृदा स्वास्थ्य कार्ड तैयार करने में शामिल किया जाता है। इससे यह पहल और मजबूत होती है तथा किसानों तक कृषि संबंधी सलाह पहुँचाने में भी मदद मिलती है।
- पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) योजना: इस योजना के तहत DAP सहित फॉस्फेटिक और पोटाश (P&K) उर्वरकों की 28 श्रेणियों पर मिलने वाली सब्सिडी को उनमें मौजूद पोषक तत्वों की मात्रा से जोड़ा गया है, ताकि उर्वरकों का संतुलित उपयोग बढ़ावा मिले।
- इस योजना के तहत सब्सिडी की दरों को खरीफ (अप्रैल–सितंबर) और रबी (अक्टूबर–मार्च) मौसम के लिए अलग-अलग संशोधित किया जाता है।
- उर्वरकों में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT): आधार से जुड़े पॉइंट ऑफ सेल (PoS) उपकरणों के माध्यम से लाभार्थियों की पहचान सत्यापित की जाती है और उर्वरकों की बिक्री की वास्तविक समय (Real-Time) में निगरानी की जाती है।
- नीम-लेपित यूरिया : देश में उत्पादित 100% यूरिया पर नीम की परत चढ़ाई जाती है, जिससे नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ती है और यूरिया के गैर-कृषि उपयोग के लिए होने वाले दुरुपयोग पर रोक लगती है।
- एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली (iFMS): यह आपूर्ति शृंखला के बेहतर प्रबंधन के माध्यम से उर्वरकों की निगरानी, परिवहन और उपलब्धता में सुधार करती है।
- खेत बचाओ अभियान (1–30 जून, 2026): यह अभियान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा NAREES के सहयोग से चलाया गया। इसके माध्यम से मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन, रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग में कमी तथा जलवायु-सहनीय कृषि पद्धतियों को जागरूकता शिविरों, प्रदर्शन कार्यक्रमों और किसानों से सीधे संपर्क के माध्यम से बढ़ावा दिया गया।
- भू-स्थानिक मृदा मानचित्रण : भारतीय मृदा एवं भूमि उपयोग सर्वेक्षण की राष्ट्रीय मृदा संसाधन मानचित्रण परियोजना के तहत उपग्रह चित्रों और मैदानी सर्वेक्षणों की सहायता से गाँव स्तर के मृदा मानचित्र तैयार किए जाते हैं। ये वैज्ञानिक भूमि उपयोग योजना और उपयुक्त फसल चयन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
- एकीकृत डिजिटल कृषि : डिजिटल कृषि मिशन के अंतर्गत एग्री स्टैक जैसे प्लेटफ़ॉर्म किसानों, भूमि, फसलों और मृदा से संबंधित आँकड़ों को एकीकृत करके स्थान-विशिष्ट कृषि सलाह उपलब्ध कराते हैं।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और सटीक मृदा प्रबंधन : कृषि निर्णय सहायता प्रणाली (KDSS) जैसे AI आधारित प्लेटफ़ॉर्म मृदा, मौसम और फसलों से संबंधित आँकड़ों का विश्लेषण करके फसल योजना और पोषक तत्व प्रबंधन के लिए सलाह प्रदान करते हैं।
- AI की सहायता से उपग्रह चित्रों और रिमोट सेंसिंग का उपयोग कर मृदा में पोषक तत्वों की कमी और मृदा पर पड़ने वाले तनाव की पहचान भी की जाती है।
- इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग, लागत में कमी, पर्यावरण पर कम प्रभाव तथा जल और उर्वरकों का लक्षित उपयोग सुनिश्चित होता है।
- साथ ही, उपयुक्त फसल का चयन, बुवाई का सही समय और पोषक तत्व प्रबंधन से संबंधित निर्णय अधिक सटीक बनते हैं।
- कृषि रोबोटिक्स : स्वचालित ट्रैक्टर तथा मृदा विश्लेषण, रोपण, नमूना संग्रह और फसल निगरानी के लिए विकसित रोबोटिक प्रणालियाँ, जिन्हें भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR–IARI) और अन्य संस्थानों द्वारा विकसित किया जा रहा है।
- AI की सहायता से उपग्रह चित्रों और रिमोट सेंसिंग का उपयोग कर मृदा में पोषक तत्वों की कमी और मृदा पर पड़ने वाले तनाव की पहचान भी की जाती है।
स्रोत: PIB
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संक्षिप्त समाचार 25-07-2026
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