भारत के शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI ) में गिरावट 

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रवाह सुदृढ़ बने रहने के बावजूद हाल के वर्षों में भारत के शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में तीव्र गिरावट दर्ज की गई है।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) क्या है?

  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से आशय विदेशी संस्थाओं (व्यक्तियों अथवा कंपनियों) द्वारा किसी अन्य देश के व्यावसायिक हितों में निवेश करने से है, जो सामान्यतः उद्यमों में स्वामित्व अथवा नियंत्रण के रूप में किया जाता है।
  • वर्तमान में भारत में निम्नलिखित क्षेत्रों में FDI प्रतिबंधित है—
    • लॉटरी व्यवसाय
    • जुआ एवं सट्टेबाजी
    • चिट फंड
    • निधि कंपनी
    • रियल एस्टेट व्यवसाय
    • तंबाकू आधारित सिगार, चेरूट, सिगारिलो तथा सिगरेटों का निर्माण
  • शुद्ध FDI : यह देश में आने वाले विदेशी निवेश और विनिवेश तथा पूंजी प्रत्यावर्तन के माध्यम से बाहर जाने वाली पूंजी के मध्य अंतर को दर्शाता है।
    • शुद्ध FDI में गिरावट का अर्थ यह आवश्यक नहीं है कि निवेशकों की रुचि कम हो रही है, क्योंकि सकल निवेश प्रवाह सुदृढ़ बना रह सकता है।
    • भारत का शुद्ध FDI वर्ष 2020-21 में 44 अरब डॉलर से घटकर वर्ष 2024-25 में 1 अरब डॉलर से भी कम रह गया।
    • इसके पश्चात वर्ष 2025-26 में यह आंशिक रूप से बढ़कर 7.6 अरब डॉलर हो गया।
    • यह गिरावट वर्ष 2025-26 में 94.6 अरब डॉलर के सुदृढ़ सकल FDI प्रवाह के बावजूद हुई, जिससे स्पष्ट होता है कि बड़े पैमाने पर पूंजी बहिर्वाह नए निवेश प्रवाह को संतुलित कर रहा है।

भारत की FDI नीति का विकास

  • वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों के दौरान FDI को मुख्यतः निम्न उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्रोत्साहित किया गया था—
    • उन्नत प्रौद्योगिकी का अधिग्रहण
    • निर्यात संवर्धन
    • विदेशी मुद्रा भंडार का संरक्षण
  • समय के साथ नीतिगत प्राथमिकता विदेशी पूंजी के अधिकाधिक प्रवाह को आकर्षित करने तथा भारत की निवेश आकर्षण क्षमता को बढ़ाने की ओर स्थानांतरित हो गई।
  • परिणामस्वरूप निवेश की गुणवत्ता, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा भविष्य में उत्पन्न होने वाले बाह्य भुगतान दायित्वों से संबंधित चिंताओं पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया।

FDI निवेशकों के विभिन्न प्रकार

  • वास्तविक FDI (RFDI): वास्तविक FDI बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किया जाता है, जो मेजबान देश में उत्पादन इकाइयों एवं सेवा परिचालनों की स्थापना करती हैं।
    • ऐसे निवेश सामान्यतः—
      • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण
      • प्रबंधकीय विशेषज्ञता
      • रोजगार सृजन
      • दीर्घकालिक औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन  देते हैं।
    • विकासात्मक दृष्टिकोण से इसे FDI का सर्वाधिक लाभकारी स्वरूप माना जाता है।
    • वर्ष 2022-23 से 2025-26 के दौरान प्रभावी निवेश प्रवाह में इसकी हिस्सेदारी केवल 41.9% रही।
  • वित्तीय निवेशक :
    • इनमें शामिल हैं—
      • निजी इक्विटी फंड 
      • वेंचर कैपिटल फर्में
      • संप्रभु संपत्ति निधियाँ 
      • परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियाँ 
    • इनका प्रमुख उद्देश्य दीर्घकालिक उत्पादक क्षमता का निर्माण करने के बजाय पूंजीगत लाभ अर्जित करना होता है।
    • प्रभावी निवेश प्रवाह में इनकी हिस्सेदारी 40.5% रही, जो वास्तविक FDI के लगभग बराबर है।
  • प्रवासी निवेश एवं विशेष प्रयोजन वाहन (SPVs): प्रवासी निवेशकों तथा विशेष प्रयोजन वाहनों का योगदान प्रभावी निवेश प्रवाह में 17.6% रहा।
    • ऐसे निवेश प्रायः ऑफशोर वित्तीय केंद्र के माध्यम से किए जाते हैं तथा इनमें घरेलू पूंजी के पुनः निवेश की संभावना भी होती है।

भारत में FDI के मार्ग

  • स्वचालित मार्ग: पूर्व सरकारी स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती।
    • निवेश करने के पश्चात निवेशकों को भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को सूचित करना होता है।
    • विनिर्माण एवं सॉफ्टवेयर जैसे अधिकांश क्षेत्र इसी मार्ग के अंतर्गत आते हैं।
  • सरकारी अनुमोदन मार्ग : संबंधित मंत्रालय अथवा विभाग से पूर्व अनुमति आवश्यक होती है।
    • दूरसंचार, मीडिया, औषधि तथा बीमा जैसे क्षेत्र इस मार्ग के अंतर्गत आते हैं।

