संक्षिप्त समाचार 19-08-2026

तामिराभरणी नदी

पाठ्यक्रम: GS1/भूगोल; GS3/पर्यावरण

संदर्भ

  • मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने तमिलनाडु की तामिराभरणी नदी को एक देवी के रूप में मान्यता देते हुए उसे कानूनी व्यक्तित्व प्रदान किया है, ताकि अंतिम संस्कारों से होने वाले प्रदूषण और अपशिष्ट डाले जाने पर रोक लगाई जा सके।

परिचय

  • 2017 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना को कानूनी व्यक्तियों के रूप में मान्यता दी थी। हालाँकि, बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश पर रोक लगा दी, क्योंकि विशेष रूप से दोनों नदियों के कई राज्यों से होकर प्रवाहित होने के कारण व्यावहारिक और प्रशासनिक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती थीं।
  • वैश्विक स्तर पर, न्यूज़ीलैंड की व्हांगानुई नदी 2017 में कानूनी व्यक्तित्व प्राप्त करने वाली विश्व की प्रथम नदी बनी।

तामिराभरणी नदी

  • तामिराभरणी, जिसे ताम्रपर्णी या पोरुनई के नाम से भी जाना जाता है, एक बारहमासी नदी है, जिसका उद्गम पश्चिमी घाट की पोतिगई पहाड़ियों में अगस्त्यकूडम शिखर से होता है।
  • यह दक्षिणी भारत में तमिलनाडु के तिरुनेलवेली और तूतीकोरिन जिलों से होकर प्रवाहित होती है तथा अंततः मन्नार की खाड़ी में गिरती है।
  • पूर्व-शास्त्रीय काल में इसे ताम्रपर्णी नदी कहा जाता था और इसी नाम से श्रीलंका को भी नाम प्राप्त हुआ।

स्रोत: DTE

पीएम केयर्स फंड

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था

संदर्भ

  • प्रधानमंत्री नागरिक सहायता एवं आपातकालीन स्थिति राहत कोष (PM-CARES Fund) के लेखापरीक्षित वित्तीय विवरणों से पता चला है कि जहाँ दान में कमी आई है, वहीं उपलब्ध निधि का उपयोग भी बहुत कम रहा है।

परिचय

  • वित्त वर्ष 2022-23 और 2024-25 के बीच कोष का कुल संचित निधि आकार 25.8% बढ़कर ₹6,722 करोड़ से ₹8,453 करोड़ हो गया।
    • हालाँकि, इसी अवधि में निधि का उपयोग ₹437.9 करोड़ से घटकर मात्र ₹87.5 लाख रह गया, जो उपलब्ध कुल निधि का केवल 0.01% था अथवा उपलब्ध कोष की तुलना में लगभग 10,000 गुना कम था।

पीएम केयर्स फंड के बारे में

  • PM CARES एक सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास है, जिसे कोविड जैसी राष्ट्रीय आपात स्थितियों के लिए धन एकत्रित करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है।
    • इसकी स्थापना 2020 में कोविड-19 के प्रकोप के बाद की गई थी।
    • इस कोष को एक सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास के रूप में पंजीकृत किया गया है तथा इसके न्यास विलेख को पंजीकरण अधिनियम, 1908 के अंतर्गत पंजीकृत किया गया है।
  • PMNRF प्राकृतिक आपदाओं, बड़ी दुर्घटनाओं, दंगों आदि से प्रभावित लोगों को तत्काल राहत प्रदान करता है।
  • NDF विशेष रूप से सशस्त्र बलों और अर्धसैनिक बलों के सदस्यों के कल्याण तथा उनके परिवारों को सहायता प्रदान करने के लिए है।

स्रोत: TH

BRICS द्वारा EU के कार्बन कर का विरोध

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • BRICS के पर्यावरण एवं जलवायु मंत्रियों ने यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) का विरोध करते हुए इसे भेदभावपूर्ण और संरक्षणवादी उपाय बताया, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं है।

