पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन
चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय ने “एक राष्ट्र, एक चुनाव” पर संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक, 2024 की जाँच कर रही संसदीय संयुक्त समिति द्वारा प्रस्तावित 6 अक्टूबर की बैठक को अस्वीकार कर दिया। इस बैठक में भारत के मुख्य न्यायाधीश, अन्य न्यायाधीशों और संयुक्त समिति के बीच संवाद प्रस्तावित था।
एक राष्ट्र, एक चुनाव(एक साथ चुनाव)
- एक साथ चुनाव का प्रस्ताव लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव चक्रों को एक साथ करने से संबंधित है।
- इसके तहत मतदाता अपने निर्वाचन क्षेत्रों में एक ही दिन दोनों स्तरों की सरकारों के लिए मतदान कर सकेंगे, हालांकि पूरे देश में मतदान अलग-अलग चरणों में हो सकता है।
- इन चुनावी समय-सारिणियों को समन्वित करके इस व्यवस्था का उद्देश्य लॉजिस्टिक चुनौतियों का समाधान करना, लागत कम करना और बार-बार होने वाले चुनावों से उत्पन्न व्यवधानों को न्यूनतम करना है।
वैश्विक परिदृश्य
- दक्षिण अफ्रीका, स्वीडन और जर्मनी जैसे संसदीय लोकतंत्रों में उनकी विधायिकाओं का कार्यकाल निश्चित होता है।
- दक्षिण अफ्रीका में राष्ट्रीय सभा और प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव हर पाँच वर्ष में एक साथ होते हैं। देश के राष्ट्रपति का चुनाव राष्ट्रीय सभा द्वारा किया जाता है।
- स्वीडन के प्रधानमंत्री और जर्मनी के चांसलर का चुनाव उनकी संबंधित विधानसभाओं द्वारा हर चार वर्ष में किया जाता है।
- जर्मन चांसलर के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव केवल उत्तराधिकारी का चुनाव करके ही लाया जा सकता है।
भारत में स्थिति
- भारत में वर्ष 1952, 1957, 1962 और 1967 के पहले चार आम चुनाव चक्रों में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हुए थे।
- लोकसभा और कई राज्य विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने के कारण यह समन्वय समाप्त हो गया, जिसके परिणामस्वरूप अलग-अलग समय पर चुनाव होने लगे।
- वर्ष 2019 तक केवल चार राज्यों में लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव हुए।
- एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था को पुनः लागू करने का विचार पहले 1982 में भारत निर्वाचन आयोग और 1999 में विधि आयोग द्वारा प्रस्तावित किया गया था।
- संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश विधि (संशोधन) विधेयक, 2024 का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने को सक्षम बनाना है।
- इन विधेयकों को दिसंबर 2024 में एक संयुक्त समिति को भेजा गया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 39 सदस्यीय समिति का गठन किया।
एक साथ चुनाव के समर्थन में तर्क
1. लागत में कमी
- एक साथ चुनाव कराने से चुनाव संबंधी खर्च में काफी कमी आ सकती है।
- केंद्र सरकार लोकसभा चुनावों पर अनुमानतः ₹4,000 करोड़ खर्च करती है, जबकि प्रत्येक राज्य विधानसभा चुनाव में राज्य के आकार के अनुसार अतिरिक्त खर्च होता है।
- इसके अलावा, राजनीतिक दल और उम्मीदवार सरकारी खर्च की तुलना में कई गुना अधिक खर्च करते हैं।
- इसलिए, एक साथ चुनाव कराने से सरकार, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों पर पड़ने वाले कुल वित्तीय बोझ को कम करने में मदद मिल सकती है।
2. नीतिगत निरंतरता और स्थिरता
- बार-बार होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव (लगभग 5–6 चुनाव प्रतिवर्ष) राजनीतिक दलों और मंत्रियों को “स्थायी चुनावी अभियान” की मानसिकता में रख सकते हैं, जिससे प्रभावी नीति-निर्माण और शासन प्रभावित हो सकता है।
- चुनावों के दौरान लगभग 45–60 दिनों तक आदर्श आचार संहिता (MCC) लागू रहती है और यह केंद्र तथा संबंधित राज्य सरकारों द्वारा नई पहलों और परियोजनाओं की शुरुआत को प्रतिबंधित करती है।
- इसलिए, एक साथ चुनाव नीतिगत निरंतरता और सरकारी स्थिरता प्रदान कर सकते हैं।
3. प्रशासनिक दक्षता
- बार-बार होने वाले चुनाव प्रशासनिक स्तर पर भी सरकार की कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं, क्योंकि जिला स्तर का प्रशासनिक तंत्र बड़े पैमाने पर चुनाव संबंधी कार्यों में लगा रहता है।
- स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने के लिए अर्धसैनिक बलों के जवानों को भी नियमित रूप से उनके सामान्य तैनाती स्थलों से चुनाव वाले राज्यों में भेजा जाता है।
- बार-बार होने वाले चुनाव प्रशासनिक संसाधनों पर लगातार बोझ डालते हैं और प्रशासनिक दक्षता को कम कर सकते हैं।
4. सामाजिक एकजुटता
- बार-बार होने वाले उच्च-दांव वाले चुनाव राजनीतिक दलों को चुनावी समर्थन प्राप्त करने के लिए अधिक ध्रुवीकरण वाले अभियानों को प्रोत्साहित कर सकते हैं।