शुद्ध FDI में गिरावट के कारण

  • बढ़ता विनिवेश एवं पूंजी प्रत्यावर्तन शुद्ध FDI के कमजोर होने का प्रमुख कारण निवेशकों द्वारा बढ़ते पैमाने पर निकासी तथा पूंजी प्रत्यावर्तन है।
    • कैलेंडर वर्ष 2025 में कुल दर्ज विनिवेश 52 अरब डॉलर तक पहुँच गया।
    • इसमें 45 प्रमुख निजी इक्विटी एवं वेंचर कैपिटल निकासों  का योगदान लगभग 29 अरब डॉलर रहा।
  • विनिर्माण-केंद्रित FDI में गिरावट: लगातार तीन चार-वर्षीय अवधियों में विनिर्माण क्षेत्र में FDI में कमी दर्ज की गई है।
    • नवीनतम चार-वर्षीय अवधि में विनिर्माण क्षेत्र में वास्तविक FDI की हिस्सेदारी कुल प्रभावी निवेश प्रवाह का केवल 10.6% रही।
  • बाह्य प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (OFDI) में वृद्धि: हाल के वर्षों में भारत का बाह्य प्रत्यक्ष विदेशी निवेश उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है।
    • वर्ष 2023-24 से 2025-26 के बीच भारतीय कंपनियों ने विदेशों में लगभग 65 अरब डॉलर का निवेश किया।
    • गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (GIFT City) स्थित अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSC) सीमा-पार पूंजी प्रवाह के एक महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में उभर रहा है।
    • GIFT City के माध्यम से संचालित OFDI वर्ष 2023-24 के 246 मिलियन डॉलर से बढ़कर वर्ष 2025-26 में 1.18 अरब डॉलर हो गया।

मुख्य चिंताएँ

  • FDI का वित्तीयकरण: वित्तीय निवेशकों की बढ़ती हिस्सेदारी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा दीर्घकालिक औद्योगिक लाभों को सीमित कर सकती है।
  • विनिर्माण क्षेत्र में कमजोर FDI: विनिर्माण-उन्मुख FDI में गिरावट औद्योगिकीकरण, रोजगार सृजन तथा निर्यात वृद्धि को प्रभावित कर सकती है।
  • शुद्ध FDI में गिरावट: बढ़ते विनिवेश एवं पूंजी प्रत्यावर्तन के कारण विदेशी मुद्रा की शुद्ध प्राप्तियों में उल्लेखनीय कमी आई है।
  • सकल एवं शुद्ध FDI के बीच बढ़ता अंतर: सकल निवेश प्रवाह मजबूत दिखाई दे सकता है, किंतु यह शुद्ध FDI तथा निवेश की गुणवत्ता में अंतर्निहित कमजोरियों को छिपा सकता है।
  • पूंजी पुनर्चक्रण के जोखिम: SPVs तथा अपतटीय वित्तीय केंद्रों के उपयोग से निवेश प्रवाह की वास्तविक प्रकृति अस्पष्ट हो सकती है।

आगे की राह

  • मात्रा से अधिक गुणवत्ता को प्राथमिकता: भारत को केवल निवेश प्रवाह की मात्रा बढ़ाने के बजाय प्रौद्योगिकी-गहन, निर्यातोन्मुख तथा रोजगार-सृजनकारी FDI को आकर्षित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • विनिर्माण क्षेत्र में FDI को प्रोत्साहन: नीतिगत समर्थन के माध्यम से विनिर्माण क्षेत्र में ग्रीनफील्ड निवेशों को प्रोत्साहन  दिया जाना चाहिए, जिससे औद्योगिक क्षमता एवं वैश्विक मूल्य शृंखलाओं के साथ एकीकरण सुदृढ़ हो सके।
  • FDI रिपोर्टिंग में पारदर्शिता में वृद्धि: आधिकारिक आँकड़ों में वास्तविक FDI, वित्तीय निवेश तथा SPV-आधारित निवेश प्रवाहों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए, ताकि बेहतर नीतिगत मूल्यांकन संभव हो सके।
  • घरेलू प्रतिस्पर्धात्मकता का सुदृढ़ीकरण: अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स, व्यवसाय सुगमता तथा नवाचार पारितंत्र में सुधार करके अधिक उत्पादक एवं सतत निवेश आकर्षित किए जा सकते हैं।

निष्कर्ष

  • भारत में शुद्ध FDI में गिरावट यह संकेत देती है कि केवल सकल निवेश प्रवाह के आधार पर निवेश परिदृश्य का आकलन पर्याप्त नहीं है। दीर्घकालिक आर्थिक विकास, औद्योगिकीकरण तथा तकनीकी उन्नयन सुनिश्चित करने के लिए निवेश की गुणवत्ता, विनिर्माण-उन्मुख FDI तथा पूंजी प्रवाह की पारदर्शिता पर विशेष बल देना आवश्यक है।

Source: TH

 

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