पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- सेमीकंडक्टर शिखर सम्मेलन 2026 में सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला के प्रमुख ने आयातित प्रौद्योगिकियों पर भारत की निर्भरता तथा सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास (R&D), विनिर्माण और विशिष्ट कौशलयुक्त प्रतिभाओं के विकास की आवश्यकता को रेखांकित किया।
सेमीकंडक्टर पारितंत्र
- वैश्विक स्थिति: वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार में वर्ष 2014 से 2024 के बीच 6.5% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) दर्ज की गई। आगामी 5–10 वर्षों में इसके 8.5% की दर से बढ़ने की संभावना है।
- हालाँकि, हाल के व्यवधानों ने परस्पर संबद्ध वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला की कमजोरियों को उजागर किया है।
- वर्तमान में ताइवान, दक्षिण कोरिया, जापान, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका वैश्विक सेमीकंडक्टर विनिर्माण क्षेत्र में प्रमुख स्थान रखते हैं।
- ताइवान अकेले वैश्विक चिप उत्पादन में 60% से अधिक तथा उन्नत चिपों के उत्पादन में लगभग 90% योगदान देता है।
- भारत की स्थिति: भारत में सेमीकंडक्टर की माँग वित्त वर्ष 2030 तक 110 अरब अमेरिकी डॉलर और वित्त वर्ष 2035 तक 200 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक होने की संभावना है, जबकि घरेलू विनिर्माण अभी प्रारंभिक अवस्था में है।
- भारत ने वित्त वर्ष 2017 से वित्त वर्ष 2025 के दौरान सेमीकंडक्टर उत्पादों के आयात पर लगभग 150 अरब अमेरिकी डॉलर व्यय किए। इस अवधि में आयात में 23% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई।
- यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो वर्ष 2035 तक वार्षिक आयात 240 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच सकता है। इसलिए, एक व्यापक सेमीकंडक्टर पारितंत्र का निर्माण करना राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में अत्यंत आवश्यक है।
- भारत ने वित्त वर्ष 2017 से वित्त वर्ष 2025 के दौरान सेमीकंडक्टर उत्पादों के आयात पर लगभग 150 अरब अमेरिकी डॉलर व्यय किए। इस अवधि में आयात में 23% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई।
सेमीकंडक्टर रणनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्यों हैं?
- डिजिटल अर्थव्यवस्था का आधार: सेमीकंडक्टर लगभग सभी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और डिजिटल प्रौद्योगिकियों के प्रमुख घटक हैं।
- राष्ट्रीय सुरक्षा: सेमीकंडक्टर चिपें रक्षा उपकरणों, निगरानी प्रणालियों, उपग्रहों, साइबर सुरक्षा अवसंरचना और रणनीतिक संचार नेटवर्क के लिए अपरिहार्य हैं।
- औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता: सशक्त सेमीकंडक्टर विनिर्माण क्षमताओं वाले देश तकनीकी नेतृत्व और औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता का लाभ उठा रहे हैं।
- प्रौद्योगिकीय संप्रभुता: विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करने और आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करने के लिए घरेलू सेमीकंडक्टर उत्पादन आवश्यक है।

भारत का सेमीकंडक्टर मिशन
- इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 1.0: यह इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अंतर्गत वर्ष 2021 में प्रारंभ किया गया एक प्रमुख कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य भारत में सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले विनिर्माण का एक व्यापक पारितंत्र विकसित करना है।
- इस मिशन को ₹76,000 करोड़ की प्रोत्साहन व्यवस्था का समर्थन प्राप्त है। इसके अंतर्गत सिलिकॉन वेफर निर्माण संयंत्रों , कंपाउंड सेमीकंडक्टर सुविधाओं, असेंबली एवं परीक्षण इकाइयों तथा चिप डिजाइन के लिए 50% तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
- इस मिशन के अंतर्गत लगभग ₹1.64 लाख करोड़ के निवेश प्रस्तावों के साथ 12 सेमीकंडक्टर विनिर्माण परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है।
