पाठ्यक्रम: जीएस-2/राजव्यवस्था एवं शासन
सन्दर्भ
- छत्तीसगढ़ में वनाधिकार अधिनियम, 2006 तथा पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 जैसे कानूनों के क्रियान्वयन में तेजी लाने हेतु एक कार्यबल के गठन से विवाद उत्पन्न हो गया है।
परिचय
- इस कार्यबल का गठन वनाधिकार अधिनियम के अंतर्गत सामुदायिक वन संसाधन अधिकार दावों के संभावित क्षेत्रों का मानचित्रण करने, लंबित दावों की समीक्षा करने, पेसा से संबंधित मामलों के लिए रणनीतियाँ तैयार करने तथा वनाधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन में जिला प्रशासन की सहायता करने के लिए किया गया था।
- आलोचकों का तर्क है कि ये कार्यबल पेसा और वनाधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन की मूल लोकतांत्रिक संरचना को कमजोर करते हैं, क्योंकि इनके गठन से निर्णय लेने की शक्ति ग्राम स्तरीय संस्थाओं से हटकर प्रशासनिक और तकनीकी तंत्रों के पास चली जाती है।
- आदिवासी तथा वनाधिकार संगठनों ने छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में वनाधिकार अधिनियम एवं पेसा से संबंधित कार्यबलों को भंग करने की मांग की है।
वन अधिकार अधिनियम
- अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (वनाधिकार अधिनियम या एफआरए) को वनों में निवास करने वाले समुदायों, विशेषकर अनुसूचित जनजातियों, के उन अधिकारों को मान्यता देने के लिए लागू किया गया था जिन वन संसाधनों का वे परंपरागत रूप से उपयोग करते रहे हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
अधिकारों की मान्यता
- इसमें व्यक्तिगत तथा सामुदायिक अधिकार शामिल हैं, जैसे—स्व-खेती,आवास,चराई,मत्स्य पालन तथा वन क्षेत्रों में स्थित जल निकायों तक पहुँच।
- इसमें विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) के आवासीय अधिकार, घुमंतू एवं पशुपालक समुदायों के पारंपरिक मौसमी संसाधनों तक पहुँच, जैव-विविधता तक पहुँच, बौद्धिक संपदा पर सामुदायिक अधिकार तथा पारंपरिक ज्ञान से संबंधित अधिकार भी शामिल हैं।
वन भूमि का आवंटन
- यह अधिनियम समुदाय की आधारभूत अवसंरचनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विकासात्मक उद्देश्यों के लिए वन भूमि के आवंटन का अधिकार भी प्रदान करता है।
- भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर तथा पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के साथ मिलकर यह अधिनियम पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन के बिना आदिवासी आबादी को बेदखल किए जाने से सुरक्षा प्रदान करता है।
ग्राम सभा की भूमिका
- यह अधिनियम ग्राम सभा तथा अधिकार धारकों पर वनों के संरक्षण एवं सुरक्षा की जिम्मेदारी भी निर्धारित करता है।
- अधिनियम के अंतर्गत ग्राम सभा को अत्यंत सशक्त संस्था का दर्जा दिया गया है, जिससे आदिवासी समुदाय को उन स्थानीय नीतियों और योजनाओं के निर्धारण में निर्णायक भूमिका मिलती है जो उन्हें प्रभावित करती हैं।
पेसा अधिनियम, 1996 क्या है?
- पेसा अधिनियम, 1996 का पूर्ण नाम पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 है।
- यह संसद द्वारा बनाया गया ऐसा कानून है जिसके माध्यम से संविधान के भाग-9 में पंचायतों से संबंधित प्रावधानों का विस्तार पाँचवीं अनुसूची के क्षेत्रों तक कुछ संशोधनों के साथ किया गया।
- संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत जिन क्षेत्रों में मुख्यतः जनजातीय आबादी निवास करती है, उन्हें “अनुसूचित क्षेत्र” के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। यह क्षेत्रीय व्यवस्था अनुसूचित जनजातियों के परंपरागत अधिकारों को मान्यता प्रदान करती है।
पेसा अधिनियम ने वन संरक्षण को कैसे बढ़ावा दिया है?
प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण
- यह अधिनियम जनजातीय समुदायों को भूमि, जल और वन जैसे प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन एवं उपयोग पर नियंत्रण प्रदान करता है।
विकेन्द्रीकृत निर्णय-निर्माण
- यह अधिनियम निर्णय लेने की प्रक्रिया को ग्राम सभा और पंचायतों तक विकेन्द्रीकृत करता है, जिससे स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप शासन संभव हो पाता है।
भूमि अधिकार और भूमि के हस्तांतरण की रोकथाम
- अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि के किसी भी हस्तांतरण के लिए ग्राम सभा की स्वीकृति अनिवार्य करके पेसा अधिनियम जनजातीय भूमि के बाहरी हस्तांतरण के विरुद्ध कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।
आगे की राह
ग्राम सभा-केंद्रित शासन को सुदृढ़ बनाना
- यह सुनिश्चित किया जाए कि वनाधिकार अधिनियम, 2006 तथा पेसा अधिनियम, 1996 का क्रियान्वयन ग्राम सभाओं के अधिकारों पर आधारित रहे, जैसा कि इन कानूनों में परिकल्पित है।
- कार्यबलों की भूमिका निर्णय लेने वाली संस्था के बजाय सहयोगात्मक और सुविधा प्रदान करने वाली होनी चाहिए।
सहभागी निर्णय-निर्माण को संस्थागत रूप देना
- परामर्श एवं निगरानी तंत्रों में जनजातीय समुदायों, परंपरागत वन निवासियों, महिला समूहों तथा नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए।
पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बढ़ाना
- संसाधित दावों, मान्यता प्राप्त अधिकारों तथा क्रियान्वयन की स्थिति पर नियमित प्रतिवेदन प्रकाशित किए जाएँ।
- जनजातीय समुदायों के लिए सुलभ स्वतंत्र शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किए जाएँ।
सहकारी संघवाद एवं संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाना
- राज्यों को ऐसे नियम और क्रियान्वयन रणनीतियाँ तैयार करनी चाहिए जो पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत प्राप्त संवैधानिक संरक्षण तथा जनजातीय स्वशासन की भावना के अनुरूप हों।
निष्कर्ष
- वनाधिकार अधिनियम और पेसा के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रशासनिक दक्षता तथा जनजातीय स्वशासन के संवैधानिक सिद्धांतों के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
- ग्राम सभाओं को सशक्त बनाकर, सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित करके तथा कार्यबलों को स्थानीय संस्थाओं के प्रति उत्तरदायी बनाकर अनुसूचित क्षेत्रों में विकास और लोकतांत्रिक सशक्तिकरण—दोनों उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है।
स्रोत: TH
Previous article
कल्याण से महिला-नेतृत्व वाले विकास की ओर
Next article
भारत के जमा परिदृश्य में परिवर्तन