पाठ्यक्रम: GS2/ शासन
संदर्भ
- आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने गाडे साई कृष्णा की कथित अभिरक्षागत मृत्यु की जाँच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने का आदेश दिया।
उच्च न्यायालय के निर्णय के प्रमुख बिंदु
- आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा कि नागरिकों के मानवाधिकारों को लागू करना तथा संज्ञेय अपराध करने के आरोपी किसी भी व्यक्ति, जिसमें स्वयं सरकारी अधिकारी भी शामिल हैं, के विरुद्ध निष्पक्ष एवं न्यायसंगत जाँच सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है।
- कुछ परिस्थितियों में अपराध का साक्षी भी संरक्षण की माँग कर सकता है और राज्य द्वारा उसे सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
- न्यायालय ने प्रभावी निवारक उपायों के रूप में निम्नलिखित कदम सुझाए:
- पुलिस प्रशिक्षण को इस प्रकार पुनर्गठित करना, जिससे पुलिसकर्मियों में मानवाधिकारों को पहचानने और उनका सम्मान करने की आवश्यक मानसिकता विकसित हो।
- अधीनस्थ स्तर के पुलिस अधिकारियों के कार्यों की निरंतर निगरानी करना, ताकि जाँच की वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित किया जा सके।
- सभी अपराधों से संबंधित प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) के शीघ्र पंजीकरण के लिए सरल एवं त्रुटिरहित प्रक्रियाएँ लागू करना तथा अभिलेखों में हेरफेर, प्रविष्टियाँ जोड़ने, प्रतिस्थापन और पूर्व दिनांक अंकित करने जैसी अनियमितताओं को रोकने के लिए पुलिस को अभिलेखों के रखरखाव की आधुनिक विधियों से सुसज्जित करना। यह व्यवस्था प्रथम सूचना रिपोर्ट, मृत्यु-समीक्षा कार्यवाही, शव-परीक्षण रिपोर्ट आदि के संबंध में भी लागू होनी चाहिए।
अभिरक्षागत मृत्यु क्या है?
- अभिरक्षागत मृत्यु से तात्पर्य किसी व्यक्ति की पुलिस या न्यायिक अभिरक्षा के दौरान होने वाली मृत्यु से है। यह मृत्यु मुकदमे की सुनवाई से पहले, पुलिस पूछताछ के दौरान अथवा दोषसिद्धि के बाद हो सकती है।
- ऐसी मृत्यु यातना, लापरवाही, चिकित्सा सहायता से वंचित किए जाने अथवा संदिग्ध परिस्थितियों के कारण भी हो सकती है।
- यह निम्नलिखित संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है:
- अनुच्छेद 20(1): किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित दंड से अधिक दंड नहीं दिया जा सकता।
- अनुच्छेद 20(3): स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य किए जाने से संरक्षण प्रदान करता है। दबाव या उत्पीड़न के अंतर्गत प्राप्त कोई भी स्वीकारोक्ति विधि के अनुसार अग्राह्य होती है।
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है, जिसमें पुलिस एवं न्यायिक अभिरक्षा में रहने वाले व्यक्तियों का संरक्षण भी शामिल है।
- अनुच्छेद 22: व्यक्तियों को मनमानी गिरफ्तारी और निरोध के विरुद्ध मौलिक सुरक्षा उपाय प्रदान करता है।
- भारत में अभिरक्षागत मृत्युएँ : संसदीय आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2016-17 से 2021-22 के बीच पूरे भारत में अभिरक्षा के दौरान कुल 11,656 मृत्युएँ दर्ज की गईं।
- उत्तर प्रदेश 2,630 मृत्युओं के साथ सूची में शीर्ष पर रहा, जबकि दक्षिणी राज्यों में तमिलनाडु में ऐसी मृत्युओं की संख्या सर्वाधिक दर्ज की गई।
- राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (NCRB) के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 के शुरुआती 74 दिनों में देशभर में अभिरक्षा के दौरान कुल 170 मृत्युएँ दर्ज की गईं, जो विगत वर्ष के 140 मामलों के आँकड़े से अधिक हैं।
- बिहार सूची में शीर्ष पर रहा, जिसके बाद राजस्थान और उत्तर प्रदेश का स्थान था।
भारत में अभिरक्षागत मृत्युओं की अधिक संख्या के कारण
