भारत का आगामी निवेश चक्र निर्धारित करेगा कार्बन भविष्य की दिशा

पाठ्यक्रम: GS3/बुनियादी ढांचा/पर्यावरण

संदर्भ 

  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा वैश्विक तापमान में वृद्धि को लेकर दी गई चेतावनी इस आवश्यकता को रेखांकित करती है कि भारत को अपने आगामी निवेश चक्र को कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लक्ष्यों के अनुरूप बनाना चाहिए।

भारत में उभरती अवसंरचनात्मक आवश्यकताएँ

  • नीति आयोग का अनुमान है कि भारत में वर्ष 2070 तक उपस्थित होने वाले कुल भवनों में से 86% का निर्माण अभी होना शेष है।
    • कुल निर्मित फर्श क्षेत्र वर्ष 2020 के लगभग 18 अरब वर्ग मीटर से बढ़कर वर्ष 2070 तक 42 अरब वर्ग मीटर हो जाएगा, अर्थात इसमें दोगुने से अधिक वृद्धि होगी।
  • भारत की कच्चे इस्पात की उत्पादन क्षमता वर्ष 2024-25 में लगभग 200 मिलियन टन थी, जिसे वर्ष 2030-31 तक बढ़ाकर 300 मिलियन टन करने का लक्ष्य है।
  • सीमेंट का उत्पादन वर्ष 2024 के लगभग 427 मिलियन टन से बढ़कर वर्ष 2030 तक 660 मिलियन टन होने की संभावना है।
  • इन प्रवृत्तियों से ऊर्जा की माँग और औद्योगिक उत्सर्जन में वृद्धि होगी। हालाँकि, ये भारत को प्रारंभ से ही स्वच्छ प्रौद्योगिकियों तथा ऊर्जा-कुशल अवसंरचना अपनाने का अवसर भी प्रदान करती हैं।

प्रारंभ से ही हरित निर्माण करने के लाभ 

  • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) का अनुमान है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में वर्ष 2050 में उपयोग होने वाले भवनों में से लगभग 80% भवन पहले से ही विद्यमान हैं।
  • विकसित अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत, जहाँ भविष्य में उपयोग होने वाले अधिकांश भवन पहले ही निर्मित हो चुके हैं, भारत के पास ऊर्जा-गहन अवसंरचना पर दीर्घकालिक निर्भरता से बचने का अवसर है।
    • बाद में ऊर्जा-अक्षम भवनों का पुनरुद्धार करने और अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाली औद्योगिक परिसंपत्तियों को बदलने में भारी आर्थिक लागत आएगी।

विद्युत क्षेत्र में अवसंरचनात्मक खामियाँ

  • भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का तीव्र गति से विस्तार किया है, लेकिन अपर्याप्त पारेषण अवसंरचना के कारण उपलब्ध नवीकरणीय विद्युत का पूर्ण उपयोग नहीं हो पा रहा है।
  • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) का अनुमान है कि पारेषण संबंधी बाधाओं के कारण लगभग 60 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का उपयोग प्रभावित हुआ है।
  • विद्युत मंत्रालय की योजना के अनुसार, वर्ष 2023 से 2032 के बीच लगभग 590 गीगावाट की अतिरिक्त विद्युत उत्पादन क्षमता स्थापित की जानी है। इसलिए, यदि पारेषण संबंधी खामियों का समाधान नहीं किया गया, तो उत्पादन क्षमता के विस्तार के साथ यह समस्या अधिक गंभीर हो जाएगी।
    • जैसे-जैसे परिवहन, शीतलन और औद्योगिक गतिविधियाँ विद्युत पर अधिक निर्भर होंगी, विश्वसनीय पारेषण व्यवस्था तथा ऊर्जा भंडारण की आवश्यकता भी बढ़ेगी।

