पर्यावरणीय मंजूरी का पश्चात् अनुमोदन

पाठ्यक्रम: जीएस-3/पर्यावरण

सन्दर्भ

  • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वनशक्ति बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद लंबित पश्चात् पर्यावरणीय मंजूरी के मामलों की प्रक्रिया फिर से शुरू करने के लिए पर्यावरणीय मूल्यांकन प्राधिकरणों को निर्देश दिया है।

कार्योत्तर (Post facto) पर्यावरणीय मंजूरी क्या है?

  • यदि कोई परियोजना पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 के दायरे में आती है, तो परियोजना की स्थापना, विस्तार या आधुनिकीकरण से पहले सामान्यतः पर्यावरणीय मंजूरी लेना आवश्यक होता है।
  • पश्चात् मंजूरी उस व्यवस्था को संदर्भित करती है जिसके माध्यम से वे परियोजनाएँ, जिन्होंने पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त किए बिना पहले ही संचालन शुरू कर दिया हो या विस्तार कर लिया हो, बाद में पर्यावरणीय अनुमोदन प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकती हैं।
  • यह व्यवस्था 2017 में एक बार की क्षमादान अवधि के रूप में शुरू की गई थी और बाद में 2021 के कार्यालय ज्ञापन (OM) के माध्यम से इसे लागू किया गया।

मौजूदा कानूनी ढाँचा

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986

  • यह केंद्र सरकार को पर्यावरण के संरक्षण और सुधार के लिए कदम उठाने का अधिकार प्रदान करता है।

EIA अधिसूचना, 2006

  • यह कुछ विशेष प्रकार की परियोजनाओं और गतिविधियों के लिए पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी का प्रावधान करती है।
  • इस ढाँचे में स्क्रीनिंग, स्कोपिंग, जनभागीदारी और मूल्यांकन जैसी प्रक्रियाएँ शामिल हैं तथा निर्दिष्ट गतिविधियों को शुरू करने से पहले पर्यावरणीय आकलन किया जाना आवश्यक है।

वर्ष 2017 की अधिसूचना

  • केंद्र सरकार ने 2017 में एक बार की, समयबद्ध प्रक्रिया तैयार की, जिसके माध्यम से उन परियोजनाओं का आकलन किया जा सके जो आवश्यक पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी के बिना शुरू हो गई थीं या जिनका विस्तार हो चुका था।

कार्यालय ज्ञापन, 2021

  • इसने अनुपालन न करने वाले मामलों और पश्चात् पर्यावरणीय मंजूरी के आवेदनों से निपटने के लिए एक ढाँचा प्रदान किया।

वनशक्ति बनाम भारत संघ में निर्णय

  • जुलाई 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चात् मंजूरी की व्यवस्था को नियंत्रित करने वाले 2021 के कार्यालय ज्ञापन को रद्द कर दिया।
  • हालांकि, न्यायालय ने कहा कि जिन परियोजनाओं को पहले ही पश्चात् मंजूरी मिल चुकी है, वे वैध बनी रहेंगी।
  • इस व्यवस्था के तहत लंबित आवेदनों को कानून के अनुसार संसाधित किया जाना था।
  • न्यायालय ने कहा कि पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी अनिवार्य है, जब तक कि कानूनी ढाँचे में स्वयं संशोधन न किया जाए।
  • न्यायालय ने वर्ष 2017 की अधिसूचना को भी बरकरार रखा, क्योंकि इसे सीमित दायरे वाला और समयबद्ध विधायी उपाय माना गया।

कार्योत्तर (Post-Facto) मंजूरी के लाभ

1. मौजूदा उल्लंघनों का समाधान

  • एक नियामक व्यवस्था उन परियोजनाओं को, जो पूर्व मंजूरी के बिना शुरू हो चुकी हैं, औपचारिक पर्यावरणीय अनुपालन प्रक्रिया में ला सकती है।

2. नियामक अनिश्चितता से बचाव

  • लंबे समय तक बिना स्पष्ट पर्यावरणीय स्थिति के संचालित होने वाली परियोजनाएँ श्रमिकों, निवेशकों, नियामकों और प्रभावित समुदायों के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती हैं।
  • ऐसी प्रक्रिया की विधायी रूप से स्पष्ट परिभाषा इन पहलों की भविष्य की नियामक स्थिति के संबंध में स्पष्टता ला सकती है।

3. केवल दंडात्मक के बजाय सुधारात्मक विनियमन

  • यह दृष्टिकोण उन परिस्थितियों में प्रासंगिक है जहाँ पर्यावरणीय प्रभावों को अभी भी कम या सुधारा जा सकता है।

चिंताएँ क्या हैं?

1. एहतियाती सिद्धांत को कमजोर करना

  • जब तक परियोजना का संचालन शुरू होता है, तब तक पर्यावरणीय क्षति पहले ही हो चुकी हो सकती है, जिससे बाद में किया गया आकलन पूर्व मूल्यांकन के उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाता।

2. अनुपालन न करने को प्रोत्साहन

  • यदि किसी परियोजना को संचालन शुरू होने के बाद भी मंजूरी मिल सकती है, तो परियोजना समर्थकों के लिए नियमों का प्रारंभिक अनुपालन कम महत्वपूर्ण हो सकता है।
  • इससे नैतिक जोखिम उत्पन्न हो सकता है, जहाँ नियमों का उल्लंघन एक सोचा-समझा नियामक जोखिम बन जाता है।

3. जनभागीदारी को कमजोर करना

  • EIA व्यवस्था के तहत जन परामर्श का उद्देश्य प्रभावित लोगों को महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाने से पहले अपनी चिंताएँ व्यक्त करने का अवसर देना है।
  • यदि यह प्रक्रिया महत्वपूर्ण निर्माण या संचालन शुरू होने के बाद की जाती है, तो व्यवहार में जनभागीदारी का प्रभाव कम हो सकता है।

आगे की राह

  • पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी को सामान्य नियम के रूप में बनाए रखा जाना चाहिए, जबकि पश्चात् मंजूरी की व्यवस्थाओं को नियमित प्रक्रिया के बजाय अपवादात्मक व्यवस्था के रूप में माना जाना चाहिए।
  • किसी भी विशेष व्यवस्था का स्पष्ट वैधानिक आधार होना चाहिए और उसकी अवधि सीमित समय-सीमा तक ही होनी चाहिए।
  • जिन परियोजनाओं से गंभीर या अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक क्षति होने की संभावना है, उनके साथ मामूली प्रक्रियात्मक उल्लंघनों के समान व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए।

स्रोत: IE

 

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