भारतीय जलाशयों में 102 गीगावाट तैरती सौर ऊर्जा क्षमता की संभावनाएँ: रिपोर्ट 

पाठ्यक्रम: GS3/नवीकरणीय ऊर्जा

संदर्भ

  • राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान (NISE) द्वारा किए गए प्रथम व्यापक राष्ट्रीय आकलन के अनुसार, भारत के जलाशयों में लगभग 102 गीगावाट (GW) तैरती सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित की जा सकती है।

प्रमुख बिंदु

  • रिपोर्ट: “सोलर पीवी पोटेंशियल ऑफ इंडिया (फ्लोटिंग सोलर)”
  • कुल तैरती सौर ऊर्जा (FSPV) क्षमता: रिपोर्ट के अनुसार, यदि जलाशयों के केवल 20% क्षेत्रफल का उपयोग किया जाए, तो भारत में तैरती सौर ऊर्जा (FSPV) की कुल संभावित क्षमता लगभग 102.18 गीगावाट है।
  • क्षेत्रवार क्षमता: महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा, तेलंगाना और गुजरात में तैरती सौर ऊर्जा की उच्च संभावनाएँ हैं, जो बड़े एवं तकनीकी रूप से उपयुक्त जलाशयों तथा अंतर्देशीय जल निकायों की उपलब्धता को दर्शाती हैं।
  • भूमि-आधारित सौर ऊर्जा का पूरक: तैरती सौर ऊर्जा भारत के नवीकरणीय ऊर्जा पोर्टफोलियो में भूमि-आधारित सौर ऊर्जा की एक महत्त्वपूर्ण एवं विस्तार योग्य पूरक तकनीक है।
  • जल संरक्षण में योगदान: तैरते सौर पैनल जल निकायों को छाया प्रदान करते हैं, जिससे वाष्पीकरण में 30–60% तक कमी आती है।
    • बड़े पैमाने की परियोजनाओं से प्रतिवर्ष लगभग 1.95 करोड़ घन मीटर (19.5 मिलियन क्यूबिक मीटर) जल संरक्षण का प्रदर्शन हुआ है।
  • आर्थिक पक्ष: तैरती सौर ऊर्जा प्रणालियाँ वर्तमान में भूमि-आधारित सौर प्रणालियों की तुलना में लगभग 25% अधिक महंगी हैं, क्योंकि इनमें तैरती संरचनाओं, एंकरिंग तथा जलरोधी (Waterproofing) व्यवस्था की आवश्यकता होती है। हालाँकि—
    • उच्च दक्षता,
    • भूमि की बचत,
    • जल संरक्षण,
    • कम संचरण लागत,
    • तथा हाइब्रिड एकीकरण
    • जैसे कारक दीर्घकालिक वित्तीय व्यवहार्यता को बेहतर बनाते हैं।

भूमि-आधारित सौर प्रणालियों से तुलना

  • भारत की लगभग 100 गीगावाट स्थापित सौर क्षमता में भूमि-आधारित सौर प्रणालियों का प्रभुत्व है।
  • इन प्रणालियों को सौर पैनलों द्वारा घेरे गए वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना में तीन से चार गुना अधिक भूमि की आवश्यकता होती है।
  • भूमि अधिग्रहण महंगा होने के साथ-साथ कृषि एवं आवासीय गतिविधियों के साथ संघर्ष का कारण भी बनता है।
  • भारत द्वारा वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता प्राप्त करने के लक्ष्य की दिशा में भूमि उपलब्धता एक प्रमुख बाधा बनी हुई है।

भारत के ऊर्जा लक्ष्य

  • उत्सर्जन तीव्रता में कमी: भारत ने वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में वर्ष 2035 तक अपनी GDP की उत्सर्जन तीव्रता (GDP की प्रति इकाई पर CO₂ उत्सर्जन) में 47% की कमी लाने का संकल्प लिया है।
    • वर्ष 2005 से 2020 के बीच भारत अपनी उत्सर्जन तीव्रता में लगभग 36% की कमी ला चुका है।
  • गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता का विस्तार: भारत ने वर्ष 2035 तक अपनी कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
    • वर्ष 2026 तक भारत 50% से अधिक गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता प्राप्त कर चुका है, जो उसके पूर्व निर्धारित लक्ष्य से आगे है।
  • कार्बन सिंक का निर्माण: भारत ने वर्ष 2035 तक वन एवं वृक्षावरण के माध्यम से 3.5 से 4 अरब टन CO₂ समतुल्य कार्बन सिंक निर्मित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

तैरती सौर फोटोवोल्टिक प्रणाली (FSPV)

