पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- 2016 में शुरू की गई स्टार्टअप इंडिया पहल ने भारत के उद्यमशील पारिस्थितिकी तंत्र को उल्लेखनीय रूप से रूपांतरित किया है। इसने नवाचार को प्रोत्साहित किया, वित्त तक पहुँच का विस्तार किया और एक सहायक नीतिगत वातावरण तैयार किया।
भारत का स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र
- भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र है (अमेरिका और चीन के बाद), जिसमें 120 से अधिक यूनिकॉर्न (मूल्य > $1 बिलियन) और 1,57,000 से अधिक सरकारी मान्यता प्राप्त स्टार्टअप शामिल हैं।
- यह पारिस्थितिकी तंत्र लगभग 12–15% वार्षिक दर से बढ़ रहा है, कुछ वर्षों में वृद्धि 30% तक रही।
- स्टार्टअप की संख्या 2016 में लगभग 10,000 से बढ़कर 2025 में लगभग 2.5 लाख हो गई।
- प्रमुख क्षेत्र: फिनटेक, ई-कॉमर्स, सप्लाई चेन और हेल्थ-टेक।
- क्षेत्रीय केंद्र: बेंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद और दिल्ली-एनसीआर।
- रोजगार सृजन का प्रमुख स्रोत: स्टार्टअप्स ने 21 लाख से अधिक रोजगार सृजित किए हैं, जिससे वे रोजगार सृजन के महत्वपूर्ण माध्यम बन गए हैं।
- वित्तपोषण परिदृश्य: वर्ष 2025 में भारतीय स्टार्टअप्स ने लगभग 10–11 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश आकर्षित किया, जिससे भारत विश्व के सर्वाधिक वित्तपोषित स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्रों में अपनी स्थिति बनाए रखने में सफल रहा।
स्टार्टअप के लिए पात्रता मानदंड
- कंपनी की आयु: स्थापना की तिथि से कंपनी के अस्तित्व और संचालन की अवधि 10 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।
- कंपनी का स्वरूप: कंपनी का पंजीकरण प्राइवेट लिमिटेड कंपनी, पंजीकृत साझेदारी फर्म अथवा लिमिटेड लाइबिलिटी पार्टनरशिप के रूप में होना चाहिए।
- वार्षिक कारोबार: स्थापना के पश्चात किसी भी वित्तीय वर्ष में कंपनी का वार्षिक कारोबार 100 करोड़ रुपये से अधिक नहीं होना चाहिए।
- डीप-टेक कंपनियाँ: डीप-टेक कंपनियाँ 20 वर्षों तक स्टार्टअप की श्रेणी में बनी रह सकती हैं तथा उनका वार्षिक कारोबार 300 करोड़ रुपये तक हो सकता है।
- मौलिक इकाई: संस्था का गठन किसी पूर्व विद्यमान व्यवसाय के विभाजन अथवा पुनर्गठन के परिणामस्वरूप नहीं होना चाहिए।
भारत के स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र में प्रमुख प्रवृत्तियाँ
- भौगोलिक विविधीकरण: वर्ष 2016 में नवस्थापित स्टार्टअप्स में लगभग 65 प्रतिशत हिस्सेदारी टियर-1 शहरों की थी, जबकि टियर-3 नगरों का योगदान मात्र 15 प्रतिशत था।
- वर्ष 2025 तक यह प्रवृत्ति उलट गई। टियर-3 नगरों का योगदान बढ़कर लगभग 71 प्रतिशत हो गया, जबकि टियर-1 शहरों की हिस्सेदारी घटकर केवल 18 प्रतिशत रह गई।
- जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियाँ: अधिकांश स्टार्टअप संस्थापकों की आयु 40 वर्ष से कम है।
- लगभग 66 प्रतिशत पुरुष संस्थापक तथा 59 प्रतिशत महिला संस्थापक इसी आयु वर्ग से संबंधित हैं।
- 30 वर्ष से कम आयु वर्ग के संस्थापकों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 21 प्रतिशत है, जबकि 50 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में यह लगभग 33 प्रतिशत है।
भारत के स्टार्टअप विकास के प्रमुख कारक
- सरकारी समर्थन: वर्ष 2016 में प्रारंभ की गई स्टार्टअप इंडिया पहल ने नीतिगत सहायता, कर प्रोत्साहन, नियामकीय सरलीकरण तथा स्टार्टअप मान्यता जैसी सुविधाएँ प्रदान कीं।
- फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स (₹10,000 करोड़)
- स्टार्टअप इंडिया सीड फंड योजना
- स्टार्टअप्स हेतु क्रेडिट गारंटी योजना (CGSS)
- इन योजनाओं ने वित्तीय संसाधनों तक पहुँच को सुदृढ़ बनाया।
