पाठ्यक्रम: GS3/जैव प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- चिकित्सा के क्षेत्र में वर्ष 1993 के नोबेल पुरस्कार विजेता रिचर्ड जे. रॉबर्ट्स ने इस विचार को खारिज किया कि भारत द्वारा आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलों को अपनाने से भारतीय विदेशी कंपनियों पर निर्भर हो जाएँगे।
भारत में GM फसलों की शुरुआत
- वर्ष 2002 में सरकार ने बीटी कपास की व्यावसायिक खेती को स्वीकृति दी।
- क्राई1एसी (cry1Ac) जीन युक्त प्रथम बीटी संकर किस्मों को बॉलवर्म (गूलर कीट) समूह के कीटों से प्रतिरोध प्रदान करने के उद्देश्य से स्वीकृति दी गई।
- वर्ष 2006 तक, आनुवंशिक अभियांत्रिकी मूल्यांकन समिति (GEAC) ने बोलगार्ड II को स्वीकृति दे दी थी। यह दो जीनों को एक साथ समाहित करने वाली दूसरी पीढ़ी की संकर किस्म है।
- अब तक भारत में केवल इसी आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसल की खेती की अनुमति दी गई है।
- वर्ष 2010 में सरकार ने बीटी बैंगन , जो इस सब्जी की आनुवंशिक रूप से संशोधित किस्म है, पर अनिश्चितकालीन प्रतिबंध लगा दिया।
- यह निर्णय इसकी सुरक्षा, किसानों पर पड़ने वाले वित्तीय प्रभाव तथा आनुवंशिक संशोधन प्रौद्योगिकी के विदेशी स्वामित्व के निहितार्थों पर कई वर्षों तक चली परिचर्चा के बाद लिया गया।
- वर्ष 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने GM सरसों को पर्यावरण में जारी करने के मामले में विभाजित निर्णय दिया, लेकिन केंद्र सरकार को GM फसलों के संबंध में राष्ट्रीय नीति तैयार करने का निर्देश सर्वसम्मति से दिया।
GM फसलें क्या हैं?
- वे फसलें जिनके DNA में परिवर्तन करने के लिए आनुवंशिक अभियांत्रिकी की प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है, आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलें कहलाती हैं।
- क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिंड्रोमिक रिपीट्स (CRISPR): यह जीन-संपादन की एक तकनीक है, जिसमें गाइड RNA, Cas9 एंजाइम को किसी जीव के DNA में एक निर्धारित स्थान तक पहुँचाता है। वहाँ यह एंजाइम DNA को काटता है, जिससे वैज्ञानिक उस स्थान पर जीन में परिवर्तन कर सकते हैं या नए जीन सम्मिलित कर सकते हैं।
- यह संशोधन कीटों या खरपतवारनाशकों के प्रति प्रतिरोध, बेहतर पोषण गुणवत्ता अथवा अधिक उपज जैसे वांछनीय गुण विकसित करने के लिए किया जाता है।
- GM फसलों के निर्माण की प्रक्रिया में सामान्यतः निम्नलिखित चरण शामिल होते हैं—
- वांछित गुणों की पहचान करना।
- संबंधित जीन को अलग करना।
- उस जीन को फसल के जीनोम में प्रविष्ट कराना।
- संशोधित गुण की अभिव्यक्ति सुनिश्चित करना।
- GM फसलों में उपयोग की जाने वाली प्रमुख तकनीकों में जीन गन, विद्युत्-छिद्रीकरण , सूक्ष्म अंतःक्षेपण तथा एग्रोबैक्टीरियम-आधारित तकनीक शामिल हैं।
- आनुवंशिक संशोधन के प्रमुख प्रकार हैं— ट्रांसजेनिक , सिस्जेनिक , सबजेनिक तथा अनेक वांछित गुणों का एकीकरण ।
नियामकीय ढाँचा
- भारत की नियामकीय व्यवस्था के अंतर्गत GM फसलों को पर्यावरण में जारी करने के लिए पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम के प्रावधानों तथा आनुवंशिक रूप से अभियांत्रित जीवों को नियंत्रित करने वाले वर्ष 1989 के नियमों के अंतर्गत आनुवंशिक अभियांत्रिकी मूल्यांकन समिति (GEAC) की स्वीकृति आवश्यक है।
