पाठ्यक्रम: GS2/बच्चों से संबंधित मुद्दे; GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- डिजिटल माध्यमों और जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के तीव्र विस्तार तथा बच्चों के संज्ञानात्मक विकास, एकाग्रता, भावनात्मक कल्याण और सीखने की क्षमता पर उनके संभावित प्रभावों को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।
डिजिटल प्रौद्योगिकियों के बारे में
- डिजिटल प्रौद्योगिकियों में स्मार्टफोन, सामाजिक माध्यम, ऑनलाइन खेल, शैक्षिक अनुप्रयोग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित मंच शामिल हैं।
- यद्यपि ये सूचना तक पहुँच, व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा और रचनात्मकता को बढ़ावा देते हैं, तथापि बच्चों के जीवन में इनकी बढ़ती भूमिका के कारण अत्यधिक समय तक पर्दे देखने और स्वचालित सहायता पर निर्भरता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।
विकसित होते मस्तिष्क को समझना
- बचपन और किशोरावस्था के दौरान मस्तिष्क की संरचना और कार्यप्रणाली में व्यापक परिवर्तन होते हैं।
- मस्तिष्क का अग्रललाट प्रांतस्था , जो एकाग्रता, कार्यशील स्मृति, योजना बनाने और आवेगों पर नियंत्रण के लिए उत्तरदायी है, प्रारंभिक वयस्कावस्था तक विकसित होता रहता है।
- तंत्रिका-लचीलापन अर्थात् अनुभवों के आधार पर मस्तिष्क की स्वयं को अनुकूलित करने की क्षमता, युवाओं को अपने परिवेश के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है।
- परिणामस्वरूप, डिजिटल अनुभव संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित कर सकते हैं। हालाँकि, वर्तमान शोध से यह प्रमाणित नहीं हुआ है कि पर्दे के संपर्क में आने से अनिवार्य रूप से हानिकारक तंत्रिका संबंधी परिवर्तन होते हैं।
विकसित होते मस्तिष्क के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकी के पक्ष में तर्क
- सीखने की क्षमता में वृद्धि: डिजिटल मंच विविध शैक्षिक सामग्री और व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप सीखने के अवसर उपलब्ध कराते हैं।
- संज्ञानात्मक अनुकूलनशीलता: संज्ञानात्मक रूप से अनुकूलन करने की क्षमता सूचना को छाँटने तथा डिजिटल परिवेश में कार्य करने के लिए आवश्यक तकनीकी दक्षता विकसित करने में सहायक हो सकती है।
- रचनात्मकता एवं सहयोग: डिजिटल उपकरण बच्चों को सामग्री तैयार करने, अपने विचार साझा करने और भौगोलिक सीमाओं से परे एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करने के अवसर प्रदान करते हैं।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सहायित अधिगम: जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उचित उपयोग विचार-मंथन, प्रतिपुष्टि प्राप्त करने और अवधारणाओं को समझने में सहायता कर सकता है।
- इस प्रकार, प्रौद्योगिकी पारंपरिक शिक्षा की पूरक बन सकती है और बच्चों को अधिक डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करने में सहायता कर सकती है।
विकसित होते मस्तिष्क के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकी के विपक्ष में तर्क
- एकाग्रता का विखंडन: लघु वीडियो, अंतहीन रूप से सामग्री को आगे बढ़ाने की सुविधा, स्वचालित वीडियो संचालन और कलन-विधि (एल्गोरिदम) द्वारा सुझाई गई सामग्री उपयोगकर्ताओं को लगातार संलग्न रखती है। इससे एक कार्य से दूसरे कार्य पर शीघ्रता से जाने की प्रवृत्ति बढ़ती है और एकाग्रता खंडित होती है।
- भावनात्मक संवेदनशीलता: किशोरों की भावनात्मक संवेदनशीलता सामाजिक तुलना, ऑनलाइन स्वीकृति की चाह और साइबर उत्पीड़न से प्रभावित हो सकती है। इससे उनके आत्मसम्मान और मनोवैज्ञानिक कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
- संज्ञानात्मक कार्यों का बाह्य हस्तांतरण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा तैयार उत्तरों पर अत्यधिक निर्भरता स्वतंत्र तर्क, आलोचनात्मक चिंतन और समस्या-समाधान की क्षमता को कमजोर कर सकती है, विशेषकर तब, जब विद्यार्थी स्वयं सीखने की प्रक्रिया से बचने लगते हैं।
- चिंतन-मनन में कमी: निरंतर उत्तेजनाओं के कारण ऊब, कल्पनाशीलता, आत्मचिंतन और रचनात्मक अन्वेषण के अवसर कम हो जाते हैं।
- दैनिक दिनचर्या में व्यवधान: मनोरंजन के लिए पर्दे पर अत्यधिक समय बिताने से नींद के समय में कमी, शारीरिक गतिविधियों की उपेक्षा और आमने-सामने संवाद के अवसरों में गिरावट आ सकती है।
- इन प्रभावों का निर्धारण केवल पर्दे के सामने बिताए गए समय से नहीं होता, बल्कि देखी जाने वाली सामग्री, उपयोग की अवधि, परिवेश और व्यक्ति की परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।
भारत की स्थिति
- भारत में 25 वर्ष से कम आयु के लगभग 65 करोड़ लोग हैं और यहाँ विश्व के सबसे बड़े डिजिटल पारितंत्रों में से एक विद्यमान है।
- कोविड-19 महामारी के कारण बच्चे ऑनलाइन शिक्षा और मनोरंजन पर अधिक निर्भर हो गए।
