बिटचैट

पाठ्यक्रम : GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

संदर्भ

  • भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने GitHub को BitChat से संबंधित रिपॉज़िटरी हटाने का निर्देश दिया। केंद्र का कहना था कि इस ऐप का उपयोग गैरकानूनी सभाओं के समन्वय के लिए किया जा सकता है और सक्षम प्राधिकरण द्वारा लगाए गए वैध प्रतिबंधों से बचने के लिए इसका दुरुपयोग किया जा सकता है।

BitChat क्या है?

  • BitChat एक विकेंद्रीकृत पीयर-टू-पीयर मैसेजिंग ऐप है, जो ब्लूटूथ मेष नेटवर्क पर काम करता है। इसे चलाने के लिए इंटरनेट कनेक्शन, सर्वर या फोन नंबर की आवश्यकता नहीं होती।
    • इसे X (पूर्व में Twitter) के सह-संस्थापक जैक डोर्सी ने विकसित किया है।
  • BitChat केवल आस-पास मौजूद उपकरणों का उपयोग करके अस्थायी संचार नेटवर्क बनाता है। इसमें हर उपकरण क्लाइंट और सर्वर दोनों की तरह काम करता है, अपने-आप पास के उपकरणों को खोजता है और कई चरणों के माध्यम से संदेश आगे भेजकर नेटवर्क की पहुँच बढ़ाता है।
    • इस प्लेटफ़ॉर्म के अनुसार, यह तरीका सेंसरशिप से सुरक्षा, निगरानी से सुरक्षा और बुनियादी ढाँचे पर निर्भरता से स्वतंत्रता प्रदान करता है।
    • यह नेटवर्क इंटरनेट बंद होने, प्राकृतिक आपदाओं, विरोध प्रदर्शनों या कम इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में भी काम करता रहता है।
  • इसके विपरीत, पारंपरिक मैसेजिंग ऐप केंद्रीकृत बुनियादी ढाँचे पर निर्भर होते हैं, जिनकी निगरानी, सेंसरशिप या सेवा बंद की जा सकती है।

आदेश का कानूनी आधार 

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79(3)(b): इसके अनुसार, यदि किसी मध्यस्थ को कानूनी सूचना मिलने के बाद भी वह गैरकानूनी सामग्री को शीघ्र नहीं हटाता, तो वह सेफ हार्बर संरक्षण खो सकता है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 का नियम 3(1)(d): इसके अनुसार, मध्यस्थों (Intermediaries) को कानूनी निर्देश (Lawful Directions) प्राप्त होने पर गैरकानूनी जानकारी (Unlawful Information) को हटाना अनिवार्य है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय

  • श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) : सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66A को असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया। साथ ही, धारा 79(3)(b) की ऐसी व्याख्या की कि मध्यस्थों के लिए सामग्री हटाना तभी अनिवार्य होगा, जब न्यायालय या विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्य कर रहा कोई सरकारी प्राधिकरण ऐसा निर्देश दे।
    • न्यायालय ने यह भी कहा कि इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी वही संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, जो ऑफ़लाइन अभिव्यक्ति को प्राप्त है।
    • न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अस्पष्ट कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर डर का प्रभाव डालते हैं और यदि वे अनुच्छेद 19(2) के तहत युक्तिसंगत प्रतिबंध की कसौटी पर खरे नहीं उतरते, तो वे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लंघन करते हैं।
  • अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) : सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट तक पहुँच पर लगाए गए प्रतिबंधों को आनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। इसके अंतर्गत प्रतिबंध का भौगोलिक क्षेत्र, आपात स्थिति का चरण, स्थिति की तात्कालिकता, प्रतिबंध की अवधि तथा प्रतिबंध की प्रकृति जैसे पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए।

स्रोत: TH

 

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