हरित ऊर्जा गलियारा योजना — अंतरराज्यीय पारेषण प्रणाली के विकास हेतु

पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था, पर्यावरण 

चर्चा में क्यों ?

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हरित ऊर्जा गलियारा चरण-III (GEC-III) योजना को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य भारत की राज्य के भीतर की पारेषण प्रणाली (InSTS) को मजबूत करना और राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों में 135 गीगावाट तक नवीकरणीय ऊर्जा के निकासी को सुगम बनाना है।

हरित ऊर्जा गलियारा चरण-III (GEC-III) योजना

  • इस योजना को वित्त वर्ष 2032-33 तक स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसकी कुल परियोजना लागत ₹1,86,405 करोड़ है।
  • इसमें GEC-III के अंतर्गत राज्य के भीतर की पारेषण प्रणालियों (InSTS) के विकास के लिए ₹1,36,378 करोड़ तथा 50 GWh बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) के लिए ₹50,000 करोड़ शामिल हैं।
  • यह भारत की राज्य के भीतर की पारेषण प्रणाली (InSTS) को मजबूत करेगी, जिससे राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 135 गीगावाट (GW) तक नवीकरणीय ऊर्जा की निकासी संभव हो सकेगी।

प्रमुख विशेषताएँ 

  • यह 50 GWh बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) की स्थापना का प्रावधान करती है। इन्हें नवीकरणीय ऊर्जा (RE) विकासकर्ता/उत्पादक के स्तर पर या ग्रिड की लचीलेपन की आवश्यकता वाले किसी अन्य महत्वपूर्ण स्थान पर स्थापित किया जाएगा। इसका उद्देश्य नवीकरणीय ऊर्जा की अनिरंतरता, ग्रिड में भीड़, अधिकतम मांग के समय बिजली कटौती तथा सौर ऊर्जा उपलब्ध न होने वाले घंटों की मांग से निपटना है।
  • यह भारत के राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के भीतर ग्रिड एकीकरण और विद्युत निकासी को सुगम बनाएगी।
  • इसमें ₹54,082 करोड़ की केंद्रीय वित्तीय सहायता शामिल है, जो राज्य के भीतर के पारेषण शुल्क के भार को कम करने में मदद करेगी और अंतिम उपभोक्ताओं के लिए बिजली की लागत को कम रखने में सहायक होगी।
  • InSTS घटक के अंतर्गत सभी ग्रीनफील्ड परियोजनाओं को टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (TBCB) के माध्यम से लागू किया जाएगा।
  • ब्राउनफील्ड उन्नयन और नेटवर्क सुदृढ़ीकरण कार्यों को लागत-प्लस आधार (CPB) पर निष्पादित किया जाएगा।
  • राज्य पारेषण उपयोगिताएँ समग्र कार्यान्वयन एजेंसी होंगी, जबकि पारेषण सेवा प्रदाता (TSPs) निर्माण-स्वामित्व-संचालन-रखरखाव (BOOM) मॉडल के तहत TBCB में भाग लेंगे।

प्रगति

  • नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) राज्य के भीतर पारेषण (InSTS) और अंतरराज्यीय पारेषण (ISTS) नेटवर्क के माध्यम से पारेषण लाइनों और रूपांतरण क्षमता को बढ़ाने के लिए हरित ऊर्जा गलियारा (GEC) को दो चरणों में लागू कर रहा है।
  • हालांकि, एक संसदीय समिति पहले योजना के कार्यान्वयन में देरी को चिन्हित कर चुकी है।
  • सरकारी आंकड़ों के अनुसार, GEC चरण-I, जिसे आठ राज्यों — आंध्र प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और तमिलनाडु — में लागू किया जा रहा है, के तहत 30 जून तक 9,130 सर्किट किलोमीटर (ckm) पारेषण लाइनों का निर्माण किया जा चुका था, जबकि लक्ष्य 9,461 ckm का था।
  • GEC चरण-II, जिसे सात राज्यों — गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश — में लागू किया जा रहा है, के तहत 7,863 ckm पारेषण लाइनों और 24,388 MVA उपकेंद्र क्षमता को जोड़ने का लक्ष्य है।

