शहरी क्षेत्रों में जल संदूषण 

पाठ्यक्रम: GS1/ शहरीकरण से जुड़ी चुनौतियाँ, GS2/ शासन

संदर्भ

  • दक्षिण दिल्ली की गुलमोहर पार्क कॉलोनी में विगत दो सप्ताह से पेयजल पाइपलाइनों के माध्यम से सीवेज-मिश्रित जल की आपूर्ति की जा रही है।

जल संदूषण

  • जल संदूषण तब होता है जब प्राकृतिक प्रक्रियाओं अथवा मानवीय गतिविधियों के कारण हानिकारक पदार्थ जल में मिल जाते हैं और उनकी मात्रा सुरक्षित अनुमेय सीमा से अधिक हो जाती है।
    • जैविक संदूषण: यह बैक्टीरिया, विषाणु (वायरस), प्रोटोजोआ तथा परजीवियों जैसे रोगजनकों के कारण उत्पन्न होता है।
      •  उदाहरण: ई. कोलाई (E. coli), हैजा (Cholera) के जीवाणु आदि।
  • रासायनिक संदूषण: यह औद्योगिक अपशिष्टों, कीटनाशकों, भारी धातुओं तथा पोषक तत्वों की अत्यधिक मात्रा के कारण होता है।
  • भौतिक संदूषण: इसमें अवसाद , प्लास्टिक तथा निलंबित ठोस पदार्थ सम्मिलित होते हैं।
  • रेडियोधर्मी संदूषण: यह तब होता है जब रेडियोधर्मी पदार्थ जल स्रोतों में प्रवेश कर जाते हैं।

सीवेज पेयजल में मिलने के कारण

  • जल पाइपलाइनों में रिसाव: जल पाइपों में दरारों तथा क्षतिग्रस्त जोड़  के माध्यम से सीवेज जल में प्रवेश कर जाता है। यह जोखिम तब बढ़ जाता है जब पाइपलाइनें पुरानी, जर्जर हों अथवा निर्माण कार्यों के दौरान क्षतिग्रस्त हो जाएँ।
  • अंतराल आधारित जलापूर्ति: भारत के अधिकांश शहरों में प्रतिदिन केवल कुछ घंटों के लिए जलापूर्ति की जाती है। खाली अथवा निम्न-दाब वाली पाइपों में उत्पन्न चूषण के कारण रिसाव स्थलों से दूषित जल अंदर प्रवेश कर जाता है।
  • प्राचीन शहरी अवसंरचना तंत्र: अनेक पाइपलाइनें दशकों पूर्व बिछाई गई थीं और अपनी निर्धारित आयु पूरी कर चुकी हैं। नियमित रखरखाव के अभाव में संदूषण का जोखिम बढ़ जाता है।
  • खराब सीवेज प्रबंधन: शहरी परिवारों का एक बड़ा भाग संगठित सीवर नेटवर्क से वंचित है। सेप्टिक टैंक तथा अनुपचारित अपशिष्ट जल प्रायः नालों एवं जलमार्गों में छोड़ा जाता है।

शहरी जल शासन से संबंधित संरचनात्मक चुनौतियाँ

  • जलापूर्ति एवं सीवर नेटवर्क के व्यापक डिजिटीकृत मानचित्रों का अभाव।
  • विभिन्न एजेंसियों के बीच दायित्वों का विखंडन।
  • जलापूर्ति एवं सीवेज विभागों के बीच कमजोर समन्वय।
  • अपर्याप्त जल एवं स्वच्छता अवसंरचना वाली बड़ी अनौपचारिक बस्तियाँ।
  • वर्तमान मानक जल गुणवत्ता पर केंद्रित हैं, किंतु सेवा वितरण तंत्र पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते।

