ब्रिक्स कार्बन बाज़ार साझेदारी 

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध/GS3/पर्यावरण 

समाचारों में

  • ब्रिक्स देशों ने कार्बन बाज़ारों पर अधिक सहयोग का समर्थन किया है। इसमें ब्रिक्स कार्बन बाज़ार साझेदारी का कार्यान्वयन भी शामिल है। साथ ही, उन्होंने एकतरफा कार्बन सीमा समायोजन तंत्रों (CBAMs) का विरोध किया है।

कार्बन बाज़ार क्या हैं?

  • कार्बन बाज़ार ऐसे तंत्र हैं, जिनके माध्यम से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी को प्रोत्साहित करने के लिए कार्बन क्रेडिट या उत्सर्जन भत्तों का व्यापार किया जाता है।
  • एक कार्बन क्रेडिट सामान्यतः कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य (CO₂e) के एक टन उत्सर्जन में कमी या उसके निष्कासन को दर्शाता है।
  • ये कार्बन पर मूल्य निर्धारित करने में सहायता करते हैं और कम लागत पर उत्सर्जन में कमी को प्रोत्साहित करते हैं।

ब्रिक्स कार्बन बाज़ार साझेदारी के बारे में

  • ब्रिक्स सदस्य देशों ने एक समझौता ज्ञापन (MoU) के माध्यम से कार्बन बाज़ार साझेदारी की पुनः पुष्टि की।
  • इसका उद्देश्य क्षमता निर्माण, अनुभवों का आदान-प्रदान और कार्बन बाज़ारों को जलवायु वित्त के अनुरूप बनाना है।
  • यह एकतरफा एवं संरक्षणवादी जलवायु-व्यापार नीतियों के विरुद्ध वैश्विक दक्षिण के देशों की एकजुट प्रतिक्रिया को दर्शाता है। इनमें विशेष रूप से यूरोपीय संघ का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) शामिल है, जो जनवरी 2026 में अपने अंतिम परिचालन चरण में प्रवेश कर चुका है।

ब्रिक्स के लिए एक साझा कार्बन बाज़ार नियमावली की आवश्यकता क्यों है?

  • मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV): कार्बन लेखांकन की विभिन्न पद्धतियों के कारण देशों के बीच उत्सर्जन में हुई कमी की तुलना करना कठिन हो जाता है।
    • साझा MRV मानक पारदर्शिता, विश्वसनीयता और तुलनीयता सुनिश्चित करेंगे।
  • सत्यापनकर्ताओं की पारस्परिक मान्यता: वर्तमान में विभिन्न देश अलग-अलग सत्यापन और प्रत्यायन प्रणालियों का पालन करते हैं।
    •  इससे ब्रिक्स देशों में प्रमाणन की अधिक एकरूप प्रक्रिया विकसित होगी।
  • पंजीकरण प्रणालियों का सामंजस्य: कार्बन पंजीकरण प्रणालियाँ कार्बन क्रेडिट के निर्गमन, स्वामित्व और निरस्तीकरण का अभिलेख रखती हैं।
    • समन्वित डेटा प्रारूप और परस्पर संगत प्रणालियाँ सुरक्षित सूचना आदान-प्रदान को संभव बनाएँगी।
    • इससे दोहरे निर्गमन और धोखाधड़ीपूर्ण दावों का जोखिम कम होगा।

