एआई (AI) से भारत के वैश्विक क्षमता केंद्र (GCC) के रोजगारों पर अपेक्षाकृत कम जोखिम

पाठ्यक्रम: जीएस-3 / अर्थव्यवस्था

सन्दर्भ

  • भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का भारत के वैश्विक क्षमता केंद्रों (GCCs) में रोजगार पर अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि ये केंद्र कम-लागत सेवा केंद्रों से विकसित होकर नवाचार-आधारित केंद्रों में परिवर्तित हो चुके हैं।

वैश्विक क्षमता केंद्र (GCCs) क्या हैं?

  • वैश्विक क्षमता केंद्र (Global Capability Centres) बहुराष्ट्रीय कंपनियों की विदेशी सहायक इकाइयाँ होती हैं, जो अपनी मूल कंपनी के लिए महत्वपूर्ण व्यावसायिक एवं प्रौद्योगिकी संबंधी कार्यों का निष्पादन करती हैं।
  • समय के साथ भारत में GCCs केवल कम लागत वाले सेवा केंद्र न रहकर अनुसंधान एवं विकास (R&D), उद्यम-स्तरीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा मंच, डिजिटल उत्पाद अभियांत्रिकी तथा नवाचार प्रबंधन के रणनीतिक केंद्र बन गए हैं।

उदाहरण:

  • गोल्डमैन सैक्स का बेंगलुरु केंद्र (प्रौद्योगिकी एवं जोखिम प्रबंधन)
  • एचएसबीसी का पुणे केंद्र (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित बैंकिंग)

GCC के प्रभुत्व को दर्शाने वाली प्रमुख प्रवृत्तियाँ

सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में मंदी के बावजूद भर्ती में वृद्धि:

  • वर्ष 2025 में सूचना प्रौद्योगिकी सेवा कंपनियों में नेतृत्व स्तर की भर्ती वृद्धि 2.4% रही।
  • जबकि GCCs में यह वृद्धि लगभग 7.7% रही।

महानगरों से आगे विस्तार:

  • GCCs का विस्तार अब केवल प्रथम श्रेणी (Tier-I) शहरों तक सीमित नहीं है।
  • नागपुर, इंदौर, कोयंबटूर एवं कोच्चि जैसे द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी (Tier-II एवं Tier-III) शहरों में प्रति तिमाही 8–9% की वृद्धि दर्ज की जा रही है।
  • इससे कुशल रोजगार का विकेंद्रीकरण हो रहा है,महानगरों के अवसंरचना पर दबाव कम हो रहा है एवं संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिल रहा है।

दीर्घकालिक प्रतिभा नियोजन:

  • GCCs सामान्यतः 3–5 वर्षों की विस्तार एवं क्षमता-वृद्धि योजनाओं पर कार्य करते हैं।
  • इसके विपरीत सूचना प्रौद्योगिकी सेवा कंपनियाँ तिमाही आधार पर ग्राहक मांग के अनुसार भर्ती करती हैं।

उच्च वेतन एवं विविध रोजगार:

  • GCCs पारंपरिक सूचना प्रौद्योगिकी सेवा कंपनियों की तुलना में 12–20% अधिक वेतन प्रदान करते हैं।
  • इनके विस्तार से ब्लू-कॉलर एवं अवसंरचना क्षेत्रों में भी रोजगार बढ़ रहा है तथा वित्तीय वर्ष 2030 तक 28–40 लाख अतिरिक्त रोजगार सृजित होने का अनुमान है।

GCC के रोजगारों पर AI का अपेक्षाकृत कम जोखिम क्यों है?

