भारत में कॉरपोरेट निवेश 

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था 

समाचार में

  • भारत में GDP के अनुपात में कॉरपोरेट निवेश में गिरावट दर्ज की जा रही है।

कॉरपोरेट निवेश

  • यह किसी कंपनी द्वारा वित्तीय प्रतिफल अर्जित करने या दीर्घकालिक मूल्य सृजित करने के उद्देश्य से वित्तीय परिसंपत्तियों, व्यावसायिक गतिविधियों अथवा रणनीतिक परियोजनाओं के अधिग्रहण या उनमें निवेश को संदर्भित करता है।
  • भारत के GDP के प्रतिशत के रूप में कॉरपोरेट निवेश में गिरावट आई है, विशेष रूप से 2016 की नोटबंदी के बाद।
  • निवेश 2004 में GDP के 6.5% से बढ़कर 10.3% हो गया था, लेकिन वैश्विक वित्तीय संकट से विलंबित सुधार के बाद इसमें फिर से दीर्घकालिक गिरावट शुरू हो गई।
  • नोटबंदी एक घरेलू नीतिगत आघात था, जबकि वैश्विक वित्तीय संकट (GFC) एक बाह्य आघात था।
  • निवेश में गिरावट COVID-19 से पहले ही शुरू हो चुकी थी।

निवेश को प्रभावित करने वाले कारक

  • अपेक्षित लाभप्रदता: कंपनियाँ तब निवेश करती हैं, जब उन्हें भविष्य में पर्याप्त रूप से लाभदायक बिक्री होने की संभावना होती है।
  • व्यावसायिक विश्वास (एनिमल स्पीरिट): भविष्य की मांग और नीतिगत परिस्थितियों के प्रति अधिक विश्वास निवेश को प्रोत्साहित करता है।
  • ऋण की लागत और उपलब्धता: उच्च ब्याज दरें और वित्त तक सीमित पहुँच निवेश को हतोत्साहित कर सकती हैं, विशेषकर छोटी कंपनियों के लिए।

रणनीतिक महत्व

  • रोजगार सृजन: श्रम-प्रधान विनिर्माण और बुनियादी ढाँचे पर पूंजीगत व्यय प्रत्येक वर्ष लाखों लोगों को कार्यबल में शामिल करने में सहायक होता है।
  • प्रौद्योगिकी एवं ज्ञान का हस्तांतरण: विदेशी कॉरपोरेट इक्विटी के माध्यम से घरेलू औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र उन्नत विनिर्माण मानकों, स्वचालन तथा औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास को आत्मसात करते हैं।
  • कल्याणकारी प्रभाव: निजी निवेश सार्वजनिक ऋण पर व्यय के दबाव को कम करता है, जिससे सरकार सामाजिक कल्याण और स्वास्थ्य पर अधिक संसाधन व्यय कर सकती है।
  • निर्यात क्षमता का निर्माण: बुनियादी ढाँचे और पूंजी निर्माण से मूल्यवर्धित विनिर्माण का विस्तार होता है, जिससे व्यापार संतुलन एवं विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ावा मिलता है।

प्रमुख चुनौतियाँ

  • संकेंद्रण का जोखिम: पूंजीगत व्यय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों तक केंद्रित है, जबकि मध्यम आकार की कंपनियों का निवेश अभी भी असमान बना हुआ है।
  • भूराजनीतिक अनिश्चितता और उच्च इनपुट/ऊर्जा लागत: ये कारक दीर्घकालिक विवेकाधीन निवेश के प्रति कंपनियों को सतर्क दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।
  • नियामकीय बाधाएँ: भूमि अधिग्रहण की लंबी प्रक्रिया, स्थानीय नियामकीय स्वीकृतियाँ तथा अनुबंधों के धीमे प्रवर्तन से परियोजनाओं के क्रियान्वयन में देरी होती है।
  • पूंजी की उच्च लागत: बेंचमार्क ब्याज दरें अधिक होने के कारण मध्यम आकार की कंपनियों के पास नए ऋण लेने के बजाय आंतरिक संसाधनों पर निर्भर रहने के अलावा सीमित विकल्प रह जाते हैं।

सरकार के कदम

  • उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: PLI योजना में इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर मॉड्यूल, औषधियाँ और विशेष इस्पात जैसे 14 प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं।
    • यह वृद्धिशील विनिर्माण के लिए प्रत्यक्ष वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है तथा घरेलू और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को आकर्षित करने में सफल रही है।
  • बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा (NIP एवं गतिशक्ति): राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP) और PM गतिशक्ति के अंतर्गत सड़कों, रेलवे तथा बंदरगाहों में सरकारी निवेश अभूतपूर्व स्तर पर है।
    • इससे लॉजिस्टिक लागत में उल्लेखनीय कमी आ रही है तथा व्यवसाय करना अधिक सुगम और लाभदायक बन रहा है।
  • करों का युक्तिकरण: हाल के वर्षों में संरचनात्मक कॉरपोरेट कर दरों में की गई कटौती से कंपनियों के पास अपनी आय का अधिक हिस्सा बचा है। इससे प्रतिधारित आय के माध्यम से निवेश के लिए आंतरिक वित्तपोषण की उनकी क्षमता में तत्काल वृद्धि हुई है।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का उदारीकरण: रक्षा, अंतरिक्ष और दूरसंचार जैसे प्रमुख क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश संबंधी नियमों को आसान बनाकर आवश्यक विदेशी पूंजी एवं नवीनतम प्रौद्योगिकी को आकर्षित किया गया है।

निष्कर्ष एवं आगे की राह

  • भारत का कॉरपोरेट निवेश परिदृश्य तीव्रता से पुनरुद्धार से विस्तार की ओर बढ़ रहा है। इसे सुदृढ़ बैलेंस शीट, घरेलू मांग में लचीलापन तथा लक्षित सरकारी प्रोत्साहनों का समर्थन प्राप्त है।
  • इस गति को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि बड़े कॉरपोरेट समूह समयबद्ध भुगतान के माध्यम से MSME को अपनी आपूर्ति शृंखलाओं में अधिक प्रभावी ढंग से एकीकृत करें तथा पूंजी आवंटन को हरित बुनियादी ढाँचे और नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें।
  • जैसे-जैसे आर्थिक विकास आगे बढ़ेगा, स्थिर ऋण परिस्थितियों को सुनिश्चित करने और मुद्रास्फीति के प्रभावी प्रबंधन के लिए राजकोषीय एवं मौद्रिक नीति के बीच सावधानीपूर्वक समन्वय महत्वपूर्ण होगा।

Source:TH

 

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