CBAM

  • CBAM यूरोपीय संघ द्वारा उन वस्तुओं के आयात पर लगाया जाने वाला शुल्क है, जिनके उत्पादन में घरेलू यूरोपीय विनिर्माताओं को अनुमत सीमा से अधिक कार्बन उत्सर्जन होता है।
  • इसे गैर-EU देशों से आयातित कार्बन-गहन वस्तुओं पर “उचित कार्बन मूल्य” निर्धारित करने के उद्देश्य से लागू किया गया है।
    • इसका उद्देश्य उन EU कंपनियों के साथ समान प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति सुनिश्चित करना है, जो EU की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) के माध्यम से अपने कार्बन उत्सर्जन का लेखा-जोखा रखती हैं।
  • प्रवर्तन : यह 1 जनवरी 2026 से छह वस्तुओं—इस्पात, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक, हाइड्रोजन और विद्युत—पर लागू हुआ।

विकासशील देशों की चिंताएँ

  • पर्यावरणीय अनुपालन: CBAM से संबंधित चर्चाएँ व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद (TTC) के अंतर्गत होती हैं। भारत और अन्य विकासशील देशों का तर्क है कि पर्यावरणीय मुद्दों को व्यापार से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
  • निर्यात पर प्रभाव: CBAM भारत के EU को होने वाले निर्यात के 43% को प्रभावित कर सकता है, जिसमें धातु, वस्त्र, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स और वाहन शामिल हैं।
    • CBAM के दायरे में आने वाले भारत के EU को निर्यात में लोहा और इस्पात लगभग 90% का योगदान करते हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन: 2015 में अपनाया गया पेरिस समझौता विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध उठाए गए “प्रतिक्रिया उपायों” के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों से सुरक्षा प्रदान करता है।
    • 2023 में दुबई जलवायु सम्मेलन (COP28) में यह स्वीकार किया गया कि “जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए किए गए उपाय मनमाने या अनुचित भेदभाव का साधन अथवा अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर छिपा हुआ प्रतिबंध नहीं होने चाहिए।”
  • विकसित देशों को लाभ: जिन विकसित अर्थव्यवस्थाओं के उद्योगों में EU के तुलनीय उत्सर्जन मानक लागू हैं, उन्हें CBAM जैसे उपाय से लाभ प्राप्त होगा।
    • इस प्रकार, CBAM का शुद्ध प्रभाव विकसित देशों के उद्योगों को लाभ पहुँचाने और विकासशील देशों के उद्योगों को प्रतिस्पर्धात्मक हानि पहुँचाने के रूप में सामने आ सकता है।

BRICS के बारे में

  • BRICS पाँच प्रमुख उभरती राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं—ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका—के समूह के लिए प्रयुक्त संक्षिप्त नाम है।
    • मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात BRICS में नए पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल हुए हैं।
  • BRICS विश्व की लगभग 41% आबादी, लगभग 24% वैश्विक GDP और लगभग 16% वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है।
  • उत्पत्ति: 2006 में सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित G8 आउटरीच शिखर सम्मेलन से इतर रूस, भारत और चीन के नेताओं की बैठक के बाद BRIC समूह की शुरुआत हुई।
    • BRIC शब्द मूल रूप से अर्थशास्त्री जिम ओ’नील द्वारा 2001 में दिया गया था।
    • प्रारंभ में इस समूह को BRIC कहा जाता था। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसे BRICS के नाम से जाना जाने लगा।
  • शिखर सम्मेलन: BRICS देशों की सरकारें 2009 से प्रतिवर्ष औपचारिक शिखर सम्मेलनों में बैठक करती रही हैं।
  • निर्णय-निर्माण: सभी निर्णय BRICS सदस्य देशों द्वारा पूर्ण परामर्श और सर्वसम्मति के आधार पर लिए जाते हैं।
  • न्यू डेवलपमेंट बैंक: पूर्व में इसे BRICS डेवलपमेंट बैंक कहा जाता था। यह BRICS देशों द्वारा स्थापित एक बहुपक्षीय विकास बैंक है।
    • बैंक सार्वजनिक अथवा निजी परियोजनाओं को ऋण, गारंटी, इक्विटी भागीदारी तथा अन्य वित्तीय साधनों के माध्यम से सहायता प्रदान करता है।

