जबरन श्रम और अतिरिक्त उत्पादन क्षमता को लेकर व्यापार संबंधी चिंताएँ

पाठ्यक्रम: जीएस-2/ अंतर्राष्ट्रीय संबंध, जीएस-3/ अर्थव्यवस्था

सन्दर्भ

  • भारत ने जी-20 व्यापार मंत्रियों की बैठक में अमेरिकी चिंताओं के संबंध में अपनी व्यापार नीतियों का बचाव किया। ये चिंताएँ जबरन श्रम से जुड़े आयात और संरचनात्मक अतिरिक्त उत्पादन क्षमता से संबंधित हैं।

जबरन श्रम से संबंधित आयात का परिचय 

  • जबरन श्रम से संबंधित आयात से आशय ऐसे माल के आयात से है, जिसका निर्माण उसके उत्पादन के किसी चरण में पूर्णतः या आंशिक रूप से जबरन श्रम का उपयोग करके किया गया हो।
  • संरचनात्मक अतिरिक्त उत्पादन क्षमता ऐसी स्थिति को संदर्भित करती है, जिसमें किसी क्षेत्र में उत्पादन क्षमता लगातार घरेलू और वैश्विक मांग से अधिक बनी रहती है, जिसके परिणामस्वरूप अत्यधिक उत्पादन, कीमतों में गिरावट और व्यापार में विकृतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

जबरन श्रम से संबंधित व्यापार उपायों पर भारत का पक्ष

  • विश्व व्यापार संगठन आधारित दृष्टिकोण: भारत ने इस बात पर जोर दिया है कि अनुचित व्यापार प्रथाओं से संबंधित चिंताओं का समाधान मौजूदा विश्व व्यापार संगठन के अनुरूप साधनों के माध्यम से किया जाना चाहिए, जिनमें शामिल हैं:
  • प्रतिपाटन शुल्क: ये अतिरिक्त आयात शुल्क हैं, जो तब लगाए जाते हैं जब कोई विदेशी कंपनी किसी उत्पाद को उसके सामान्य मूल्य से कम कीमत पर निर्यात करती है, जिससे घरेलू उद्योग को नुकसान होता है या नुकसान होने का खतरा होता है।
  • प्रतिपूरक शुल्क: ये अतिरिक्त आयात शुल्क हैं, जो विदेशी उत्पादकों को उनकी सरकारों द्वारा प्रदान की गई सब्सिडी के कारण मिलने वाले लाभ की भरपाई के लिए लगाए जाते हैं।
  • साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण: भारत ने तर्क दिया है कि व्यापार प्रतिबंध किसी पूरे देश या क्षेत्र के बारे में धारणाओं के बजाय विशेष वस्तुओं, कंपनियों या आपूर्ति श्रृंखलाओं से संबंधित विशिष्ट और सत्यापन योग्य साक्ष्यों पर आधारित होने चाहिए।

भारत में कानूनी ढाँचा

  • बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976: यह ऐसी श्रम व्यवस्थाओं पर रोक लगाता है, जिनमें बच्चे सहित लोग ऋण चुकाने के लिए गुलामी जैसी परिस्थितियों में काम करते हैं। यह मुक्त किए गए श्रमिकों के पुनर्वास के लिए भी एक रूपरेखा प्रदान करता है।
  • संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 23 मानव तस्करी, बेगार (जबरन श्रम) और इसी प्रकार के अन्य जबरन श्रम के रूपों पर रोक लगाता है।
  • भारत ने आईएलओ अभिसमय संख्या 29 (जबरन श्रम अभिसमय, 1930) और आईएलओ अभिसमय संख्या 105 (जबरन श्रम उन्मूलन अभिसमय, 1957) का अनुमोदन किया है।
  • आयात पर प्रतिबंध: जुलाई 2026 में भारत ने अपनी विदेश व्यापार नीति में संशोधन करके जबरन श्रम का उपयोग करके उत्पादित वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया।
  • बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 (2016 में संशोधित) के तहत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सभी व्यवसायों और प्रक्रियाओं में रोजगार देने पर पूर्ण प्रतिबंध है, जबकि 14 से 18 वर्ष की आयु के किशोरों के काम को विनियमित किया जाता है।

क्या चुनौतियाँ हैं?

  • वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में जबरन श्रम की पहचान करना कठिन है, क्योंकि आयातित उत्पादों में अलग-अलग देशों में फैले उत्पादकों, उप-ठेकेदारों, मध्यस्थों और आपूर्तिकर्ताओं की कई परतें शामिल हो सकती हैं।
  • लघु और मध्यम उद्यमों को अधिक अनुपालन लागत का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि आपूर्ति शृंखला की जाँच, प्रमाणन, दस्तावेजीकरण और समुचित जाँच की व्यवस्थाएँ महंगी और तकनीकी रूप से जटिल हो सकती हैं।
  • अलग-अलग देश जबरन श्रम की अलग-अलग परिभाषाएँ और प्रवर्तन मानक अपनाते हैं, जिससे नियामकीय विखंडन उत्पन्न होता है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में संलग्न भारतीय व्यवसायों पर अनुपालन का बोझ बढ़ता है।
  • जबरन श्रम से संबंधित आयात प्रतिबंध संरक्षणवाद को लेकर चिंताएँ पैदा कर सकते हैं, यदि विशेष वस्तुओं या उत्पादकों को जबरन श्रम से जोड़ने वाले विशिष्ट साक्ष्यों के बिना व्यापार उपाय लागू किए जाते हैं।

आगे की राह

  • भारत और अमेरिका को जबरन श्रम और व्यापार में विकृतियों के संबंध में द्विपक्षीय संवाद तथा साक्ष्य-साझाकरण तंत्र को मजबूत करना चाहिए।
  • व्यापार से संबंधित जाँच में पारदर्शिता, उचित प्रक्रिया और क्षेत्र-विशिष्ट साक्ष्यों को बनाए रखा जाना चाहिए।
  • भारत को जबरन श्रम के विरुद्ध घरेलू स्तर पर प्रवर्तन को मजबूत करना चाहिए और अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं की निगरानी एवं पता लगाने की क्षमता में सुधार करना चाहिए।
  • डंपिंग और सब्सिडी से संबंधित व्यापारिक विकृतियों से निपटने के लिए विश्व व्यापार संगठन के अनुरूप व्यापार-उपचार तंत्र को प्राथमिक माध्यम बनाए रखना चाहिए।

स्रोत: TH

 

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