- इन परियोजनाओं में सिलिकॉन फैब्रिकेशन इकाइयाँ, सिलिकॉन कार्बाइड फैब, उन्नत एवं मेमोरी पैकेजिंग सुविधाएँ तथा विशिष्ट असेंबली और परीक्षण अवसंरचना शामिल हैं।
- इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0: इसकी घोषणा केंद्रीय बजट 2026–27 में की गई।
- ISM 2.0 का ध्यान भारत में सेमीकंडक्टर उपकरणों और सामग्रियों के उत्पादन, संपूर्ण भारतीय सेमीकंडक्टर बौद्धिक संपदा (IP) के डिजाइन तथा घरेलू और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ करने पर केंद्रित होगा।
- सेमीकॉन 2.0 के अंतर्गत छह प्रमुख स्तंभों के माध्यम से सेमीकंडक्टर पारितंत्र का निर्माण करने का लक्ष्य है—
- डिजाइन: सेमीकंडक्टर डिजाइन क्षमताओं को विकसित करना।
- मशीनें और सामग्रियाँ: आवश्यक उपकरणों एवं सामग्रियों का घरेलू उत्पादन बढ़ाना।
- अधिक फैब संयंत्रों की स्थापना: सेमीकंडक्टर विनिर्माण संयंत्रों की संख्या में वृद्धि करना।
- ATMP-OSAT उद्योग को और सुदृढ़ करना: असेंबली, परीक्षण, मार्किंग एवं पैकेजिंग तथा आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली और परीक्षण उद्योग की क्षमताओं का विस्तार करना।
- अनुसंधान एवं विकास: सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकियों में नवाचार और स्वदेशी अनुसंधान को प्रोत्साहित करना।
- प्रतिभा विकास: इस क्षेत्र के लिए कुशल एवं विशिष्ट मानव संसाधन तैयार करना।

स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर और प्रमुख सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकियाँ
- माइक्रोप्रोसेसर आधुनिक डिजिटल अवसंरचना की आधारभूत परत हैं। ये दूरसंचार, परिवहन एवं गतिशीलता, स्वास्थ्य सेवा, उद्योग, रक्षा और अंतरिक्ष सहित विभिन्न क्षेत्रों के उपकरणों एवं प्रणालियों को संचालित करते हैं।
- सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के प्रमुख आधार के रूप में उन्नत प्रोसेसर डिजाइन की संप्रभु क्षमताएँ विकसित करने के लिए भारत ने लक्षित निवेश किए हैं।
- इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि DHRUV64 का शुभारंभ है। यह माइक्रोप्रोसेसर विकास कार्यक्रम (MDP) के अंतर्गत उन्नत प्रौद्योगिकी विकास केंद्र (C-DAC) द्वारा विकसित पूर्णतः स्वदेशी 64-बिट माइक्रोप्रोसेसर है।
प्रमुख चुनौतियाँ
- उच्च पूँजी निवेश: सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन संयंत्रों की स्थापना के लिए कई अरब डॉलर के निवेश की आवश्यकता होती है। साथ ही, इन परियोजनाओं को परिचालन स्तर तक पहुँचने में लंबा समय लगता है।
- प्रौद्योगिकी-प्रधान उद्योग: सेमीकंडक्टर विनिर्माण के लिए अत्यंत उन्नत प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता होती है, जिनका निरंतर विकास होता रहता है।
- आयातित उपकरणों पर निर्भरता: भारत उन्नत सेमीकंडक्टर विनिर्माण उपकरणों और विशिष्ट मशीनरी के लिए अब भी विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर है।
- अवसंरचना संबंधी आवश्यकताएँ: सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन के लिए निर्बाध विद्युत आपूर्ति, अति-शुद्ध जल तथा अत्यंत विश्वसनीय लॉजिस्टिक्स अवसंरचना आवश्यक है।
- कौशल की कमी: इस उद्योग को सेमीकंडक्टर इंजीनियरिंग, फैब्रिकेशन प्रक्रियाओं और चिप डिजाइन में प्रशिक्षित अत्यधिक विशिष्ट कार्यबल की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
- इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0, सेमीकंडक्टर पारितंत्र के निर्माण से आगे बढ़कर उसके सुदृढ़ीकरण और वैश्विक एकीकरण की दिशा में एक निर्णायक परिवर्तन को दर्शाता है।
- विनिर्माण, डिजाइन और उन्नत कौशल के विकास को अधिक समर्थन देकर ISM 2.0 सेमीकंडक्टर क्षेत्र को एक रणनीतिक राष्ट्रीय क्षमता के रूप में स्थापित करता है, जो आर्थिक लचीलेपन, डिजिटल अवसंरचना और प्रौद्योगिकीय संप्रभुता के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
स्रोत: TH