स्रोत: TH

बन्नी घासभूमि में कृष्णमृगों का पुनर्स्थापन

पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण

समाचार में

  • गुजरात वन विभाग ने ग्रीन्स जूलॉजिकल रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर, वंतारा के तकनीकी सहयोग से कच्छ की बन्नी घासभूमि में 20 कृष्णमृगों (एंटीलोप सर्वाइकैप्रा) को छोड़ा।

कृष्णमृग

  • कृष्णमृग केवल भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाते हैं।
  • भारत में ये मुख्य रूप से तीन व्यापक क्षेत्रों—उत्तरी, दक्षिणी और पूर्वी क्षेत्रों—में पाए जाते हैं।
  • नर कृष्णमृगों के सींग पेंचदार आकार के होते हैं और उनका शरीर काले से गहरे भूरे रंग का होता है, जबकि मादाएँ हल्के पीले-भूरे रंग की होती हैं।
  • यह प्रजाति खुली घासभूमि, शुष्क कंटीली झाड़ियों, झाड़ीदार क्षेत्रों और विरल वनों वाले क्षेत्रों के साथ-साथ कृषि क्षेत्रों की सीमाओं में भी पाई जाती है।
  • इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में सूचीबद्ध किया गया है। कृष्णमृग का शिकार और अवैध शिकार गैर-जमानती अपराध है तथा इसके लिए छह वर्ष तक के कारावास का प्रावधान हो सकता है।
  • बिश्नोई समुदाय द्वारा इसकी पूजा की जाती है।
  • इसे IUCN की संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची में कम चिंतनीय श्रेणी में रखा गया है।

बन्नी घासभूमि

  • यह गुजरात के कच्छ जिले में स्थित है और इसे एशिया की सबसे बड़ी घासभूमि माना जाता है।
  • यह एक लवण-सहिष्णु घासभूमि है, अर्थात यह लवणीय और शुष्क परिस्थितियों में भी जीवित रहकर विकसित हो सकती है।
  • यहाँ घास, जड़ी-बूटियों, झाड़ियों और वृक्षों की 250 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से कुछ स्थानिक और संकटग्रस्त हैं।
  • यह 350 से अधिक पक्षी प्रजातियों, 50 स्तनधारी प्रजातियों, 30 सरीसृप प्रजातियों और 10 उभयचर प्रजातियों को आश्रय प्रदान करती है।
  • बन्नी में पाए जाने वाले प्रमुख वन्यजीवों में संकटग्रस्त भारतीय जंगली गधा, एशियाई सिंह, कृष्णमृग, चिंकारा, काराकल, रेगिस्तानी लोमड़ी, फ्लेमिंगो, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, पेलिकन और सारस क्रेन शामिल हैं।
  • यहाँ लगभग 40,000 लोग निवास करते हैं, जो मालधारी, रबारी, जाट, मुतवा और मेघवाल जैसे विभिन्न पशुपालक समुदायों से संबंधित हैं।

स्रोत: TH

भारत का मखाना क्षेत्र

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

समाचार में

  • मखाना भारत के सबसे तीव्रता से विकसित हो रहे कृषि-खाद्य क्षेत्रों में से एक के रूप में उभरा है। इसके पीछे बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता, घरेलू मांग में विस्तार और सुदृढ़ निर्यात संभावनाएँ प्रमुख कारक हैं।

