पाठ्यक्रम: GS2/जनजातीय कल्याण; GS3/कृषि
संदर्भ
- वन अधिकार अधिनियम (FRA) के अंतर्गत मान्यता प्राप्त भूमि पर दलहन एवं तिलहन की खेती की संभावनाओं का उपयोग जनजातीय आजीविका को सुदृढ़ करने, जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने तथा खाद्य तेलों के आयात पर भारत की निर्भरता कम करने में सहायक हो सकता है।
वन अधिकार अधिनियम, 2006
- अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 का उद्देश्य वनवासी समुदायों के वन भूमि एवं संसाधनों पर अधिकारों को मान्यता देकर उनके साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना है।
- इसके प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं—
- व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR): निर्धारित वैधानिक शर्तों को पूरा करने पर उन व्यक्तियों के वन भूमि संबंधी अधिकारों को मान्यता देना, जिस पर वे निवास या अपनी आजीविका के लिए खेती करने के उद्देश्य से काबिज हैं।
- सामुदायिक वन अधिकार (CFR): समुदायों के पारंपरिक वन संसाधनों के उपयोग से संबंधित अधिकारों को मान्यता देना।
- सामुदायिक वन संसाधन अधिकार : इन अधिकारों में ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधनों की रक्षा, पुनर्जनन, संरक्षण और प्रबंधन करने के लिए प्राप्त प्राधिकार की मान्यता शामिल है।
- भूमि पर अधिकारों की मान्यता आजीविका सुरक्षा का आधार है। हालाँकि, इसके आर्थिक लाभ जल की उपलब्धता, गुणवत्तापूर्ण कृषि निवेशों के उपयोग, संस्थागत सहायता और बाजार तक पहुँच पर निर्भर करते हैं।
जनजातीय जिलों की वर्तमान स्थिति एवं उनकी संभावनाएँ
- भारत के 33 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में स्थित जनजातीय क्षेत्रों में भौगोलिक, पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक विविधता पाई जाती है।
- 244 जनजातीय जिलों को शामिल करने वाले एक आकलन से निम्नलिखित तथ्य सामने आए हैं—
- 60 जिले: तिलहन उत्पादन की पर्याप्त संभावनाएँ रखते हैं।
- 31 जिले: दलहन उत्पादन की प्रबल संभावनाएँ रखते हैं।
- 23 जिले: दलहन एवं तिलहन, दोनों के उत्पादन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ रखते हैं।
- ये जिले लक्षित कृषि हस्तक्षेपों के अवसर प्रदान करते हैं। हालाँकि, केवल उत्पादन की संभावना होने से वास्तविक उत्पादन में वृद्धि सुनिश्चित नहीं होती।
- जनजातीय जिलों और आकांक्षी जिलों के बीच अतिव्यापन के कारण कृषि विकास समावेशी विकास के लिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
FRA के अंतर्गत मान्यता प्राप्त भूमि का उत्पादक उपयोग
- दलहन एवं तिलहन: दलहन एवं तिलहन की खेती स्थापित भूमि अधिकारों को आजीविका के अधिक उत्पादक और लाभकारी साधनों में परिवर्तित कर सकती है। इसके संभावित लाभ निम्नलिखित हैं—
- जलवायु अनुकूलन क्षमता : दलहन एवं तिलहन की कई किस्में वर्षा-आधारित परिस्थितियों में उगाई जा सकती हैं। इसलिए ये उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त हैं, जहाँ सिंचाई की सुविधाएँ सीमित हैं।
- आय का विविधीकरण : उपयुक्त दलहन एवं तिलहन फसलों की खेती से किसी एक फसल पर निर्भरता कम की जा सकती है तथा कृषि आय के स्रोतों में विविधता लाई जा सकती है।
- पोषण सुरक्षा : दलहन वनस्पति-आधारित प्रोटीन का स्रोत हैं, जबकि तिलहन खाद्य तेल के उत्पादन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
- आयात प्रतिस्थापन : घरेलू स्तर पर उत्पादित तिलहनों की उत्पादकता बढ़ाने से खाद्य तेलों के आयात पर भारत की निर्भरता कम करने में सहायता मिल सकती है।
- सतत कृषि : यदि फसल चक्र, अंतरवर्तीय खेती और मृदा आर्द्रता संरक्षण जैसी पद्धतियों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाया जाए, तो संसाधनों के अधिक कुशल उपयोग के माध्यम से सतत कृषि को बढ़ावा दिया जा सकता है।
- हालाँकि, फसलों का चयन करते समय मृदा उर्वरता, वर्षा, जल की उपलब्धता तथा विभिन्न फसल किस्मों की उपयुक्तता को ध्यान में रखना आवश्यक है।
क्षेत्रीय विविधता एवं अप्रयुक्त कृषि संभावनाएँ
- खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के मृदा मानचित्र पर आधारित विश्लेषण से संकेत मिलता है कि कुछ जनजातीय क्षेत्रों की परिस्थितियाँ सोयाबीन, मूँगफली, सूरजमुखी, सरसों और चने जैसी फसलों की खेती के लिए अनुकूल हैं।
- वर्तमान फसल प्रतिरूप भी क्षेत्रीय विविधता को दर्शाते हैं—
- खरीफ : अनेक जनजातीय क्षेत्रों में धान और मक्का प्रमुख फसलें हैं।
- रबी : गेहूँ, चना, सरसों, मसूर तथा अन्य दलहन प्रमुख फसलें हैं।
- अन्य क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसलें, जैसे मोटे अनाज, कपास, तिल, मसाले और बागवानी फसलें, स्थानीय कृषि-पारिस्थितिक परिस्थितियों के अनुकूल होती हैं तथा फसल विविधीकरण के अवसर प्रदान करती हैं।