भारत द्वारा की गई पहलें 

  • ऊर्जा संरक्षण एवं सतत भवन संहिता (ECSBC), 2024: यह वाणिज्यिक भवनों में ऊर्जा दक्षता और सतत विकास को बढ़ावा देती है, जबकि इको-निवास संहिता (ENS), 2024 का उद्देश्य ऊर्जा-कुशल आवासीय भवनों को प्रोत्साहित करना है।
  • हरित इस्पात वर्गीकरण व्यवस्था , 2024: भारत ने उत्सर्जन की तीव्रता के आधार पर इस्पात का वर्गीकरण करने के लिए एक रूपरेखा प्रस्तुत की है, जिससे कम कार्बन उत्सर्जन वाले इस्पात उत्पादन में निवेश को प्रोत्साहन मिलता है।
  • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन : यह हरित हाइड्रोजन के उत्पादन तथा इस्पात जैसे उन क्षेत्रों में इसके उपयोग को बढ़ावा देता है, जहाँ कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना कठिन है। इससे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में सहायता मिलती है।
  • इस्पात स्क्रैप पुनर्चक्रण नीति, 2019 : यह इस्पात के स्क्रैप के संग्रहण और पुनर्चक्रण को प्रोत्साहित करती है, जिससे नए कच्चे माल की माँग कम होती है तथा चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है।
  • कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (CCTS), 2023: यह भारत के कार्बन बाजार के लिए एक रूपरेखा स्थापित करती है तथा कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्रों के माध्यम से उद्योगों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए प्रोत्साहित करती है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार : पीएम सूर्य घर मुफ्त विद्युत योजना, राष्ट्रीय सौर मिशन और हरित ऊर्जा गलियारा पहल जैसी योजनाएँ स्वच्छ बिजली उत्पादन तथा विद्युत ग्रिड में इसके एकीकरण को बढ़ावा देती हैं।
  • राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs): भारत ने वर्ष 2035 तक वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की उत्सर्जन तीव्रता में 47% की कमी लाने और वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।

प्रमुख चुनौतियाँ 

  • वित्तपोषण: अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) का अनुमान है कि भारत में बड़े स्तर की विद्युत ग्रिड-आधारित नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए पूँजी की लागत विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में लगभग 80% अधिक है।
    • चूँकि स्वच्छ अवसंरचना में प्रारंभिक निवेश अधिक होता है, इसलिए पूँजी की लागत में यह अंतर किसी अन्यथा व्यवहार्य परियोजना को भी अलाभकारी बना सकता है।
  • इस्पात और सीमेंट क्षेत्र का कार्बन-मुक्तीकरण: इन क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन कम करना कठिन है, क्योंकि इनके उत्पादन में अत्यधिक ऊर्जा की खपत होती है। विशेष रूप से सीमेंट उत्पादन के दौरान रासायनिक प्रक्रियाओं से भी उत्सर्जन होता है।
  • ऊर्जा दक्षता मानकों का असमान क्रियान्वयन: विभिन्न राज्यों में भवन संहिताओं और ऊर्जा दक्षता संबंधी नियमों को अपनाने तथा लागू करने की स्थिति में भिन्नता है।
  • प्रौद्योगिकी और आपूर्ति शृंखला पर निर्भरता: स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए महत्त्वपूर्ण खनिजों, उन्नत घटकों, बैटरियों और विशेष उपकरणों की आवश्यकता होती है।
    • आयातित प्रौद्योगिकियों तथा कुछ सीमित वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता के कारण भारत को कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति में व्यवधान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

आगे की राह 

  • हरित सार्वजनिक खरीद : सरकारी एजेंसियाँ, भारतीय रेलवे और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) कम उत्सर्जन वाले इस्पात तथा सीमेंट की माँग उत्पन्न कर सकते हैं।
  • प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया : खरीद संबंधी निविदाओं में उत्सर्जन तीव्रता की न्यूनतम या अधिकतम सीमाएँ निर्धारित की जा सकती हैं, बिना किसी विशिष्ट उत्पादन प्रौद्योगिकी को अनिवार्य बनाए। इससे नवाचार और लागत-दक्षता को प्रोत्साहन मिलेगा।
  • नीतिगत सामंजस्य : जहाँ उपयुक्त हो, वहाँ खरीद मानकों को भारत की हरित इस्पात वर्गीकरण व्यवस्था तथा कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (CCTS) के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
  • मानकों को चरणबद्ध रूप से कठोर बनाना: जैसे-जैसे स्वच्छ प्रौद्योगिकियाँ परिपक्व हों और उत्पादन लागत में कमी आए, उत्सर्जन मानकों को क्रमशः अधिक कठोर बनाया जा सकता है।

निष्कर्ष 

  • भारत का आगामी निवेश चक्र आर्थिक विकास को अपनी दीर्घकालिक जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप बनाने का महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।
  • ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि जहाँ प्रौद्योगिकियाँ परिपक्व हो चुकी हैं, वहाँ कुशल और ऊर्जा-सक्षम अवसंरचना का निर्माण किया जाए; वहीं, जहाँ प्रौद्योगिकियाँ अभी विकसित हो रही हैं, वहाँ भविष्य में बदलाव की गुंजाइश बनाए रखी जाए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि आज का विकास कल पर्यावरणीय और आर्थिक भार में परिवर्तित न हो।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: भारत का आगामी निवेश चक्र आर्थिक विकास को उसके कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लक्ष्यों के अनुरूप बनाने का अवसर प्रदान करता है। भारत की दीर्घकालिक जलवायु प्रतिबद्धताओं के समर्थन में अवसंरचनात्मक एवं औद्योगिक निवेश सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक चुनौतियों और उपायों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: TH

 

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