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI): आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर तथा ओएनडीसी जैसे मंचों ने लेन-देन लागत को कम किया तथा स्टार्टअप्स को तीव्र गति से विस्तार करने में सहायता प्रदान की।
- डीपीआई ने फिनटेक, ई-कॉमर्स, लॉजिस्टिक्स, हेल्थ-टेक तथा अन्य डिजिटल क्षेत्रों के विकास को गति दी।
- महानगरों से बाहर विस्तार: GENESIS (उद्यमिता और स्टार्टअप इकोसिस्टम का निर्माण) जैसी पहलों के माध्यम से स्टार्टअप गतिविधियाँ टियर-II तथा टियर-III शहरों तक विस्तारित हुईं।
- छोटे शहरों के स्टार्टअप्स ने कृषि-प्रौद्योगिकी, ग्रामीण वाणिज्य, पर्यटन तथा सेवा वितरण जैसी स्थानीय समस्याओं के समाधान पर ध्यान केंद्रित किया।
- वेंचर एवं जोखिम पूंजी का विस्तार: भारत में घरेलू तथा विदेशी वेंचर कैपिटल निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई, जिससे स्टार्टअप्स के लिए वित्तीय अवसरों का विस्तार हुआ।
- युवाओं में उद्यमशीलता की बढ़ती आकांक्षा: अधिकांश संस्थापकों की आयु 40 वर्ष से कम होने से यह स्पष्ट होता है कि युवाओं में उद्यमिता को करियर के रूप में अपनाने की प्रवृत्ति बढ़ी है तथा रोजगार खोजने की अपेक्षा रोजगार सृजन की सोच विकसित हुई है।
भारत के स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र की चुनौतियाँ
- वित्तीय बाधाएँ: प्रारंभिक चरण के स्टार्टअप्स को प्रायः पर्याप्त पूंजी उपलब्ध नहीं हो पाती, जिससे भर्ती, विपणन तथा संचालन संबंधी गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं।
- बाजार की मांग का गलत आकलन: स्टार्टअप विफलता का एक प्रमुख कारण वास्तविक बाजार आवश्यकता की पहचान न कर पाना है। लगभग 42 प्रतिशत स्टार्टअप्स मांग का सही आकलन न कर पाने के कारण असफल हो जाते हैं।
- प्रतिभा को बनाए रखने की चुनौती: स्थापित कंपनियों से प्रतिस्पर्धा के कारण स्टार्टअप्स को कुशल मानव संसाधन आकर्षित करने और उन्हें बनाए रखने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
- कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक एकाग्रता: अधिकांश निवेश फिनटेक, ई-कॉमर्स तथा एडटेक क्षेत्रों में केंद्रित है, जबकि विनिर्माण, कृषि-प्रौद्योगिकी तथा डीप-टेक जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को अपेक्षाकृत कम निवेश प्राप्त होता है।
भारत के स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ बनाने वाली योजनाएँ

आगे की राह
- ‘मूल्यांकन-आधारित’ से ‘मूल्य-सृजन आधारित’ विकास की ओर: केवल यूनिकॉर्न बनने की प्रतिस्पर्धा से आगे बढ़ते हुए, सतत एवं लाभप्रद व्यावसायिक मॉडल विकसित करने पर बल दिया जाना चाहिए।
- डीप-टेक को प्राथमिकता: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी तथा जैव-प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों को आर्थिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से रणनीतिक महत्व प्रदान किया जाना चाहिए।
- विकेंद्रीकृत नवाचार क्लस्टर: महानगर-केंद्रित विकास के स्थान पर क्लस्टर-आधारित नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किए जाने चाहिए, जैसे—
- ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि-प्रौद्योगिकी क्लस्टर,
- औद्योगिक गलियारों में विनिर्माण क्लस्टर,
- अनुसंधान संस्थानों के निकट डीप-टेक हब।
निष्कर्ष
- 2016 से 2025 का दशक भारत में एक जीवंत और भौगोलिक रूप से विविध स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के उद्भव का साक्षी रहा है।
- अनुकूल नीतियों, निवेशकों के बढ़ते विश्वास और व्यापक उद्यमशील भागीदारी से समर्थित, भारत ने स्वयं को विश्व के अग्रणी स्टार्टअप राष्ट्रों में स्थापित किया है और एक वैश्विक नवाचार हब के रूप में अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया है।
स्रोत: TH