पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत और यूनाइटेड किंगडम ने घोषणा की है कि व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) 15 जुलाई 2026 से प्रभावी होगा।
पृष्ठभूमि
- भारत–यूनाइटेड किंगडम मुक्त व्यापार समझौता (FTA) पर वार्ताएँ वर्ष 2022 में औपचारिक रूप से प्रारंभ हुईं। इसका उद्देश्य आर्थिक सहयोग को गहरा करना तथा द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देना था।
- चौदह चरणों की गहन वार्ताओं के बाद मई 2025 में CETA पर सहमति बनी और 24 जुलाई 2025 को इस पर आधिकारिक हस्ताक्षर किए गए।
- समझौते के ढाँचे को पूर्ण करने के लिए द्वैध अंशदान अभिसमय (Double Contribution Convention–DCC) पर 10 फरवरी 2026 को हस्ताक्षर किए गए।
समझौते की प्रमुख विशेषताएँ एवं लाभ

भारत के लिए
1. भारत के 99% उत्पादों को यूनाइटेड किंगडम के बाजार में शुल्क-मुक्त प्रवेश
- यह भारतीय निर्यात के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, विशेषकर वस्त्र, जूते-चप्पल, रत्न एवं आभूषण तथा अभियांत्रिकी उत्पादों जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए, जिन पर पहले 4% से 16% तक सीमा शुल्क लगता था।
2. भारतीय पेशेवरों के लिए आसान प्रवेश
- इस समझौते के अंतर्गत रसोइये, योग प्रशिक्षक तथा सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों जैसे भारतीय पेशेवरों को यूनाइटेड किंगडम में अस्थायी रूप से कार्य करने का सुनिश्चित अवसर मिलेगा।
3. विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा
- इलेक्ट्रॉनिक्स, औषधि, रसायन, खाद्य प्रसंस्करण तथा प्लास्टिक उद्योगों के निर्यात में वृद्धि की संभावना है।
4. कृषि एवं मत्स्य क्षेत्र को लाभ
- अनेक कृषि एवं समुद्री उत्पादों को शुल्क-मुक्त प्रवेश मिलने से भारतीय किसान तथा मत्स्य क्षेत्र यूनाइटेड किंगडम के बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे।
यूनाइटेड किंगडम के लिए
1. भारत में आने वाले लगभग 90% ब्रिटिश उत्पादों पर शुल्क में कमी
- इससे ब्रिटिश उत्पाद भारतीय बाजार में अधिक किफायती होंगे।
2. ब्रिटिश व्हिस्की एवं जिन पर सीमा शुल्क में भारी कमी
- व्हिस्की एवं जिन पर वर्तमान 150% शुल्क को तत्काल घटाकर 75% किया जाएगा तथा अगले 10 वर्षों में इसे क्रमशः 40% तक लाया जाएगा।
- इससे ब्रिटिश मदिरा उद्योग को भारतीय बाजार में बड़ा लाभ मिलेगा।
3. यूनाइटेड किंगडम में निर्मित कुछ वाहनों पर कम शुल्क
- आयात शुल्क घटने से ब्रिटिश वाहन निर्माता भारतीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे।
4. भारत की केंद्रीय सरकारी खरीद निविदाओं तक पहुँच
- यूनाइटेड किंगडम की कंपनियाँ निर्धारित मूल्य से अधिक की सरकारी परियोजनाओं के लिए निविदा प्रस्तुत कर सकेंगी, जिससे उन्हें विशाल भारतीय बाजार तक पहुँच मिलेगी।
5. वित्तीय एवं व्यावसायिक सेवाओं को लाभ
- सूचना प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाओं तथा परामर्श एवं अभियांत्रिकी जैसी व्यावसायिक सेवाओं में कार्यरत ब्रिटिश कंपनियों को इस समझौते से लाभ मिलेगा।
समग्र प्रभाव
- इस समझौते से द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है तथा 2030 तक इसे लगभग 120 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।
- यूनाइटेड किंगडम को होने वाले 99% भारतीय निर्यात पर शून्य या कम शुल्क लागू होगा, जिससे भारत को बांग्लादेश, वियतनाम तथा चीन जैसे प्रमुख निर्यातक देशों की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा।
- तिरुपुर, सूरत, लुधियाना, पुणे, चेन्नई, गुजरात, पश्चिम बंगाल तथा असम जैसे प्रमुख विनिर्माण केंद्रों के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।