  • तैरती सौर फोटोवोल्टिक प्रणाली, जिसे “फ्लोटोवोल्टाइक्स” भी कहा जाता है, एक ऐसी तकनीक है जिसमें सौर पैनलों को जलाशयों, झीलों तथा बाँधों जैसे जल निकायों पर तैरती संरचनाओं के ऊपर स्थापित किया जाता है।
  • वैश्विक परिदृश्य: वर्ष 2024 तक विश्व स्तर पर तैरती सौर ऊर्जा क्षमता लगभग 9.6 गीगावाट तक पहुँच चुकी थी। इसका लगभग 90% हिस्सा एशिया में स्थापित है।
    • चीन: चीन इस क्षेत्र में अग्रणी है।
      • पोयांग झील के मत्स्य फार्म पर स्थापित 120 मेगावाट क्षमता वाला संयंत्र इसका प्रमुख उदाहरण है।
    • नीदरलैंड: यूरोप की कुल तैरती सौर ऊर्जा क्षमता का लगभग तीन-चौथाई भाग नीदरलैंड में स्थित है, जहाँ अधिकांश परियोजनाएँ खदान-निर्मित झीलों पर स्थापित की गई हैं।
    • भारत: भारत की प्रमुख परियोजना मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी पर स्थित ओंकारेश्वर तैरता सौर ऊर्जा पार्क है।
    • ओंकारेश्वर: इसकी वर्तमान क्षमता 278 मेगावाट है, जो देश की सबसे बड़ी तैरती सौर परियोजना है।
      • इसे भविष्य में 600 मेगावाट तक विस्तारित करने की योजना है।

FSPV के बढ़ते उपयोग के प्रमुख कारक

  • भूमि उपयोग संबंधी लाभ: तैरती सौर ऊर्जा उन जल सतहों का उपयोग करती है जिनकी सामान्यतः प्रतिस्पर्धी मांग कम होती है।
    • इससे भूमि अधिग्रहण की चुनौतियाँ कम होती हैं।
    • बड़े भूमि-आधारित सौर संयंत्रों की तुलना में सामाजिक संघर्ष भी न्यूनतम होते हैं।
  • ऊर्जा उत्पादन में बेहतर प्रदर्शन: जल निकाय सौर मॉड्यूलों को प्राकृतिक शीतलन प्रदान करते हैं।
    • इससे परिचालन तापमान कम होता है।
    • ऊर्जा उत्पादन क्षमता में वृद्धि हो सकती है।
  • जलविद्युत के साथ समन्वय: तैरती सौर परियोजनाओं को जलविद्युत जलाशयों के साथ स्थापित किया जा सकता है।
    • इससे साझा अवसंरचना का उपयोग संभव होता है।
    • हाइब्रिड विद्युत उत्पादन रणनीतियों को बढ़ावा मिलता है।
  • तीव्र बाजार विस्तार एवं नीतिगत समर्थन: चीन, नीदरलैंड, सिंगापुर तथा दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने तैरती सौर ऊर्जा हेतु समर्पित दिशानिर्देश विकसित किए हैं।
    • मानकीकरण के इन प्रयासों से निवेशकों का विश्वास बढ़ा है।
    • उपयोगिता-स्तरीय परियोजनाओं को प्रोत्साहन मिला है।

चुनौतियाँ

  • तीव्रता से विकास के बावजूद FSPV को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है—
    • प्रणाली की विश्वसनीयता से जुड़े प्रश्न
    • तरंगों से उत्पन्न यांत्रिक तनाव
    • पर्यावरणीय अनिश्चितताएँ
    • दीर्घकालिक प्रदर्शन संबंधी आँकड़ों का अभाव
  • रिपोर्ट में बेहतर मॉडलिंग ढाँचों तथा सुदृढ़ अवक्रमण आकलन प्रणालियों की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

आगे की राह

  • समर्पित सौर क्षमता पोर्टल का विकास: अधिक सूचित, पारदर्शी एवं कार्यान्वयन योग्य योजना निर्माण हेतु NISE एक समर्पित सौर क्षमता पोर्टल विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
  • राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय ऊर्जा नियोजन के साथ एकीकरण: NISE के आवधिक आकलनों एवं पोर्टल-आधारित आँकड़ों को राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरीय ऊर्जा नियोजन ढाँचों से जोड़ा जाएगा।
    • इससे— उच्च क्षमता वाले क्षेत्रों को अल्ट्रा-मेगा सौर पार्कों हेतु प्राथमिकता दी जा सकेगी।
    • ग्रिड सुदृढ़ीकरण एवं अवसंरचना विकास के लिए संसाधनों का रणनीतिक आवंटन संभव होगा।

निष्कर्ष

  • सतत क्षमता अद्यतन, समर्पित भू-स्थानिक पोर्टल तथा अनुप्रयोग-विशिष्ट आकलनों के संयोजन के माध्यम से NISE भारत की सौर ऊर्जा रूपरेखा के लिए एक वैज्ञानिक, पारदर्शी एवं नीतिगत रूप से प्रासंगिक आधार तैयार करने का प्रयास कर रहा है। तैरती सौर ऊर्जा न केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा दे सकती है, बल्कि भूमि संरक्षण, जल संरक्षण तथा ऊर्जा संक्रमण के राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

Source: TH

 

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