शहरी क्षेत्रों में जल संदूषण से संबंधित चिंताएँ

  • स्वास्थ्य संबंधी खतरे: हैजा, टाइफाइड, पेचिश तथा हेपेटाइटिस जैसे जलजनित रोगों के प्रसार से सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर अतिरिक्त भार पड़ता है।
  • आर्थिक लागत में वृद्धि: बोतलबंद जल, जल शोधक तथा चिकित्सा उपचार पर घरेलू व्यय बढ़ जाता है।
  • पर्यावरणीय अवनयन: अपर्याप्त अपशिष्ट जल प्रबंधन तथा शहरी जल निकायों के प्रदूषण के कारण पर्यावरणीय क्षति होती है।
  • सामाजिक असमानता: निम्न-आय वर्ग के परिवार वैकल्पिक सुरक्षित जल स्रोतों तक पहुँच बनाने में अपेक्षाकृत कम सक्षम होते हैं।
  • शहरी प्रत्यास्थता के लिए खतरा: बार-बार होने वाली संदूषण की घटनाएँ सतत शहरी विकास तथा नागरिक सेवाओं के प्रति जनविश्वास को कमजोर करती हैं।

संवैधानिक एवं विधिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 21: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें सुरक्षित पेयजल तक पहुँच का अधिकार भी निहित है।
    • सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991): उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में प्रदूषण-मुक्त जल एवं वायु का अधिकार भी सम्मिलित है।
    • ए.पी. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड-II बनाम प्रो. एम.वी. नायडू (1999): न्यायालय ने कहा कि सुरक्षित पेयजल तक पहुँच जीवन के लिए एक मौलिक आवश्यकता है।
  • अनुच्छेद 243W: यह शहरी स्थानीय निकायों को जलापूर्ति, स्वच्छता तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रबंधन का अधिकार प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 47: राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों (DPSP) के अंतर्गत यह राज्य को पोषण स्तर, जीवन स्तर एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने का निर्देश देता है।

सरकारी पहलें

  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016: स्रोत स्तर पर अपशिष्ट के जैव-अवक्रमणीय, अजैव-अवक्रमणीय तथा घरेलू खतरनाक अपशिष्टों में पृथक्करण को अनिवार्य बनाते हैं।
    • कम्पोस्टिंग, बायो-मीथनेशन तथा अपशिष्ट-से-ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के माध्यम से अपशिष्ट प्रसंस्करण को प्रोत्साहन  देते हैं।
  • स्वच्छ भारत मिशन (SBM): एसबीएम-शहरी (SBM-U) 100% घर-घर अपशिष्ट संग्रहण तथा स्रोत-स्तरीय पृथक्करण को प्रोत्साहित करता है।
    • एसबीएम-ग्रामीण (SBM-G) गाँवों में जैविक अपशिष्ट कम्पोस्टिंग एवं बायोगैस संयंत्रों को प्रोत्साहन  देता है।
  • स्मार्ट सिटीज मिशन: नागरिक सेवाओं, विशेषकर जल प्रणालियों की प्रौद्योगिकी-आधारित निगरानी को प्रोत्साहित करता है।
  • अटल मिशन फॉर रीजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (AMRUT): शहरी अपशिष्ट प्रबंधन हेतु सुदृढ़ सीवेज नेटवर्क एवं उपचार संयंत्रों के विकास का लक्ष्य रखता है।

आगे की राह

  • प्राचीन पाइपलाइनों का आधुनिकीकरण: शहरी स्थानीय निकायों को पुरानी जल एवं सीवर पाइपलाइनों के प्रतिस्थापन तथा आधुनिकीकरण को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  • वास्तविक समय आधारित निगरानी: शहरी जल नेटवर्क में सेंसर-आधारित वास्तविक समय जल गुणवत्ता निगरानी प्रणाली को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए।
  • विकेंद्रीकृत अपशिष्ट जल उपचार प्रणाली (DEWATS) मुख्य सीवर लाइनों पर दबाव कम करने के लिए आवासीय सोसाइटियों, पार्कों आदि में लघु एवं स्थानीयकृत उपचार इकाइयों की स्थापना की जानी चाहिए।
  • स्वतंत्र तृतीय-पक्ष लेखा-परीक्षण: जल अवसंरचना के स्वतंत्र तृतीय-पक्ष ऑडिट को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

  • शहरी क्षेत्रों में जल संदूषण केवल एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती नहीं है, बल्कि यह शहरी शासन, पर्यावरणीय स्थिरता एवं सामाजिक न्याय से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है। सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सुदृढ़ अवसंरचना, प्रभावी निगरानी, बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन तथा संस्थागत समन्वय को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

Source: IE

 

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