पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- सोशल मीडिया पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार संबंधी सामग्री (CSEAM) के प्रसार से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों के इंटरनेट तक पहुँचने के अधिकार को मान्यता दी।
सर्वोच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ
- न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट तक पहुँचने और उसका उपयोग करने का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 21 को अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ पढ़ने पर, एक मौलिक अधिकार है।
- बच्चों को उनकी आयु की परवाह किए बिना संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं तथा केवल नाबालिग होने के आधार पर उनके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
- प्रस्तावित सुरक्षा उपाय:
- सरकार को प्रमाणित आपत्तिजनक सामग्री से संबंधित डिजिटल पहचान-सूचकों और यूआरएल का एक आँकड़ा-संग्रह तैयार करने का निर्देश दिया गया, ताकि ऐसी सामग्री की पहचान और उसे हटाने की प्रक्रिया को सुगम बनाया जा सके।
- सरकार को ऐसी सामग्री का पता लगाने और उसे हटाने के लिए दृश्य-प्रतिरूप हैश मिलान, यूआरएल सूचीकरण तथा अन्य प्रौद्योगिकीय उपायों से संबंधित दिशा-निर्देश एवं मानक संचालन प्रक्रियाएँ तैयार करने का निर्देश दिया गया।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि सहमति के बिना तैयार की गई, यौन शोषण से संबंधित तथा दुर्व्यवहारपूर्ण सामग्री के लिए इंटरनेट पर कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 21: यह जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है। न्यायालय ने इस अधिकार को इंटरनेट तक पहुँच से संबद्ध किया।
- अनुच्छेद 19(1)(a): यह वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इसमें डिजिटल मंचों के माध्यम से सूचना प्राप्त करने और उसका संचार करने से संबंधित संवैधानिक हित भी शामिल हैं।
- अनुच्छेद 19(2): यह संवैधानिक आवश्यकताओं के अधीन, निर्दिष्ट आधारों पर वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।
सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय
- अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट के माध्यम से वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा व्यापार या व्यवसाय करने की स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(g) के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है।
- प्रज्ञा प्रसून बनाम भारत संघ (2025) में न्यायालय ने कहा कि डिजिटल ग्राहक पहचान सत्यापन (KYC) से दिव्यांग व्यक्तियों को बाहर रखना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। न्यायालय ने यह भी कहा कि “डिजिटल पहुँच का अधिकार, जीवन के अधिकार का एक अंतर्निहित घटक है।”
- सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव बनाम बंगाल क्रिकेट संघ (1995) में न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 19(1)(a) में “जानने तथा सूचना और विचारों को प्राप्त करने एवं प्रसारित करने का अधिकार” शामिल है।
बच्चों में इंटरनेट के उपयोग के लाभ
- सूचना तक पहुँच: डिजिटल मंच बच्चों को शैक्षिक संसाधन उपलब्ध कराते हैं तथा कक्षा से परे विभिन्न विषयों का अन्वेषण करने के अवसर प्रदान करते हैं।
- कौशल विकास: इंटरनेट का उपयोग डिजिटल कौशल, कौशल उन्नयन, रचनात्मक अभिव्यक्ति और सहयोगात्मक अधिगम को प्रोत्साहित करता है।
- सामाजिक संपर्क: डिजिटल मंच संचार, सामुदायिक संबंधों के निर्माण और समवयस्कों के साथ सहभागिता को सुगम बनाते हैं।
इंटरनेट के उपयोग से संबंधित चिंताएँ
- सामाजिक अलगाव: आभासी संपर्क आमने-सामने होने वाले संवाद का स्थान ले लेता है, जिससे वास्तविक जीवन के संबंध और पारिवारिक जुड़ाव कमजोर हो सकते हैं।
- इंटरनेट व्यसन विकार (IAD): बाध्यकारी उपयोग के कारण व्यक्ति अपने व्यवहार पर नियंत्रण खो सकता है, उपयोग न कर पाने पर व्यग्रता जैसे लक्षण अनुभव कर सकता है तथा वास्तविक जीवन के दायित्वों की उपेक्षा कर सकता है।
- शारीरिक स्वास्थ्य एवं कल्याण: इंटरनेट का अत्यधिक या अनियंत्रित उपयोग नींद में बाधा डालता है, भावनात्मक नियंत्रण को प्रभावित करता है तथा बच्चों की दैनिक दिनचर्या में व्यवधान उत्पन्न करता है।
- ऑनलाइन शोषण: अजनबियों के साथ संपर्क, साइबर उत्पीड़न, प्रतिरूपण और अनुचित सामग्री बच्चों को उत्पीड़न तथा अन्य प्रकार की हानि के जोखिम में डाल सकते हैं।
- लिंग-आधारित डिजिटल विभाजन: लड़कों की इंटरनेट तक अधिक पहुँच और स्वतंत्रता उन्हें ऑनलाइन जोखिमों के प्रति अधिक उजागर कर सकती है, जबकि लड़कियों की इंटरनेट तक पहुँच पर प्रतिबंध उनकी डिजिटल साक्षरता और ऑनलाइन स्वयं की सुरक्षा करने की क्षमता को सीमित करते हैं।
ऑस्ट्रेलिया का सामाजिक मीडिया हेतु न्यूनतम आयु संबंधी कानून
- ऑनलाइन सुरक्षा संशोधन (सामाजिक मीडिया हेतु न्यूनतम आयु) अधिनियम, 2024 को वर्ष 2025 में पारित किया गया। इसके अंतर्गत 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को निर्दिष्ट सामाजिक मीडिया मंचों पर खाते बनाने या रखने से पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया।
- कार्यान्वयन: ऑस्ट्रेलिया का ई-सुरक्षा आयुक्त इस व्यवस्था की निगरानी करता है। वहीं, आयु-निर्धारण की विधियाँ उनकी प्रभावशीलता, निजता तथा प्रतिबंधों को दरकिनार किए जाने की संभावना से संबंधित प्रश्न उत्पन्न करती हैं।
आगे की राह
- डिजिटल मंचों पर आयु के अनुरूप पूर्वनिर्धारित सुरक्षा व्यवस्थाएँ, अज्ञात उपयोगकर्ताओं से संपर्क पर प्रतिबंध तथा आसानी से उपलब्ध शिकायत दर्ज करने की सुविधाएँ शामिल की जानी चाहिए।
- ऑनलाइन दुर्व्यवहार से प्रभावित बच्चों को गोपनीय शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था, परामर्श और समय पर कानूनी सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
- विद्यालयों में बच्चों को ऑनलाइन सूचना की विश्वसनीयता का आकलन करने, भ्रामक गतिविधियों की पहचान करने, व्यक्तिगत आँकड़ों की सुरक्षा करने तथा साइबर उत्पीड़न और संदिग्ध संपर्कों से सुरक्षित ढंग से निपटने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
स्रोत: IE
Previous article
2035 तक ‘अति-वृद्ध समाज’ बन जाएगी चीन की राजधानी बीजिंग
Next article
भारत में अभिरक्षा के दौरान होने वाली मृत्युएँ