  • सूचना प्रौद्योगिकी सेवा कंपनियाँ अल्पकालिक ग्राहक मांग एवं विवेकाधीन प्रौद्योगिकी व्यय पर अधिक निर्भर होती हैं।
  • जब वैश्विक कंपनियाँ सूचना प्रौद्योगिकी पर व्यय कम करती हैं, तो ये कंपनियाँ शीघ्र ही भर्ती धीमी कर देती हैं या रोक देती हैं। इसलिए ये अधिक चक्रीय एवं संवेदनशील होती हैं।
  • इसके विपरीत, GCCs अपनी मूल कंपनियों का अभिन्न हिस्सा होते हैं और बाहरी ग्राहकों के अनुबंधों पर निर्भर नहीं रहते।
  • इनका मुख्य ध्यान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मंचों तथा उत्पाद अभियांत्रिकी जैसी दीर्घकालिक क्षमताओं के विकास पर होता है, न कि केवल अल्पकालिक राजस्व अर्जित करने पर।
  • इनके रणनीतिक दायित्व इन्हें बाजार की अस्थिरता एवं वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव से अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित बनाते हैं।

GCC-आधारित परिवर्तन का भारत पर प्रभाव

आर्थिक प्रभाव:

  • GCCs का विस्तार भारत को कम-लागत आधारित आउटसोर्सिंग से आगे बढ़ाकर उच्च-मूल्य एवं नवाचार-आधारित सेवाओं की वैश्विक मूल्य श्रृंखला में ऊपर ले जा रहा है।

रोजगार के अवसर:

  • GCCs सूचना प्रौद्योगिकी सेवा कंपनियों की तुलना में अधिक स्थिर एवं दीर्घकालिक प्रौद्योगिकी रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं।

क्षेत्रीय विकास:

  • द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के शहरों में GCCs के विस्तार से महानगरों के बाहर भी उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार उपलब्ध हो रहे हैं, जिससे संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिल रहा है।

कौशल एवं नवाचार पर प्रभाव:

  • GCCs अब केवल कार्य निष्पादन केंद्र नहीं रहे, बल्कि वैश्विक अनुसंधान एवं विकास, उद्यम-स्तरीय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तथा डिजिटल मंचों के स्वामित्व के केंद्र बन रहे हैं।
  • इससे भारत की नवाचार क्षमता मजबूत हो रही है तथा देश वैश्विक प्रौद्योगिकी विकास प्रक्रिया से और अधिक गहराई से जुड़ रहा है।

रणनीतिक प्रभाव:

  • वैश्विक कंपनियों की महत्वपूर्ण क्षमताओं की मेजबानी करने से डिजिटल मूल्य श्रृंखलाओं में भारत का रणनीतिक महत्व बढ़ रहा है।

चिंताएँ

बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा:

  • अन्य देश भी भारत के GCC मॉडल को अपनाने लगे हैं।
  • साथ ही बढ़ती लागत एवं कुशल प्रतिभा की कमी भारत के पारंपरिक लागत लाभ को कम कर रही है।

कौशल अंतराल:

  • स्नातकों के कौशल एवं उद्योग की आवश्यकताओं के बीच असंगति, विशेषकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी एवं एडवांस्ड इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में, GCCs के विकास को सीमित करती है।

कम-मूल्य वाले कार्यों का जोखिम:

  • जो GCCs केवल नियमित एवं कम-लागत वाले कार्यों तक सीमित हैं, वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से अधिक प्रभावित हो सकते हैं।

आगे की राह

  • भारत का GCC इकोसिस्टम अब कम-लागत आधारित आउटसोर्सिंग मॉडल से विकसित होकर नवाचार एवं उन्नत प्रौद्योगिकी के वैश्विक केंद्र के रूप में उभर चुका है।
  • यद्यपि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से नियमित कार्य प्रभावित हो सकते हैं, फिर भी उभरती प्रौद्योगिकियों के डिजाइन, विकास, क्रियान्वयन एवं शासन में भारत की बढ़ती भूमिका इसे अधिक सुदृढ़ बनाती है।
  • हालांकि, वैश्विक नेतृत्व बनाए रखने के लिए कौशल विकास, नवाचार तथा बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अनुकूलन में निरंतर निवेश आवश्यक होगा।

स्रोत: TH

 

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