मखाना

  • इसे वैज्ञानिक रूप से यूरयाले फेरोक्स  कहा जाता है। यह एक जलीय फसल है, जिसकी मुख्य रूप से उथले तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों में खेती की जाती है।
    • पौधे का बीज ही खाद्य भाग होता है।
  • लाभ: मखाना पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ है, जिसमें कार्बोहाइड्रेट, उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, आहार फाइबर तथा मैग्नीशियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस और आयरन जैसे प्रमुख खनिज पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं।
    • इसमें नमक की मात्रा कम होती है और यह कोलेस्ट्रॉल-मुक्त होता है, जिससे यह विभिन्न प्रकार की आहार संबंधी आवश्यकताओं के लिए उपयुक्त विकल्प बनता है।
    • इसका ग्लाइसेमिक लोड कम होता है और इसका सेवन मधुमेह को नियंत्रित करने वाले लोगों द्वारा किया जा सकता है।
    • यह हृदय के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है, पाचन में सहायता करता है और इसमें बुढ़ापे के प्रभावों को कम करने वाले गुण भी पाए जाते हैं।

वर्तमान स्थिति

  • उत्पादन: भारत विश्व का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक है। इसके उत्पादन को अनुकूल कृषि-जलवायु परिस्थितियों तथा लंबे समय से चली आ रही खेती की परंपराओं का समर्थन प्राप्त है। इसका उत्पादन मुख्यतः बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में होता है।
    • भारत के कुल मखाना उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी लगभग तीन-चौथाई है और वैश्विक आपूर्ति में इसका योगदान लगभग 80-85% है।
    • मखाना की खेती मुख्य रूप से उत्तर बिहार में केंद्रित है।
  • निर्यात: भारत के मखाना निर्यात बाजार अत्यधिक केंद्रित हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका (40%), कनाडा (20%) और संयुक्त अरब अमीरात (17%) मिलकर कुल मखाना निर्यात का 77% हिस्सा प्राप्त करते हैं।
    • हालाँकि, अधिक मात्रा वाले इन बाजारों में प्रति इकाई प्राप्त कीमत अपेक्षाकृत कम है: अमेरिका (19.5/किग्रा),कनाडा(15.8/किग्रा) और UAE ($13.3/किग्रा)
    • इसके विपरीत, जर्मनी (26.0/किग्रा),नेपाल(21.6/किग्रा) और ऑस्ट्रेलिया ($21.0/किग्रा) जैसे छोटे बाजार प्रीमियम कीमतें प्रदान करते हैं, यद्यपि इनमें निर्यात की मात्रा सीमित है और प्रत्येक की बाजार हिस्सेदारी लगभग 1-5% है।
    • यूनाइटेड किंगडम की स्थिति मिश्रित है। इसकी बाजार हिस्सेदारी 10% है और वहाँ औसत प्राप्ति लगभग $20/किग्रा है।
    • इससे अमेरिका और खाड़ी क्षेत्र के बाजारों से आगे बढ़कर अधिक कीमत देने वाले बाजारों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलता है, जिससे कुल निर्यात प्राप्तियों में सुधार किया जा सकता है।

सरकार के कदम

  • सरकार ने केंद्रीय बजट 2025-26 में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना की घोषणा की।
    • इस बोर्ड का औपचारिक शुभारंभ 15 सितंबर 2025 को बिहार में किया गया।
    • यह पहल मखाना की मूल्य शृंखला को सुदृढ़ और आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
  • सरकार ने 2025-26 से 2030-31 की अवधि के लिए ₹476.03 करोड़ के परिव्यय के साथ मखाना विकास हेतु केंद्रीय क्षेत्र योजना को स्वीकृति दी है। इस योजना का उद्देश्य अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देना, गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा किसानों के कौशल में वृद्धि करना है।
    • इसका उद्देश्य कटाई एवं कटाई-पश्चात प्रक्रियाओं का आधुनिकीकरण, मूल्यवर्धन, ब्रांडिंग और विपणन को बढ़ावा देना, निर्यात में वृद्धि तथा गुणवत्ता नियंत्रण प्रणालियों को सुदृढ़ करना भी है।

स्रोत:PIB

 

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