भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था आगामी 7–8 वर्षों में 400–450 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की संभावना

पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान और प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष

समाचारों में

  • केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, जिसका वर्तमान मूल्य लगभग 9 अरब अमेरिकी डॉलर है, आगामी सात से आठ वर्षों में बढ़कर 40–45 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की संभावना है।

प्रमुख घटनाक्रम

  • संस्थागत सुधार: वर्ष 2020 में एकल-खिड़की प्राधिकरण के रूप में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) की स्थापना तथा वाणिज्यिक इकाई के रूप में न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) के गठन से निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र के द्वार प्रशस्त हैं। अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का ध्यान अनुसंधान, अन्वेषण और क्षमता निर्माण पर केंद्रित है।
  • नीतिगत ढाँचा: भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023 में इसरो, एनएसआईएल और निजी क्षेत्र की भूमिकाएँ निर्धारित की गई हैं। उपग्रह निर्माण और प्रक्षेपण सेवाओं में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति वैश्विक पूँजी के लिए क्षेत्र के खुलेपन को दर्शाती है।
  • निजी क्षेत्र का पारितंत्र: नवोदित उद्यमों की संख्या कुछ से बढ़कर 200 से अधिक हो गई है। स्काईरूट के विक्रम-एस (2022) और अग्निकुल के अग्निबाण ने निजी क्षेत्र की प्रक्षेपण क्षमता का प्रदर्शन किया।
  • पूँजीगत सहायता: अंतरिक्ष क्षेत्र के नवोदित उद्यमों के लिए 1,000 करोड़ रुपये का उद्यम पूँजी कोष प्रारंभिक चरण में वित्तपोषण की उपलब्धता को सुगम बनाने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है।
  • मिशनों की विश्वसनीयता: चंद्रयान-3 की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में सफल लैंडिंग (2023) और आदित्य-एल1 मिशन ने लागत-कुशल अंतरिक्ष शक्ति के रूप में भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को सुदृढ़ किया है।
  • वैश्विक सहयोग: भारत वर्ष 2023 में आर्टेमिस समझौते में शामिल हुआ तथा निसार (NISAR) जैसे मिशनों के माध्यम से अमेरिकी राष्ट्रीय वैमानिकी एवं अंतरिक्ष प्रशासन (NASA) जैसी संस्थाओं के साथ कार्य कर रहा है।

भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का महत्त्व

  • आर्थिक गुणक प्रभाव: भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में उत्पन्न प्रत्येक डॉलर से अर्थव्यवस्था में 2.54 डॉलर का गुणक प्रभाव उत्पन्न होता है। इस क्षेत्र का कार्यबल राष्ट्रीय औद्योगिक औसत की तुलना में 2.5 गुना अधिक उत्पादक है।
    • उपग्रह संचार, नौवहन और पृथ्वी अवलोकन जैसी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी सेवाएँ कृषि, रसद, दूरसंचार और वित्तीय प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों को सहयोग प्रदान करती हैं।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी: यह नवोदित उद्यमों और निजी कंपनियों को प्रक्षेपण यान, उपग्रह तथा अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियाँ विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
  • रणनीतिक स्वायत्तता: यह नौवहन, संचार, मौसम पूर्वानुमान और राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में भारत की क्षमताओं को सुदृढ़ करता है।
  • रोजगार सृजन: इससे अंतरिक्ष एवं वैमानिकी अभियांत्रिकी, संगणक सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स और उन्नत विनिर्माण के क्षेत्रों में कुशल रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं।
  • वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी: वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी केवल लगभग 2 प्रतिशत है। प्रक्षेपण की कम लागत भारत को लघु उपग्रहों और साझा प्रक्षेपण सेवाओं के बाजार में बड़ी हिस्सेदारी प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती है।
  • सौम्य शक्ति: दक्षिण एशिया उपग्रह जैसी अंतरिक्ष कूटनीति संबंधी पहलें तथा वैश्विक दक्षिण के देशों की क्षमता निर्माण संबंधी गतिविधियाँ भारत के रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाती हैं।

राष्ट्र निर्माण में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की भूमिका