ब्रिक्स कार्बन बाज़ारों के एकीकरण में चुनौतियाँ

  • घरेलू कार्बन बाज़ारों में अंतर: ब्रिक्स देश अलग-अलग कार्बन मूल्य निर्धारण प्रणालियों का पालन करते हैं।
    • ब्राज़ील सीमा-निर्धारण एवं व्यापार (कैप-एंड-ट्रेड) मॉडल का उपयोग करता है, जबकि भारत और चीन मुख्यतः उत्सर्जन-तीव्रता आधारित प्रणालियों का उपयोग करते हैं। इन अंतरों के कारण एकीकरण कठिन हो जाता है।
  • कार्बन कीमतों में असमानता: भारत में कार्बन की कीमत ब्रिटेन और यूरोपीय संघ की तुलना में काफी कम है।
    • इसलिए, भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS) को मान्यता मिलने के बावजूद भारतीय निर्यातकों को CBAM के अंतर्गत पर्याप्त अतिरिक्त शुल्क का सामना करना पड़ सकता है।
  • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) पर MRV का भारी भार: CBAM के अंतर्गत आपूर्ति शृंखला से होने वाले उत्सर्जन का सटीक मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) आवश्यक है।
    •  भारतीय MSMEs के पास अक्सर इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी, वित्तीय संसाधन और विशेषज्ञता का अभाव होता है। इससे उनकी निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होने का जोखिम बढ़ जाता है।
  • कार्बन राजस्व का असमान वितरण: यूरोपीय संघ द्वारा 2028–2034 के दौरान CBAM से प्राप्त राजस्व का 75% अपने बजट में रखने के प्रस्ताव के कारण जलवायु न्याय और दायित्वों के असमान बँटवारे को लेकर चिंताएँ बढ़ी हैं। यह राजस्व विकासशील देशों के हरित परिवर्तन में सहायता के लिए उपयोग किए जाने के बजाय यूरोपीय संघ के बजट में रखा जाएगा।

भारत के लिए महत्त्व

  • अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करता है।
  • भारतीय निर्यातकों को कार्बन सीमा संबंधी उपायों का सामना करने में सहायता करता है।
  • भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना की विश्वसनीयता बढ़ाता है।
  • घरेलू कार्बन बाज़ारों और हरित निवेश के विकास को समर्थन देता है।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और जलवायु वित्त के अवसर सृजित करता है।
  • विकासशील देशों और वैश्विक जलवायु शासन के बीच सेतु के रूप में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करता है।

आगे की राह

  • साझा नियमावली का विकास: ब्रिक्स को तत्काल एकीकृत कार्बन बाज़ार स्थापित करने के बजाय मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) प्रणालियों तथा कार्बन क्रेडिट मानकों का मानकीकरण करना चाहिए।
    • इससे पारदर्शिता और वैश्विक विश्वास में वृद्धि होगी।
  • भारत की CCTS का सुदृढ़ीकरण: भारतीय निर्यातकों पर CBAM का अतिरिक्त भार कम करने के लिए भारत को अपनी कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना का विस्तार करना चाहिए और घरेलू कार्बन मूल्य निर्धारण में क्रमिक सुधार करना चाहिए।
  • MSMEs को समर्थन: सरकार को MSMEs को अंतरराष्ट्रीय कार्बन मानकों का अनुपालन करने में सहायता देने के लिए डिजिटल कार्बन लेखांकन उपकरण, सत्यापन लागत पर सब्सिडी और तकनीकी सहायता उपलब्ध करानी चाहिए।
  • कूटनीतिक प्रभाव का उपयोग: भारत को यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) पर वार्ता के दौरान CBAM से छूट या राहत प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही, यह माँग करनी चाहिए कि भारतीय निर्यात से एकत्रित कार्बन राजस्व का उपयोग भारत के नवीकरणीय ऊर्जा परिवर्तन को समर्थन देने के लिए किया जाए।

निष्कर्ष

  • ब्रिक्स कार्बन बाज़ार साझेदारी एक रणनीतिक दूरदर्शी पहल है, जो वैश्विक दक्षिण को रक्षात्मक प्रवृति से आगे बढ़कर सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर प्रदान करती है। CBAM जैसे एकतरफा तंत्रों का सामना करने के लिए कठिन आर्थिक कूटनीति की आवश्यकता होगी। हालाँकि, ब्रिक्स के अंदर कार्बन व्यापार का मानकीकरण भारत को नई वैश्विक हरित अर्थव्यवस्था के नियम निर्धारित करने का अवसर प्रदान करता है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] ब्रिक्स कार्बन बाज़ार साझेदारी क्या है? विकासशील देशों के बीच जलवायु सहयोग को सुदृढ़ करने में इसके महत्त्व की चर्चा कीजिए। 

स्रोत:TH

 

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