- इसलिए, पूरे देश के लिए एक समान फसल नीति उपयुक्त नहीं होगी। इसके स्थान पर स्थानीय कृषि प्रणालियों, पारंपरिक ज्ञान, समुदाय की प्राथमिकताओं और पारिस्थितिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर उपाय किए जाने चाहिए।
चुनौतियाँ एवं चिंताएँ
- सीमित संसाधन : मृदा की कम उर्वरता, अपर्याप्त सिंचाई और आर्द्रता धारण करने की कम क्षमता के कारण फसल की उपज सीमित हो सकती है।
- कृषि निवेशों की कमी ]: किसानों को समय पर प्रमाणित बीज, उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों की उपलब्धता न होने के कारण कृषि निवेशों में अंतराल बना रहता है।
- कमजोर बाजार अवसंरचना : भंडारण, सुखाने, श्रेणीकरण और प्रसंस्करण की अपर्याप्त सुविधाओं के कारण कटाई के बाद होने वाली हानि बढ़ जाती है।
- संस्थागत बाधाएँ : किसानों की कृषि विस्तार सेवाओं, किफायती ऋण, बीमा तथा सामूहिक विपणन के अवसरों तक सीमित पहुँच उनकी कृषि में निवेश करने की क्षमता को प्रभावित करती है।
- पर्यावरणीय जोखिम : अनुपयुक्त फसलों का चयन तथा जल या रासायनिक कृषि निवेशों का अत्यधिक उपयोग पर्यावरणीय जोखिम उत्पन्न कर सकता है।
- क्षेत्रीय असमानताएँ : भौगोलिक स्वरूप, बस्तियों के वितरण और संसाधनों की उपलब्धता में अंतर के कारण विभिन्न क्षेत्रों की परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। इसलिए प्रत्येक क्षेत्र के अनुरूप समाधान आवश्यक हैं।
संबंधित सरकारी पहलें
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना : सिंचाई के विकास और जल उपयोग दक्षता को बढ़ावा देती है।
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन ( NFSM): संबंधित कार्यक्रम घटकों के अंतर्गत दलहन सहित कृषि उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ावा देता है।
- खाद्य तेलों पर राष्ट्रीय मिशन : तिलहन से संबंधित पहलों तथा अलग-अलग घटकों के अंतर्गत ऑयल पाम के माध्यम से घरेलू खाद्य तेल उत्पादन को प्रोत्साहित करता है।
- प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA): लागू दिशा-निर्देशों के अंतर्गत किसानों को मूल्य समर्थन प्रदान करने के लिए विभिन्न व्यवस्थाएँ उपलब्ध कराता है।
- वन धन योजना : वन उपज के मूल्य संवर्धन और विपणन के माध्यम से जनजातीय आजीविका को बढ़ावा देती है।
- इन योजनाओं के साथ समन्वय स्थापित करने से आजीविका के अवसरों को सुदृढ़ किया जा सकता है। हालाँकि, यह संबंधित योजनाओं की पात्रता शर्तों और कार्यान्वयन संबंधी दिशा-निर्देशों पर निर्भर करेगा।
आगे की राह: क्षेत्र-विशिष्ट विकास रणनीति
- फसल समूहों का विकास : उच्च कृषि क्षमता वाले जनजातीय जिलों की पहचान की जाए तथा स्थानीय कृषि-जलवायवीय परिस्थितियों के अनुकूल फसलों को बढ़ावा दिया जाए।
- कृषि उत्पादकता में सुधार : गुणवत्तापूर्ण बीजों, मृदा परीक्षण, जलग्रहण क्षेत्र विकास, उपयुक्त सिंचाई सुविधाओं और कृषि विस्तार सेवाओं तक समय पर पहुँच सुनिश्चित की जाए।
- सामुदायिक संस्थाओं को सुदृढ़ बनाना : ग्राम सभाओं, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाया जाए, ताकि वे कृषि उपज का सामूहिकीकरण, मूल्य संवर्धन एवं सौदेबाजी की क्षमता में सुधार कर सकें।
- स्थानीय अवसंरचना का निर्माण: कृषि उपज की हानि कम करने के लिए उपयुक्त सुखाने, भंडारण, श्रेणीकरण और प्राथमिक प्रसंस्करण की सुविधाएँ स्थापित की जाएँ।
- बाजार तक पहुँच में सुधार : संस्थागत ऋण, फसल बीमा, बाजार संपर्क और जहाँ लागू हो, वहाँ सरकारी खरीद व्यवस्था तक पहुँच का विस्तार किया जाए।
- वैज्ञानिक नियोजन को बढ़ावा : पारंपरिक ज्ञान, सहभागी नियोजन और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों के साथ भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) आधारित फसल उपयुक्तता मानचित्रण का उपयोग किया जाए।
निष्कर्ष
- वन अधिकारों से आजीविका सुरक्षा तक की यात्रा भूमि अधिकारों की मान्यता के साथ समाप्त नहीं होती, बल्कि वहीं से प्रारंभ होती है।
- FRA के अंतर्गत मान्यता प्राप्त भूमि को उपयुक्त दलहन एवं तिलहन की खेती से जोड़ना, सतत संसाधन प्रबंधन, सामुदायिक संस्थाओं और बेहतर बाजार पहुँच का सहयोग प्राप्त करना—जनजातीय आय, पारिस्थितिक अनुकूलन क्षमता तथा भारत की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकता है।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: चर्चा कीजिए कि वन अधिकार अधिनियम (FRA) के अंतर्गत मान्यता प्राप्त भूमि पर दलहन एवं तिलहन की खेती किस प्रकार सतत कृषि को बढ़ावा दे सकती है तथा जनजातीय समुदायों की आजीविका में सुधार कर सकती है। |
स्रोत: TH
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