- सोशल मीडिया के विकास ने इस तरह के राजनीतिक प्रचार को और बढ़ावा दिया है, जिससे भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुभाषी देश में सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है।
- यह सुझाव दिया जाता है कि एक साथ चुनाव चुनाव-प्रेरित ध्रुवीकरण की घटनाओं को कम करेंगे और बेहतर सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा देंगे।
इसमें शामिल चुनौतियाँ
1. संघवाद से संबंधित मुद्दे
- भारत एक संघीय देश है और प्रत्येक राज्य की अपनी क्षेत्रीय चुनौतियाँ और उद्देश्य हैं।
- एक साथ चुनाव कराने से राज्य-विशिष्ट मुद्दों पर राष्ट्रीय मुद्दे हावी हो सकते हैं।
- इससे राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय दलों की तुलना में लाभ मिल सकता है। इससे संविधान की संघीय भावना प्रभावित हो सकती है।
2. लोकतांत्रिक जवाबदेही पर प्रभाव
- चुनाव एक महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया तंत्र हैं, जिसके माध्यम से जनता सरकारों के कार्यों का मूल्यांकन करती है।
- बार-बार होने वाले चुनावों ने कई बार सरकारों को चुनावी प्रतिक्रिया के आधार पर अपनी नीतियों में बदलाव या नई नीतियाँ जोड़ने के लिए मजबूर किया है।
- यदि चुनाव केवल हर पाँच वर्ष में एक बार हों, तो मतदाताओं के पास समय-समय पर चुनावी प्रतिक्रिया देने के अवसर सीमित हो सकते हैं।
3. संवैधानिक संशोधन
- एक साथ चुनाव कराने के लिए संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता होगी, क्योंकि भारत में संसदीय व्यवस्था है, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं को उनका सामान्य पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा होने से पहले भी भंग किया जा सकता है, यदि सरकार बहुमत खो देती है, कोई वैकल्पिक सरकार नहीं बन पाती या समय से पहले चुनाव की आवश्यकता उत्पन्न होती है।
- अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू होने से राज्य विधानसभाएँ भी प्रभावित हो सकती हैं।
- इसलिए, पाँच वर्ष के निश्चित और समन्वित कार्यकाल की स्थापना के लिए संसद से संबंधित अनुच्छेद 83 और 85, राज्य विधानसभाओं से संबंधित अनुच्छेद 172 और 174, तथा अनुच्छेद 356 में बदलाव की आवश्यकता होगी।
विधि आयोग और समिति की सिफारिशें
- विधि आयोग (1999 और 2018 का मसौदा) तथा संसदीय स्थायी समिति (2015) ने एक साथ चुनाव लागू करने के तरीकों का अध्ययन किया।
- उनकी सिफारिशों में लोकसभा और लगभग आधी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक चक्र में तथा शेष विधानसभाओं के चुनाव ढाई वर्ष बाद कराने का सुझाव शामिल था। इसके लिए मौजूदा कार्यकालों में समायोजन तथा संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन की आवश्यकता होगी।
- उन्होंने यह भी प्रस्तावित किया कि अविश्वास प्रस्ताव के साथ विश्वास प्रस्ताव भी लाया जाना चाहिए, ताकि वैकल्पिक सरकार बनाने की सुविधा हो सके। वहीं, समय से पहले भंग होने के बाद गठित किसी भी सदन को मूल सदन के शेष कार्यकाल के लिए ही कार्य करना चाहिए।
- उपचुनावों को भी एक साथ करके वर्ष में एक बार आयोजित किया जा सकता है।
एक राष्ट्र, एक चुनाव पर सर्वोच्च न्यायालय
- सर्वोच्च न्यायालय ने भारत के मुख्य न्यायाधीश, अन्य न्यायाधीशों और एक राष्ट्र, एक चुनाव विधेयकों की जाँच कर रही संयुक्त संसदीय समिति के बीच प्रस्तावित बैठक को अस्वीकार कर दिया।
- न्यायालय ने कहा कि चूँकि प्रस्तावित संवैधानिक संशोधनों को बाद में न्यायिक समीक्षा का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए वर्तमान में कार्यरत न्यायाधीशों के साथ इस मुद्दे पर चर्चा करना “उचित या वांछनीय” नहीं होगा।
- संयुक्त संसदीय समिति संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश विधि (संशोधन) विधेयक, 2024 की जाँच कर रही है। इन विधेयकों का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के एक साथ चुनाव कराने में सक्षम बनाना है।
- समिति के अध्यक्ष ने कहा कि प्रस्तावित दौरे का उद्देश्य केवल सदस्यों को न्यायालय से परिचित कराना था। हालांकि, यह घटनाक्रम शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करता है।
निष्कर्ष
- “एक राष्ट्र, एक चुनाव” की अवधारणा एक संरचनात्मक सुधार है, जिसका उद्देश्य भारत के प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग करना, चुनावों पर होने वाले खर्च को कम करना और लगातार चलने वाले चुनावी अभियानों के कारण सरकार के कामकाज में आने वाले व्यवधानों को समाप्त करना है।
- लेकिन इसकी सफलता गंभीर संवैधानिक मुद्दों के समाधान, संघवाद की रक्षा और सरकार के समय से पहले इस्तीफा देने या कार्यकाल समाप्त होने की स्थिति से निपटने के लिए प्रभावी तंत्र बनाने पर निर्भर करेगी।
स्रोत :IE
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