तड़ित-झंझा (आंधी-तूफ़ान): कारण, प्रभाव और नीतिगत प्रतिक्रिया 

पाठ्यक्रम: GS1/भूगोल; GS3/पर्यावरण

संदर्भ

  •  पूर्व-मानसून ऋतु के दौरान उत्तर प्रदेश में आए भीषण तड़ित-झंझा एवं धूल भरी आंधियों के कारण 100 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई।

तड़ित-झंझा (Thunderstorms) क्या हैं?

  •  तड़ित-झंझा एक मौसम संबंधी घटना है, जो बिजली चमकने, गर्जन, तेज़ हवाओं, भारी वर्षा तथा कभी-कभी ओलावृष्टि से जुड़ी होती है।
  • ये घटनाएँ सामान्यतः अप्रैल एवं मई के दौरान होती हैं तथा विश्व के अनेक शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में देखी जाती हैं।
  • इनकी प्रमुख विशेषताओं में अचानक विकसित होना, तीव्र झोंकों वाली हवाएँ, बिजली एवं गर्जन, अल्प अवधि किंतु उच्च तीव्रता, तथा शुष्क क्षेत्रों में धूल भरी आंधियों का साथ होना शामिल है।
  • तड़ित-झंझाओं का निर्माण वायुमंडलीय अस्थिरता के कारण होता है, जो निचले एवं ऊपरी वायुमंडल के बीच तापमान और आर्द्रता में अंतर से उत्पन्न होती है।

निर्माण के लिए उत्तरदायी परिस्थितिया

  • तीव्र सतही ऊष्मीकरण: गर्मियों के दौरान उत्तरी भारत में तापमान प्रायः 45°C से अधिक हो जाता है। इससे भूमि की सतह अत्यधिक तीव्रता से गर्म होती है।
  • आर्द्रता की उपलब्धता: बंगाल की खाड़ी से आने वाली आर्द्रतायुक्त हवाएँ दक्षिण-पूर्वी पवनों के माध्यम से उत्तरी भारत की ओर बढ़ती हैं।
  • ऊपरी वायुमंडल में शीतल एवं शुष्क वायु: पश्चिमी विक्षोभ ऊपरी वायुमंडल में ठंडी वायु लाते हैं। जब गर्म एवं आर्द्र वायु ऊपर उठकर ठंडी एवं शुष्क वायु से मिलती है, तब वायुमंडलीय अस्थिरता उत्पन्न होती है।
  • संवहन प्रक्रिया: गर्म वायु तीव्रता से ऊपर उठती है, संघनित होकर क्युम्यूलोनिंबस  बादलों का निर्माण करती है तथा गुप्त ऊष्मा का उत्सर्जन करती है। इससे ऊर्ध्वाधर वायु संचलन और अधिक सशक्त होता है तथा तड़ित-झंझाओं का निर्माण होता है।

तड़ित-झंझाओं के प्रकार

  • एकल-कोशिका तड़ित-झंझा :
    • आकार में छोटे एवं अल्पकालिक होते हैं।
    • सामान्यतः कम विनाशकारी होते हैं।
    • प्रायः ग्रीष्मकालीन दोपहर में विकसित होते हैं।
  • बहु-कोशिका तड़ित-झंझा:
    • अनेक तूफ़ानी कोशिकाओं के समूह से निर्मित होते हैं।
    • इनकी अवधि अधिक होती है।
    • ये तीव्र हवाओं एवं भारी वर्षा का कारण बनते हैं।
  • स्क्वॉल लाइन :
    • तड़ित-झंझाओं की संगठित रेखाएँ होती हैं।
    • पूर्व-मानसून महीनों में उत्तरी भारत में सामान्यतः देखी जाती हैं।
    • ये गंभीर पवन क्षति से संबंधित होती हैं।
  • सुपरसेल तड़ित-झंझा :
    • अत्यधिक संगठित एवं घूर्णनशील तूफ़ान होते हैं।
    • भारत में अपेक्षाकृत दुर्लभ हैं।
    • ये अत्यंत तीव्र हवाओं एवं ओलावृष्टि का कारण बन सकते हैं।
  • हाल ही में उत्तर प्रदेश में आए तूफ़ान संगठित बहु-कोशिका तड़ित-झंझाओं के समान थे, जिनमें गंभीर स्क्वॉल-लाइन विशेषताएँ परिलक्षित हुईं।
भारत में तड़ित-झंझाओं की घटनाएँ 
क्षेत्रस्थानीय नाम 
उत्तर प्रदेश एवं उत्तर भारतआंधी
पश्चिम बंगाल और असमकाल बैसाखी / नॉरवेस्टर
कर्नाटकआम्र वर्षा 
केरलपुष्प वर्षा 