- प्रक्रियागत खामियाँ और विलंब: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) मामले में अभिरक्षा में दुर्व्यवहार को रोकने के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित किए थे। इन दिशा-निर्देशों के बावजूद, न्यायालय प्रायः मजिस्ट्रेटी जाँच और अन्य प्रक्रियाओं पर निर्भर रहते हैं, जिससे मामलों के निपटारे में विलंब होता है।
- कमजोर जवाबदेही: अभिरक्षागत मृत्युओं की जाँच में प्रायः स्वतंत्रता का अभाव होता है, क्योंकि जाँच उसी पुलिस विभाग द्वारा की जाती है जिस पर घटना में संलिप्त होने का आरोप होता है। न्यायिक जाँच में प्रायः विलंब होता है, पारदर्शिता की कमी रहती है और निर्णायक परिणाम प्राप्त नहीं हो पाते।
- हाशिए पर स्थित एवं संवेदनशील समूह: अधिकांश पीड़ित कमजोर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं। कानूनी जानकारी और संसाधनों की कमी के कारण उनके परिवार न्याय प्राप्त करने के लिए प्रभावी प्रयास नहीं कर पाते।
प्रमुख चिंताएँ
- विधि के शासन का क्षरण: ऐसी घटनाएँ दर्शाती हैं कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन का अधिकार और अनुच्छेद 22 के अंतर्गत मनमानी गिरफ्तारी से संरक्षण जैसे संवैधानिक सुरक्षा उपायों का उल्लंघन हो रहा है। इससे न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास कमजोर होता है।
- मानवाधिकार संबंधी छवि: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) तथा ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्टों में आलोचना का सामना करना पड़ता है। इससे अन्य देशों में मानवाधिकार संबंधी मुद्दों पर भारत की नैतिक विश्वसनीयता कमजोर होती है।
- पुलिस-राज की धारणा: अभिरक्षागत मृत्युओं की अधिक संख्या से भारत की छवि कल्याणोन्मुख लोकतंत्र के बजाय पुलिस-राज वाले देश के रूप में बन सकती है।
- कमजोर आपराधिक न्याय व्यवस्था: ऐसी घटनाएँ आधुनिक पुलिस व्यवस्था, न्यायवैज्ञानिक तकनीकों और प्रौद्योगिकी-आधारित तरीकों को अपनाने में विद्यमान अक्षमता को उजागर करती हैं।
संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय विधिक ढाँचे
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर (1945): इसमें संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों और सिद्धांतों का उल्लेख है, जिनमें मानवाधिकारों को बढ़ावा देना भी शामिल है।
- मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (1948): यह यातना का निषेध करती है और निर्दोषता की उपधारणा सुनिश्चित करती है।
- नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय अभिसमय (1966): यह जीवन के अधिकार की रक्षा करता है और यातना पर प्रतिबंध लगाता है।
- नेल्सन मंडेला नियम: आधिकारिक रूप से इन्हें ‘कैदियों के साथ व्यवहार के लिए संयुक्त राष्ट्र के मानक न्यूनतम नियम, 2015’ कहा जाता है। ये स्वतंत्रता से वंचित सभी व्यक्तियों के साथ मानवीय व्यवहार के लिए न्यूनतम मानक निर्धारित करते हैं।
- मानवाधिकारों पर यूरोपीय अभिसमय (1950): यह व्यक्ति की गरिमा और न्याय तक पहुँच के तंत्र को मान्यता देता है।
सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय एवं सुधार संबंधी सिफारिशें
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय:
- नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य (1993): न्यायालय ने स्थापित किया कि यदि अभिरक्षा में हिंसा के माध्यम से किसी व्यक्ति के जीवन के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन होता है, तो पीड़ित के परिवार को आर्थिक क्षतिपूर्ति देने के लिए राज्य का कठोर दायित्व बनता है।
- डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997): सर्वोच्च न्यायालय ने प्रत्येक गिरफ्तारी के लिए 11 अनिवार्य आवश्यकताएँ निर्धारित कीं। इनमें पूछताछ करने वाले अधिकारियों के स्पष्ट पहचान-पत्र प्रदर्शित करना, कम-से-कम एक साक्षी द्वारा हस्ताक्षरित औपचारिक गिरफ्तारी ज्ञापन तैयार करना, 8 से 12 घंटे के अंदर किसी परिजन को गिरफ्तारी की सूचना देना तथा अभिरक्षा के दौरान प्रत्येक 48 घंटे में चिकित्सकीय परीक्षण कराना शामिल है।
- प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) के निर्देश: पक्षपात से बचने के लिए नियमित कानून-व्यवस्था संबंधी कार्यों से अन्वेषण शाखा को अलग करने का निर्देश दिया गया। साथ ही, अभिरक्षागत मृत्यु जैसे गंभीर कदाचार के मामलों की जाँच के लिए राज्य और जिला स्तर पर पुलिस शिकायत प्राधिकरणों (PCAs) की स्थापना अनिवार्य की गई।
- परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह (2020): सर्वोच्च न्यायालय ने प्रौद्योगिकी के अनिवार्य उपयोग का स्पष्ट निर्देश दिया। इसके अंतर्गत पूछताछ कक्षों में सीसीटीवी निगरानी, पूछताछ के डिजिटल अभिलेख तथा शरीर पर लगाए जाने वाले कैमरों के उपयोग को सामान्य प्रक्रिया बनाने पर बल दिया गया।
- भारत के विधि आयोग की रिपोर्टें एवं सिफारिशें:
- 69वीं रिपोर्ट (1977): वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष की गई स्वीकारोक्तियों से संबंधित साक्ष्य नियमों में सुधार का प्रस्ताव दिया गया, ताकि स्वीकारोक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से अपनाई जाने वाली तृतीय-डिग्री यातना जैसी विधियों को प्रोत्साहित करने वाली संरचनात्मक परिस्थितियों को रोका जा सके।
- संयुक्त राष्ट्र यातना-विरोधी अभिसमय के कार्यान्वयन पर 273वीं रिपोर्ट (2017): भारत में अभिरक्षागत यातना को अपराध घोषित करने और उसका व्यवस्थित उन्मूलन सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक एवं समर्पित घरेलू कानून बनाने की सिफारिश की गई।
- अभिरक्षागत अपराधों के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष रूप से समर्पित त्वरित न्यायालयों की स्थापना पर बल दिया गया, ताकि मुकदमे वर्षों तक लंबित न रहें।
- प्रत्यक्ष संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए संलिप्त लोक अधिकारियों के विरुद्ध कठोर आपराधिक दंड, आजीवन कारावास तक, तथा उपयुक्त आर्थिक दंड की सिफारिश की गई।
- आपराधिक कानूनों में सुधार (2023): भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 ने दंड प्रक्रिया संहिता का स्थान लिया। इसमें गिरफ्तारी की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता, न्यायवैज्ञानिक विधियों के उपयोग और नागरिक-केंद्रित प्रक्रियाओं से संबंधित प्रावधान शामिल किए गए हैं।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA), 2023 दंड संबंधी और साक्ष्य संबंधी कानूनों का आधुनिकीकरण करते हैं तथा स्वीकारोक्ति-आधारित पुलिसिंग पर निर्भरता कम करने में सहायक हैं।
निष्कर्ष
- मौलिक अधिकारों, कानूनी सुरक्षा उपायों और सर्वोच्च न्यायालय के महत्त्वपूर्ण निर्णयों के बावजूद, भारत में अभिरक्षागत दुर्व्यवहार और मृत्युओं की घटनाएँ जारी हैं।
- भारत को अपने संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अनुरूप कार्य करना चाहिए।
- विधि आयोग की विभिन्न रिपोर्टों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में व्यक्त विचारों के अनुरूप, संसद को एक व्यापक यातना-विरोधी कानून बनाना चाहिए, संस्थागत व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करना चाहिए तथा जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए।
स्रोत: TH
Previous article
बच्चों के लिए इंटरनेट तक पहुँच का मौलिक अधिकार
Next article
अमेरिका–रूस डीज़ल समझौता