ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 पर उच्चतम न्यायालय 

पाठ्यक्रम: जीएस- 2 / शासन एवं राजनीति

सन्दर्भ

  • हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 में स्व-पहचान बनाम राज्य सत्यापन तथा कल्याण लक्षित करना बनाम व्यक्तिगत गरिमा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को रेखांकित किया।

पृष्ठभूमि: भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों का विधिक विकास

नालसा निर्णय, 2014: नालसा बनाम भारत संघ 

  • ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ‘तृतीय लिंग’ के रूप में मान्यता दी गई।
  • बिना चिकित्सकीय हस्तक्षेप के स्व-पहचान के अधिकार को स्वीकार किया गया।
  • स्व-निर्णय को एक मूल संवैधानिक मूल्य के रूप में स्थापित किया गया।
  • इसे अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) से जोड़ा गया।

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों अधिनियम, 2019:

  • ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा दी गई।
  • स्व-निर्धारित पहचान के अधिकार को मान्यता दी गई।
  • रोजगार और शिक्षा में भेदभाव को प्रतिबंधित किया गया।
  • परिवार में निवास का अधिकार सुनिश्चित किया गया।
  • जिला मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणन की व्यवस्था लागू की गई।

संशोधन अधिनियम, 2026:

  • विधिक मान्यता से पहले चिकित्सकीय बोर्ड द्वारा प्रमाणन अनिवार्य किया गया।
  • स्व-पहचान की स्पष्ट मान्यता को हटाया गया।
  • अधिक कठोर परिभाषाएँ और दंडात्मक प्रावधान जोड़े गए।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उठाए गए प्रमुख मुद्दे

स्व-पहचान बनाम चिकित्सकीय नियंत्रण:

  • यह शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन करता है।
  • राज्य द्वारा ‘चिकित्सकीय नियंत्रण’ स्थापित करता है, जिससे पहचान की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।

दुरुपयोग की आशंका बनाम अधिकारों की सुरक्षा:

  • न्यायालय ने कल्याण योजनाओं के लाभ के लिए पहचान के दुरुपयोग की आशंका पर ध्यान दिया।
  • किन्तु वास्तविकता में दुरुपयोग की संभावना अत्यंत कम है, जबकि बहिष्करण की समस्या अधिक गंभीर है।

नालसा सिद्धांतों पर प्रभाव:

  • वर्ष 2026 का संशोधन स्व-पहचान के सिद्धांत को कमजोर करता है।
  • यह जैविक निर्धारणवाद को पुनः स्थापित करता है।
  • इसे अधिकार-आधारित दृष्टिकोण से हटकर नियामक ढाँचे की ओर ‘पिछड़ा हुआ कदम’ माना गया।

स्वास्थ्य सेवाएँ और परिवर्तन अधिकार:

  • यह आशंका व्यक्त की गई कि लिंग-पुष्टि उपचार प्रभावित होंगे।
  • भारत में पहले से ही ऐसी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सीमित और कलंकित है।

वर्गीकरण और कलंक(stigma):

  • जबरन शोषण के पीड़ितों को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ शामिल करना मनमाना और कलंकित करने वाला वर्गीकरण है।
  • यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन कर सकता है।

आगे की राह

संतुलित दृष्टिकोण:

  • लक्षित कल्याण सुनिश्चित करते हुए अधिकारों का उल्लंघन न हो।
  • सुरक्षा उपायों (जैसे शपथ-पत्र आधारित प्रणाली) के साथ स्व-पहचान को अपनाया जाए।

संस्थागत सुधार:

  • न्यायपालिका, चिकित्सकीय निकायों और प्रशासनिक अधिकारियों में संवेदनशीलता बढ़ाई जाए।

नालसा के अनुरूपता:

  • स्व-पहचान को मूल अधिकार के रूप में पुनः स्थापित किया जाए।
  • अत्यधिक विनियमन और अपराधीकरण से बचा जाए।

समावेशी नीति निर्माण:

  • ट्रांसजेंडर पहचान को जबरन शोषण/तस्करी के पीड़ितों से अलग रखा जाए, ताकि अनावश्यक कलंक से बचा जा सके।

स्रोत: TH

 

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