भीषण तड़ित-झंझाओं के प्रभाव

  • मानव जीवन की हानि हाल ही में आए तूफ़ानों के कारण 100 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई, जिनका मुख्य कारण पेड़ों का गिरना, दीवारों का ढहना, बिजली गिरना तथा उड़ते हुए मलबे थे।
  • अवसंरचना को क्षति: तीव्र गति वाली हवाओं ने पेड़ों को उखाड़ दिया तथा विद्युत खंभों, ट्रांसमिशन लाइनों, मकानों एवं कमजोर संरचनाओं, होर्डिंग्स तथा विज्ञापन पट्टों को क्षतिग्रस्त कर दिया।
  • कृषि संबंधी हानियाँ: तड़ित-झंझाओं एवं ओलावृष्टि से खड़ी फसलों को हानि पहुँचता है, जिससे गेहूँ, सब्जियों तथा आम के बागानों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे किसानों की आय एवं ग्रामीण आजीविका प्रभावित होती है।
  • सार्वजनिक सेवाओं में व्यवधान: विद्युत आपूर्ति बाधित होना, संचार सेवाओं में अवरोध तथा परिवहन सेवाओं में रुकावट जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
  • आपदा संवेदनशीलता में वृद्धि: तेज़ी से हो रहा शहरीकरण, कमजोर आवासीय संरचनाएँ तथा अपर्याप्त जागरूकता ऐसे स्थानीयकृत आपदाओं के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाती हैं।
  • पूर्वानुमान संबंधी चुनौतियाँ: तड़ित-झंझाओं की गति एवं दिशा अनिश्चित होने के कारण, चक्रवातों की तुलना में इनके दौरान निकासी (Evacuation) करना अधिक कठिन होता है।
    • स्थानीयकृत प्रकृति: तड़ित-झंझाएँ अत्यधिक स्थानीयकृत होती हैं तथा तीव्र गति से विकसित होती हैं।
    • तीव्रता में अचानक वृद्धि: वायु की गति कुछ ही मिनटों में अत्यधिक बढ़ सकती है।
    • बहु-तूफ़ानी कोशिकाएँ: विभिन्न जिलों में एक ही समय पर कई तूफ़ान उत्पन्न हो सकते हैं।

क्या आप जानते हैं?

  • वर्तमान में तड़ित-झंझाओं एवं बिजली गिरने की घटनाओं को उन 12 राष्ट्रीय अधिसूचित आपदाओं में शामिल नहीं किया गया है, जिनके लिए राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) अथवा राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) के अंतर्गत स्वतः वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
  • हालाँकि, राज्यों को यह लचीलापन प्राप्त है कि वे अपने SDRF आवंटन का 10% तक स्थानीय आपदाओं, जैसे बिजली गिरने एवं तड़ित-झंझाओं, पर व्यय कर सकते हैं।
  • भारत में राष्ट्रीय अधिसूचित आपदाएँ:
    • चक्रवात
    • सूखा
    • भूकंप
    • अग्निकांड
    • बाढ़
    • सुनामी
    • ओलावृष्टि
    • भूस्खलन
    • हिमस्खलन
    • बादल फटना
    • कीट आक्रमण
    • पाला एवं शीत लहर

सरकारी उपाय एवं नीतिगत समर्थन

  • भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की पूर्व चेतावनी प्रणाली: IMD नियमित रूप से मौसम बुलेटिन, तड़ित-झंझा चेतावनी तथा नाउकास्ट (अल्पकालिक पूर्वानुमान) जारी करता है।
    • IMD ने उत्तर प्रदेश में वास्तविक समय निगरानी हेतु लगभग 2,400 मौसम केंद्र स्थापित कर अपनी अवलोकन अवसंरचना को सुदृढ़ किया है।
    • मुख्य पहलों में डॉप्लर मौसम रडार, मोबाइल मौसम चेतावनी तथा नाउकास्ट सेवाएँ शामिल हैं।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA): NDMA ने बिजली गिरने से सुरक्षा, तड़ित-झंझा तैयारी तथा जन-जागरूकता अभियानों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
  • सचेत पोर्टल (राष्ट्रीय आपदा चेतावनी प्रणाली): NDMA ने कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल (CAP) आधारित अखिल भारतीय एकीकृत चेतावनी प्रणाली की परिकल्पना की है।
    • इसमें भू-स्थानिक बुद्धिमत्ता के उपयोग द्वारा विभिन्न तकनीकी माध्यमों से लगभग वास्तविक समय में प्रारंभिक चेतावनी का प्रसार शामिल है।
    • सुझाए गए उपाय:
      • बिजली चमकने के दौरान खुले मैदानों से दूर रहें।
      • तूफ़ान के समय घर के भीतर रहें।
      • ढीली वस्तुओं एवं संरचनाओं को सुरक्षित करें।
      • स्थानीय आपदा प्रतिक्रिया प्रणालियों को सुदृढ़ बनाएं।
      • लाइटनिंग रेज़िलिएंट इंडिया अभियान
      • यह बहु-हितधारक पहल बिजली गिरने से होने वाली मौतों को कम करने, सामुदायिक जागरूकता बढ़ाने तथा वैज्ञानिक पूर्वानुमान को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से संचालित की जा रही है।
  • राज्य आपदा प्रतिक्रिया उपाय: राज्य सरकारें पीड़ितों को मुआवजा प्रदान करने, विद्युत आपूर्ति की आपातकालीन बहाली तथा राहत एवं पुनर्वास सहायता प्रदान करने जैसे कदम उठाती हैं।

आगे की राह

  • पूर्वानुमान की सटीकता में सुधार: उच्च-रिज़ॉल्यूशन मौसम मॉडल, रडार नेटवर्क का विस्तार तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित पूर्वानुमान प्रणालियों का विकास आवश्यक है।
  • जन-जागरूकता को सुदृढ़ करना: सामुदायिक स्तर पर तैयारी से जनहानि में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
  • जलवायु-सहिष्णु अवसंरचना: अधिक सुदृढ़ आवासीय संरचनाएँ, जहाँ संभव हो वहाँ भूमिगत विद्युत लाइनें तथा आपदा-सहिष्णु शहरी नियोजन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • आपदा प्रबंधन के साथ एकीकरण: तड़ित-झंझाओं को भी बाढ़ एवं चक्रवातों की भाँति स्थानीय आपदा प्रबंधन योजनाओं में अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।

स्रोत: IE

 

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