  • भूमि प्रशासन: स्वामित्व योजना ग्रामीण क्षेत्रों में संपत्ति अभिलेख तैयार करने के लिए ड्रोन-आधारित मानचित्रण का उपयोग करती है।
  • कृषि: उपग्रह आँकड़े फसल निगरानी, सूखा आकलन और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के अंतर्गत फसल बीमा में सहायता प्रदान करते हैं।
  • आपदा प्रबंधन: इनसैट और सुदूर संवेदन उपग्रह चक्रवातों की निगरानी, बाढ़ मानचित्रण तथा पूर्व चेतावनी जारी करने में सहायता करते हैं।
  • अंतरिक्ष क्षेत्र में महिलाएँ: महिला वैज्ञानिक और अभियंता चंद्रयान सहित इसरो के प्रमुख मिशनों में योगदान देती हैं। उनकी भागीदारी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित (STEM) के क्षेत्रों में लैंगिक समावेशन को बढ़ावा देती है तथा भारत की वैज्ञानिक क्षमताओं को सुदृढ़ करती है।
  • नौवहन और संचार: इसरो की भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (NavIC) क्षेत्रीय स्थिति-निर्धारण, नौवहन और समय-निर्धारण सेवाएँ प्रदान करती है। इससे परिवहन, आपदा प्रबंधन एवं रणनीतिक गतिविधियों को सहायता मिलती है।

चुनौतियाँ

  • विस्तार का अंतर: वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का अनुमानित मूल्य 600 अरब अमेरिकी डॉलर या उससे अधिक है, जिसमें अमेरिका और चीन का प्रभुत्व है। भारत का विकास लक्ष्य वर्तमान सीमित आधार को देखते हुए महत्त्वाकांक्षी है।
  • वित्तपोषण संबंधी बाधाएँ: अंतरिक्ष क्षेत्र के उद्यमों में भारी पूँजी की आवश्यकता होती है और इनके परिणाम प्राप्त होने में लंबा समय लगता है। अमेरिका की तुलना में भारत में निजी निवेश सीमित और जोखिम से बचने वाला है, जबकि वहाँ स्पेसएक्स जैसी कंपनियों ने व्यापक वित्तपोषण के सहारे विस्तार किया है।
  • नियामक कमियाँ: एक व्यापक अंतरिक्ष गतिविधि विधेयक अभी भी लंबित है। दायित्व, अनुज्ञापन, आवृत्ति वर्णक्रम का आवंटन और बीमा जैसे मुद्दों पर स्पष्टता का अभाव है।
  • प्रौद्योगिकीय निर्भरता: महत्त्वपूर्ण घटकों, उन्नत अर्धचालकों और प्रणोदन संबंधी सामग्रियों के लिए अभी भी आयात पर निर्भरता बनी हुई है, जिससे वास्तविक आत्मनिर्भरता सीमित होती है।
  • अंतरिक्ष मलबा और स्थिरता: उपग्रहों की बढ़ती संख्या और कक्षीय भीड़ के कारण टकराव का जोखिम बढ़ रहा है। इससे कक्षीय संसाधनों के उत्तरदायी प्रबंधन की आवश्यकता उत्पन्न होती है।
  • दोहरा उपयोग और सुरक्षा जोखिम: संवेदनशील चित्रों और प्रौद्योगिकी तक निजी क्षेत्र की पहुँच से आँकड़ा सुरक्षा तथा निर्यात नियंत्रण संबंधी चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।

आगे की राह

  • विधायी स्पष्टता: अनुज्ञापन, दायित्व और विवाद समाधान के संबंध में कानूनी निश्चितता प्रदान करने के लिए अंतरिक्ष गतिविधि विधेयक पारित किया जाना चाहिए।
  • वित्तपोषण का विस्तार: सरकारी निवेश कोषों, मिश्रित वित्तपोषण और अनुसंधान एवं विकास के लिए कर प्रोत्साहनों के माध्यम से दीर्घकालिक पूँजी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • घरेलू आपूर्ति शृंखलाएँ: आयात पर निर्भरता कम करने के लिए उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन जैसी योजनाओं के अंतर्गत अंतरिक्ष घटकों के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • माँग सुनिश्चित करना: सरकार द्वारा खरीद के माध्यम से प्रारंभिक माँग सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि नवोदित उद्यमों के जोखिम को कम किया जा सके।
  • कौशल और अनुसंधान के बीच समन्वय: प्रतिभा का एक सुदृढ़ आधार तैयार करने के लिए शिक्षण संस्थानों, उद्योग जगत और इसरो के बीच सहयोग को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
  • अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन: वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप अंतरिक्ष मलबे को कम करने और कक्षीय संसाधनों के सुरक्षित उपयोग के लिए मानदंड विकसित किए जाने चाहिए।

स्रोत: PIB

 

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