- जनसांख्यिकीय परिवर्तन के संदर्भ में भारत के सामने दो प्रमुख चुनौतियाँ हैं—डिजिटल विभाजन को दूर करना और प्रौद्योगिकी पर अस्वस्थ निर्भरता को रोकना।
- उपकरणों तक असमान पहुँच, डिजिटल साक्षरता का अभाव और माता-पिता की अपर्याप्त निगरानी इस समस्या को अधिक जटिल बनाती है।
भारत एवं विश्व स्तर पर संबंधित प्रमुख उपाय और प्रयास
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 तथा सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्थाओं के दिशा-निर्देश और डिजिटल माध्यम आचार संहिता) नियम, 2021: संशोधित प्रावधानों सहित इनका उद्देश्य बच्चों समेत सभी उपयोगकर्ताओं के लिए सुरक्षित, संरक्षित और जवाबदेह ऑनलाइन वातावरण सुनिश्चित करना है।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023: यह बच्चों के व्यक्तिगत आँकड़ों की सुरक्षा से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है। इसमें लागू प्रावधानों और छूटों के अधीन माता-पिता की सहमति की आवश्यकताएँ भी शामिल हैं।
- राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR): इसने ऑनलाइन सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई संसाधन विकसित किए हैं। इनमें शामिल हैं:
- बच्चों, माता-पिता, शिक्षकों और आम जनता में जागरूकता बढ़ाने के लिए ‘ऑनलाइन सुरक्षित रहें’ दिशा-निर्देश।
- विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा से संबंधित पुस्तिका, जिसमें साइबर उत्पीड़न की रोकथाम के दिशा-निर्देश भी शामिल हैं।
- वर्ष 2024 में जारी स्कूली बच्चों के लिए साइबर उत्पीड़न की रोकथाम संबंधी दिशा-निर्देश।
- ‘इंटरनेट की सुविधा वाले मोबाइल फोन एवं अन्य उपकरणों के उपयोग का बच्चों पर प्रभाव (शारीरिक, व्यवहारगत एवं मनोसामाजिक)’ विषय पर राष्ट्रीय स्तर का अध्ययन, जिसका उद्देश्य ऐसे उपकरणों के उपयोग से बच्चों पर पड़ने वाले शारीरिक, व्यवहारगत और मनोसामाजिक प्रभावों को समझना है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020: समग्र विकास के महत्त्व को स्वीकार करते हुए डिजिटल शिक्षा पर बल देती है।
- प्रज्ञता दिशा-निर्देश, 2020: डिजिटल शिक्षा के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इनमें ऑनलाइन शिक्षण के लिए आयु के अनुरूप सुझाव भी शामिल हैं।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देश, 2019: पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए निष्क्रिय रूप से पर्दे देखने के समय को सीमित करने की सिफारिश करते हैं।
- यूनिसेफ के बच्चों के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता संबंधी नीतिगत दिशा-निर्देश, 2021: बाल-केंद्रित, सुरक्षित और समावेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास को प्रोत्साहित करते हैं।
आगे की राह: उपायों को सुदृढ़ बनाना
- परिवार: भोजन के समय उपकरणों से दूरी, अध्ययन के लिए निर्धारित समय, स्वस्थ नींद की दिनचर्या और बाहरी खेलकूद के अवसर सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
- विद्यालय: स्वतंत्र लेखन, मौखिक परीक्षाओं, व्यावहारिक समस्या-समाधान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से जिम्मेदारीपूर्वक सीखने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- सरकार: बच्चों को लक्षित करने वाले डिजिटल मंचों के लिए आयु-अनुकूल सुरक्षा उपायों, निजता संरक्षण और जवाबदेही व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- प्रौद्योगिकी कंपनियाँ: सामग्री की अनुशंसा करने वाली कलन-विधियों में पारदर्शिता बढ़ाई जानी चाहिए तथा उपयोगकर्ताओं को अनावश्यक रूप से बाँधे रखने वाले चालाकीपूर्ण तंत्रों को कम किया जाना चाहिए।
- अनुसंधान संस्थान: भारतीय बच्चों में डिजिटल संपर्क, संज्ञानात्मक विकास और भावनात्मक विकास के बीच संबंधों का अध्ययन करने के लिए दीर्घकालिक अनुसंधान को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
- डिजिटल साक्षरता: बच्चों, माता-पिता और शिक्षकों को प्रौद्योगिकी के जिम्मेदार उपयोग, भ्रामक सूचनाओं की पहचान तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सीमाओं के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- भारत का उद्देश्य प्रौद्योगिकी को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके उपयोग को अधिक मानवीय बनाना होना चाहिए। विकसित होते मस्तिष्क को सूचना के साथ चिंतन-मनन, सहायता के साथ स्वतंत्र प्रयास और डिजिटल सहभागिता के साथ वास्तविक जीवन के अनुभवों की भी आवश्यकता है।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] संज्ञानात्मक विकास, सीखने की प्रक्रिया और भावनात्मक कल्याण पर डिजिटल प्रौद्योगिकियों के प्रभाव का परीक्षण कीजिए तथा इस डिजिटल संक्रमण से जुड़ी संभावनाओं एवं चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। |
स्रोत: TH
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