पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- पंजाब के नए धार्मिक अपवित्रीकरण(Sacrilege) संबंधी कानून ने एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में धार्मिक अपराधों को दंडनीय बनाने को लेकर परिचर्चा को पुनः तीव्र कर दिया है।
परिचय
- हाल ही में पंजाब के राज्यपाल ने जगत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम को अपनी स्वीकृति प्रदान की।
- इसमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के अपमान के विरुद्ध अधिक कठोर दंड का प्रावधान किया गया है।
- इस प्रकार के अपवित्र या अपमानजनक कृत्यों में संलिप्त या उनका समर्थन करने वाले किसी भी व्यक्ति को 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा तथा ₹5 लाख से ₹25 लाख तक का जुर्माना हो सकता है।
- अधिनियम के अंतर्गत धार्मिक अपवित्रीकरण (Sacrilege): इसमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब को शारीरिक क्षति पहुँचाने, विरूपित करने, जलाने, फाड़ने या चोरी करने जैसे किसी भी “जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण” तरीके से किए गए अपवित्रीकरण के कृत्य शामिल हैं। इसके साथ ही, ऐसे कृत्यों को वाणी, लेखन, दृश्य प्रस्तुति अथवा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से किए जाने पर भी समान रूप से धार्मिक अपमान की श्रेणी में रखा गया है।
धार्मिक अपवित्रीकरण (Sacrilege) क्या है?
- अपवित्रीकरण (Sacrilege) का शाब्दिक अर्थ किसी धार्मिक वस्तु या स्थान के साथ उस सम्मान के अनुरूप व्यवहार न करना है, जिसका वह पात्र है।
- परंपरागत रूप से इसका संबंध ऐसे आचरण से होता है, जिसमें किसी पवित्र मानी जाने वाली वस्तु का भौतिक अपवित्रीकरण या उसका उल्लंघन शामिल हो।
- ईशनिंदा (Blasphemy) का संबंध अभिव्यक्ति से है, जिसमें किसी ईश्वर, पैगंबर, धार्मिक ग्रंथ या धार्मिक विश्वासों के समूह के संबंध में अपमानजनक अथवा अनादरपूर्ण भाषण, लेखन या चित्रात्मक प्रस्तुति शामिल हो सकती है।
- कानूनी स्थिति:
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 298: पूजा स्थल को किसी धर्म का अपमान करने के प्रयोजन से हानि पहुँचाने या अपवित्र करने को दंडनीय बनाती है। यह धार्मिक अपमान से संबंधित ऐसा अपराध है, जिसका मुख्य उद्देश्य आचरण को नियंत्रित करना है।
- BNS की धारा 299: शब्दों, संकेतों या दृश्य प्रस्तुति के माध्यम से धार्मिक विश्वासों का जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण अपमान करने को दंडनीय बनाती है।
भारत में ईशनिंदा संबंधी कानूनों की उत्पत्ति
- 1927 में भारतीय दंड संहिता की धारा 295A लागू की गई, जिसके अंतर्गत किसी वर्ग के नागरिकों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से किए गए “जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण” कृत्यों को अपराध बनाया गया। इसमें शब्दों, संकेतों अथवा दृश्य प्रस्तुति के माध्यम से किए गए कृत्य शामिल थे।
- 1957 में रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
संवैधानिक पक्ष
- अनुच्छेद 19(1)(a) — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: इस कानून को अभिव्यक्ति और वाक्-स्वातंत्र्य के मौलिक अधिकार के आधार पर चुनौती दी जा सकती है।
- शब्दों, लेखन, संकेतों अथवा इलेक्ट्रॉनिक अभिव्यक्तियों को अपराध घोषित करने से वैध आलोचना, अकादमिक विमर्श, व्यंग्य और सामाजिक सुधार से संबंधित अभिव्यक्ति पर निरोधात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- राज्य को यह प्रदर्शित करना होगा कि लगाया गया प्रतिबंध अनुच्छेद 19(2) में स्पष्ट रूप से उल्लिखित किसी एक आधार के अंतर्गत आता है।
- अनुच्छेद 19(2) — लोक व्यवस्था धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचने के समान नहीं है: राज्य यह तर्क दे सकता है कि कानून लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक है, विशेषकर धार्मिक अपमान से संबंधित तनावों के पंजाब के इतिहास को देखते हुए।
- हालाँकि, संवैधानिक प्रश्न यह होगा कि क्या केवल धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचना अपने-आप में लोक व्यवस्था के लिए खतरा उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त आधार है।
- अनुच्छेद 14 — समानता एवं गैर-मनमानी: “अनादर” अथवा ऐसा आचरण जो “धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने की प्रकृति का हो” जैसे शब्द इस बात को लेकर चिंता उत्पन्न कर सकते हैं कि अपराध का निर्धारण वस्तुनिष्ठ रूप से किस प्रकार किया जाएगा।
- आपराधिक कानून में सामान्यतः पर्याप्त स्पष्टता आवश्यक होती है, ताकि नागरिक उचित रूप से समझ सकें कि कौन-सा आचरण प्रतिबंधित है।
- आनुपातिकता का सिद्धांत: भौतिक रूप से धार्मिक अपवित्रीकरण के लिए आजीवन कारावास तक का दंड आनुपातिकता के सिद्धांत के आधार पर न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है।
- न्यायालय प्रतिबंधित आचरण की प्रकृति, उससे हुई क्षति, आरोपी का उद्देश्य, कम प्रतिबंधात्मक उपायों की उपलब्धता तथा दंड की गंभीरता जैसे पहलुओं की समीक्षा कर सकता है।
आगे की राह
- पवित्र धार्मिक वस्तुओं के जानबूझकर किए गए भौतिक अपवित्रीकरण को लोक व्यवस्था और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपराध घोषित करना उचित ठहराया जा सकता है। हालांकि, आपराधिक दायित्व को अभिव्यक्ति तक विस्तारित करने से अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत प्राप्त स्वतंत्रता के उल्लंघन का जोखिम उत्पन्न होता है।
- इसलिए संवैधानिक रूप से सुदृढ़ दृष्टिकोण के लिए स्पष्ट परिभाषाएँ, जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य का प्रमाण, दंड में आनुपातिकता तथा सभी धर्मों के प्रति समान अनुप्रयोग आवश्यक होंगे। यह दृष्टिकोण भारत के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक संवैधानिक ढाँचे के अनुरूप होना चाहिए।
Source: TH
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