- यह समझौता दोनों देशों के लिए एक बड़ी आर्थिक उपलब्धि माना जा रहा है, जिससे रोजगार, आय तथा आर्थिक विकास में वृद्धि होगी।
- इस मुक्त व्यापार समझौते के साथ यूनाइटेड किंगडम–भारत विज़न 2035 रूपरेखा भी लागू की जा रही है, जिसका उद्देश्य रक्षा, जलवायु समाधान तथा शिक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को गहरा करना है।
यूनाइटेड किंगडम–भारत विज़न 2035
बढ़ी हुई महत्वाकांक्षा
- दोनों देशों ने अपने संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक पहुँचाने के बाद सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय सहयोग एवं विकास किया है।
- विज़न 2035 इसी गति को आगे बढ़ाते हुए द्विपक्षीय सहयोग को और व्यापक एवं गहरा बनाने के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करता है।
रणनीतिक दृष्टि
- भारत–यूनाइटेड किंगडम विज़न 2035 भविष्य के सहयोग, नवाचार तथा दीर्घकालिक साझेदारी के लिए स्पष्ट रणनीतिक लक्ष्य एवं चरण निर्धारित करता है।
प्रमुख आर्थिक लाभ
1. सामाजिक सुरक्षा समझौता (DCC)
- द्वैध अंशदान अभिसमय (Double Contribution Convention–DCC) के लागू होने से अस्थायी नियुक्ति पर यूनाइटेड किंगडम जाने वाले भारतीय कर्मचारी एवं उनके नियोक्ताओं को वहाँ दोहरी सामाजिक सुरक्षा अंशदान देने से छूट मिलेगी।
- इस छूट की अवधि 3 वर्ष से बढ़ाकर 5 वर्ष कर दी गई है।
2. इस्पात निर्यातकों के हितों की सुरक्षा
- 1 जुलाई 2026 से लागू होने वाले यूनाइटेड किंगडम के इस्पात संबंधी उपायों पर दोनों देशों के बीच रचनात्मक विचार-विमर्श के बाद यह सहमति बनी कि व्यापारिक हितों की रक्षा की जाएगी, बाजार में व्यवधान कम किया जाएगा तथा निर्यातकों के लिए संतुलित एवं स्थिर व्यापारिक वातावरण सुनिश्चित किया जाएगा।
- भारत के 85% इस्पात निर्यात इन इस्पात उपायों के दायरे से बाहर रखे गए हैं।
- शेष उत्पादों के लिए देश-विशिष्ट कोटा (CSQ), अवशिष्ट कोटा तथा अधिकृत उपयोग योजना (Authorised Use Scheme–AUS) के माध्यम से भारत के हितों की रक्षा की गई है।
समझौते की चुनौतियाँ
1. वैश्विक मानकों का अनुपालन
- भारतीय निर्यातकों को यूनाइटेड किंगडम के कठोर गुणवत्ता, सुरक्षा, स्वच्छता तथा तकनीकी मानकों का पालन करने में कठिनाई हो सकती है, विशेषकर खाद्य प्रसंस्करण, औषधि, वस्त्र तथा अभियांत्रिकी क्षेत्रों में।
2. घरेलू उद्योगों पर दबाव
- यूनाइटेड किंगडम के उत्पादों, विशेषकर वाहन, प्रीमियम वस्तुएँ तथा मशीनरी को अधिक बाजार पहुँच मिलने से भारतीय उद्योगों पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव बढ़ सकता है।
3. गैर-शुल्कीय बाधाओं का बने रहना
- शुल्क में कमी के बावजूद नियामकीय भिन्नताएँ, प्रमाणन संबंधी आवश्यकताएँ, व्यापार की तकनीकी बाधाएँ तथा स्थिरता संबंधी मानक भारतीय निर्यात की वृद्धि को प्रभावित कर सकते हैं।
आगे की राह
- भारतीय उद्योगों की उत्पादकता, प्रौद्योगिकी अपनाने की क्षमता तथा गुणवत्ता मानकों में सुधार किया जाए ताकि वे यूनाइटेड किंगडम के बाजार में प्रभावी प्रतिस्पर्धा कर सकें।
- सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) को उद्गम के नियम (Rules of Origin), प्रमाणन प्रक्रियाओं तथा मुक्त व्यापार समझौते के लाभों की जानकारी देने हेतु प्रशिक्षण, डिजिटल मंच एवं संस्थागत सहायता प्रदान की जाए।
- परीक्षण प्रयोगशालाओं, प्रमाणन सुविधाओं तथा नियामकीय ढाँचे का विस्तार किया जाए ताकि भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बन सकें।
- निर्यात में विविधीकरण को बढ़ावा दिया जाए, उच्च-मूल्य विनिर्माण को प्रोत्साहित किया जाए तथा भारतीय उद्योगों को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (Global Value Chains) से जोड़ा जाए, जिससे CETA के लाभों का पूर्ण उपयोग किया जा सके।
स्रोत: PIB