महत्व

  • ऊर्जा सुरक्षा: हरित ऊर्जा गलियारा 2035 तक 900 GW स्थापित गैर-जीवाश्म क्षमता प्राप्त करने के लक्ष्य में सहायता करेगा।
  • इससे कार्बन उत्सर्जन को कम करके दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा में योगदान देने और सतत विकास को बढ़ावा देने की भी उम्मीद है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण और ग्रिड लचीलापन: यह गलियारा राज्य की सीमाओं पर मौजूद बाधाओं से निपटने के लिए राज्य के भीतर पारेषण प्रणाली को मजबूत करता है और दूरस्थ सौर एवं पवन ऊर्जा स्रोतों से स्थानीय वितरण ग्रिड तक बिजली के सुचारु प्रवाह को सक्षम बनाता है।
  • प्रणाली स्थिरता और भंडारण: 50 GWh बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ (BESS) अधिकतम उत्पादन के समय अतिरिक्त ऊर्जा का भंडारण करेंगी और अधिक मांग के समय उसे उपलब्ध कराएंगी।
  • यह नवीकरणीय ऊर्जा की अनिरंतरता, पारेषण में भीड़ और अधिकतम मांग के समय बिजली कटौती से संबंधित चुनौतियों से निपटने में मदद करेगा तथा सौर ऊर्जा उपलब्ध न होने वाले घंटों में बिजली की मांग को पूरा करने में सहायता करेगा।
  • उपभोक्ताओं की बिजली दरों में कमी: राज्य पारेषण उपयोगिताओं की पूंजीगत लागत को कम करने के लिए ₹54,082 करोड़ की केंद्रीय वित्तीय सहायता (CFA) जारी की गई है, जिससे उपभोक्ताओं के लिए खुदरा बिजली लागत कम होगी।
  • निजी क्षेत्र की दक्षता: ग्रीनफील्ड परियोजनाओं के लिए टैरिफ-आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (TBCB) के अंतर्गत निर्माण-स्वामित्व-संचालन-रखरखाव (BOOM) मॉडल ऊर्जा अवसंरचना के निर्माण में निजी क्षेत्र से पारदर्शिता, लागत अनुकूलन और नवाचार लाता है।
  • सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ: उच्च-वोल्टेज पारेषण लाइनों, उपकेंद्रों और BESS परिसरों का निर्माण बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर प्रदान करेगा तथा भारत को शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन की दिशा में आगे बढ़ाने में गति प्रदान करेगा।

चुनौतियाँ

  • भूमि अधिग्रहण संबंधी मुद्दे: प्रशासनिक देरी और कृषि एवं वन भूमि पर विद्युत लाइनों के निर्माण के प्रति स्थानीय अनिच्छा के कारण लागत और समय में अत्यधिक वृद्धि का महत्वपूर्ण जोखिम।
  • वितरण कंपनियों (DISCOMs) की वित्तीय कमजोरी: राज्य विद्युत वितरण कंपनियाँ (DISCOMs) वित्तीय रूप से कमजोर हैं और केंद्रीय सब्सिडी के बावजूद पारेषण सेवा प्रदाताओं (TSPs) को भुगतान में देरी कर सकती हैं।
  • आपूर्ति श्रृंखला संबंधी बाधाएँ: नेटवर्क और बैटरी भंडारण की तैनाती के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों (लिथियम, कोबाल्ट) तथा विशेष विद्युत उपकरणों की आपूर्ति श्रृंखलाएँ अत्यधिक अस्थिर हैं और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला संबंधी जोखिमों के अधीन हैं।
  • तकनीकी और एकीकरण संबंधी मुद्दे: स्मार्ट-ग्रिड प्रौद्योगिकियों, उन्नत पूर्वानुमान एवं विद्युत प्रेषण प्रौद्योगिकी तथा कुशल कर्मचारियों के बिना बड़ी मात्रा में अनिरंतर नवीकरणीय ऊर्जा को मौजूदा अवसंरचना में एकीकृत नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष 

  • हरित ऊर्जा गलियारा चरण-III (GEC-III) भारत की ऊर्जा सुरक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह 135 GW नवीकरणीय ऊर्जा निकासी क्षमता को 50 GWh बैटरी भंडारण के साथ जोड़ता है, जिससे पारेषण संबंधी बाधाओं और नवीकरणीय ऊर्जा की अनिरंतरता को कम करने के साथ-साथ ग्रिड के लचीलेपन और विश्वसनीयता में वृद्धि होगी।
  • इसकी सफलता समयबद्ध कार्यान्वयन, भूमि के उचित प्रबंधन, राज्य विद्युत उपयोगिताओं में सुधार, स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला की क्षमता, प्रौद्योगिकी की तैयारी और केंद्र-राज्य समन्वय पर निर्भर करती है।
  • इन चुनौतियों का समाधान करके, GEC-III भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता, सतत विकास और दीर्घकालिक कार्बन उत्सर्जन में कमी के अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सक्षम बनाएगा।

स्रोत:TH

 

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