पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था
संदर्भ
- हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मृत्युदंड के निष्पादन की एक विधि के रूप में फाँसी की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। न्यायालय ने माना कि यह विधि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमा के अधिकार का उल्लंघन नहीं करती।
‘भारत में निष्पादन की विधि के रूप में फाँसी’ के बारे में
- औपनिवेशिक काल की दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के समय से ही भारत में फाँसी मृत्युदंड के निष्पादन की प्रमुख वैधानिक विधि रही है।
- वर्तमान में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 393(5) में प्रावधान है कि मृत्युदंड के आदेश में यह निर्देश दिया जाएगा कि संबंधित व्यक्ति को “गर्दन से तब तक फाँसी पर लटकाया जाए, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।”
- इस विधि में सामान्यतः गणनानुसार निर्धारित ‘लॉन्ग ड्रॉप’ तकनीक का प्रयोग किया जाता है, जिसका उद्देश्य गर्दन की कशेरुकाओं में फ्रैक्चर उत्पन्न करना तथा शीघ्र चेतना-लोप सुनिश्चित करना होता है।
- इसकी संवैधानिक वैधता को इससे पूर्व दीना बनाम भारत संघ(1983) मामले में बरकरार रखा गया था।
संवैधानिक एवं विधिक पहलू
- संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है तथा यह अपेक्षा करता है कि विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया न्यायसंगत एवं गैर-मनमानी हो।
- जियान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि जीवन के अधिकार में गरिमा के साथ जीवन जीने की अवधारणा निहित है और प्रासंगिक परिस्थितियों में गरिमा के साथ मृत्यु का विचार भी इससे जुड़ सकता है।
- अतः संवैधानिक प्रश्न यह है कि क्या मृत्युदंड का निष्पादन शालीनता, गरिमा और अनावश्यक क्रूरता से रहित तरीके से किया जा सकता है।
- विधि आयोग की 187वीं रिपोर्ट (2003) ने घातक इंजेक्शन के माध्यम से मृत्युदंड के निष्पादन की वैकल्पिक विधि की सिफारिश की थी, साथ ही निष्पादन की प्रथाओं पर आगे विचार करने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया था।
- हालांकि, संसद ने BNSS में फाँसी की विधि को बनाए रखा और इस प्रकार वर्तमान वैधानिक व्यवस्था में निरंतरता प्रदान की।
सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि उसके समक्ष प्रस्तुत वैज्ञानिक सामग्री दीना(1983) में दिए गए तर्कों को पर्याप्त रूप से अस्वीकार करने में सक्षम नहीं थी।
- न्यायालय ने कहा कि घातक इंजेक्शन, विद्युत-प्रहार, घातक गैस अथवा गोली मारने जैसी वैकल्पिक विधियों के संबंध में यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित नहीं किया गया है कि वे संवैधानिक या मानवीय दृष्टि से कोई निर्णायक लाभ प्रदान करती हैं।
- न्यायालय ने इस विषय को स्थायी रूप से बंद नहीं माना। उसने स्वीकार किया कि संवैधानिक व्याख्या और वैज्ञानिक ज्ञान समय के साथ विकसित हो सकते हैं तथा नए साक्ष्य उपलब्ध होने पर इस प्रश्न पर पुनर्विचार किया जा सकता है।
संबंधित चिंताएँ एवं मुद्दे
- वैज्ञानिक विश्वसनीयता: फाँसी के लिए ड्रॉप की लंबाई की गलत गणना से लंबे समय तक दम घुटने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है या, इसके विपरीत, गंभीर शारीरिक चोट हो सकती है।
- अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमा: राज्य का व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करने का दायित्व फाँसी के तख्ते तक पहुँचने के बाद समाप्त नहीं हो जाता।
- मनोवैज्ञानिक पीड़ा: मृत्युदंड की प्रतीक्षा कर रहे कैदियों का दीर्घकालीन कारावास और निष्पादन की आशंका अपने आप में अलग मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ उत्पन्न करती है।
- औपनिवेशिक विरासत: औपनिवेशिक दंड कानून से उत्पन्न किसी विधि को बनाए रखना यह प्रश्न उठाता है कि क्या समकालीन संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप इसमें सुधार किया जाना आवश्यक है।
- वैकल्पिक विधियाँ: घातक इंजेक्शन और अन्य निष्पादन विधियों की तुलनात्मक विश्वसनीयता, पीड़ा तथा गरिमा पर प्रभाव का स्वतंत्र और अनुभवजन्य मूल्यांकन आवश्यक है।
- स्वयं मृत्युदंड की व्यवस्था: यह परिचर्चा मनमानेपन, दंड की आनुपातिकता, गलत दोषसिद्धि तथा मृत्युदंड की अपरिवर्तनीय प्रकृति से जुड़ी व्यापक चिंताओं से भी संबंधित है।
मृत्युदंड के निष्पादन की विधि के रूप में फाँसी : वैश्विक उदाहरण
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फाँसी के प्रयोग में व्यापक रूप से कमी आई है। फिर भी कुछ देशों और न्यायक्षेत्रों में यह विधिक रूप से उपलब्ध रही है अथवा ऐतिहासिक रूप से इसका प्रयोग किया गया है, जिनमें जापान, सिंगापुर तथा मध्य-पूर्व और एशिया के कुछ देश शामिल हैं।
- कई देशों ने मृत्युदंड को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। यह प्रवृत्ति मृत्युदंड के प्रतिबंध अथवा उन्मूलन की दिशा में वैश्विक आंदोलन को दर्शाती है।
आगे की राह
- निष्पादन की विधियों पर अद्यतन चिकित्सीय एवं वैज्ञानिक अध्ययनों का आयोग द्वारा कराया जाना।
- पीड़ा को न्यूनतम करने के लिए पारदर्शी, साक्ष्य-आधारित प्रोटोकॉल और सुरक्षा उपाय स्थापित करना।
- विधि आयोग की सिफारिशों तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानवाधिकार मानकों की समीक्षा करना।
- अनुच्छेद 21 और विकसित होती संवैधानिक नैतिकता के आलोक में वैधानिक निष्पादन-विधि की समय-समय पर समीक्षा करना।
- गलत निष्पादन के विरुद्ध सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करना तथा यह सुनिश्चित करना कि मृत्युदंड कठोरतम न्यायिक परीक्षण के अधीन बना रहे।
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