- भारत में GM फसलों को विनियमित करने वाले प्रमुख अधिनियम एवं नियम निम्नलिखित हैं—
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (EPA)
- जैव विविधता अधिनियम, 2002
- पादप संगरोध आदेश, 2003
- विदेश व्यापार नीति के अंतर्गत GM नीति
- खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006
- औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियम (आठवाँ संशोधन), 1988
प्रमुख चिंताएँ
- जैव विविधता संबंधी जोखिम: GM फसलें गैर-लक्षित जीवों को प्रभावित कर सकती हैं, एकल फसल प्रणाली को बढ़ावा दे सकती हैं तथा जीन प्रवाह के माध्यम से स्थानीय फसल किस्मों में आनुवंशिक परिवर्तन उत्पन्न कर सकती हैं। इससे जैव विविधता को खतरा हो सकता है।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ: GM फसलों में प्रयुक्त एंटीबायोटिक प्रतिरोधी मार्कर जीनों को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है कि इनके संभावित प्रभाव से मनुष्यों में कुछ एंटीबायोटिक दवाओं की प्रभावशीलता कम हो सकती है। इससे एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी रोगजनकों के उभरने का जोखिम उत्पन्न होने की आशंका रहती है।
- किसानों पर प्रभाव: बीजों की अधिक कीमत, स्वामित्वाधीन प्रौद्योगिकी पर निर्भरता तथा वैकल्पिक बीजों की सीमित उपलब्धता किसानों की निजी कंपनियों पर निर्भरता बढ़ा सकती है।
- कृषि पर कॉर्पोरेट नियंत्रण: GM प्रौद्योगिकी से संबंधित पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकारों के कारण बीजों तथा कृषि निवेशों पर नियंत्रण कुछ चुनिंदा कंपनियों के हाथों में केंद्रित हो सकता है।
- कानूनी असंगतियाँ: खेतों में परीक्षणों के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) जारी करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पर नागरिक समाज संगठनों ने प्रश्न उठाए हैं।
- उनका तर्क है कि इस प्रक्रिया में सार्वजनिक परामर्श, स्वतंत्र समीक्षा और संसदीय निगरानी का अभाव है।
- व्यापार एवं उपभोक्ता की पसंद: विभिन्न देशों में GM खाद्य पदार्थों के नियमन संबंधी अलग-अलग नियम कृषि निर्यात को जटिल बना सकते हैं। वहीं, पर्याप्त लेबलिंग और उत्पादों की उत्पत्ति का पता लगाने की व्यवस्था के अभाव में उपभोक्ताओं की सूचित निर्णय लेने की क्षमता सीमित हो सकती है।
आगे की राह
- वैज्ञानिक पारदर्शिता को सुदृढ़ करना: GM फसलों की सुरक्षा और प्रभावकारिता का स्वतंत्र तथा समकक्ष-समीक्षित आकलन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। विश्वास और विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए परीक्षणों से संबंधित आँकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
- जनभागीदारी को प्रोत्साहित करना: किसानों, वैज्ञानिकों और नागरिक समाज संगठनों के साथ खुले परामर्श आयोजित किए जाने चाहिए, ताकि उनकी चिंताओं का समाधान किया जा सके।
- स्थानीय फसल किस्मों का संरक्षण: स्थानीय एवं देशज फसल किस्मों को आनुवंशिक संदूषण से बचाने के लिए बफर क्षेत्र और जैव-सुरक्षा संबंधी नियंत्रण उपाय अपनाए जाने चाहिए।
- जैव-सुरक्षा एवं नैतिकता समितियों को सशक्त बनाना: इन समितियों की स्वतंत्रता और जवाबदेही बढ़ाई जानी चाहिए, ताकि GM फसलों के मूल्यांकन एवं नियमन में वैज्ञानिक निष्पक्षता तथा सार्वजनिक हित सुनिश्चित हो सके।
स्रोत: TH
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