पाठ्यक्रम: GS1/ समाज
समाचारों में
- वर्ष 2035 तक बीजिंग के एक ‘अति-वृद्ध समाज’ (Super-Aged Society) बनने का अनुमान है। यह चीन की तीव्रता से वृद्ध होती जनसंख्या, घटती जन्म दर और बढ़ती जीवन प्रत्याशा को दर्शाता है।
अति-वृद्ध समाज क्या है?
- प्रचलित जनसांख्यिकीय वर्गीकरणों के अनुसार, जब किसी जनसंख्या में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की हिस्सेदारी कम-से-कम 10 प्रतिशत हो जाती है, तो उसे वृद्ध होती जनसंख्या वाला समाज माना जाता है।
- जब यह अनुपात 20 प्रतिशत तक पहुँच जाता है, तो उसे वृद्ध समाज तथा 30 प्रतिशत तक पहुँचने पर अति-वृद्ध समाज कहा जाता है।
- वृद्ध होती जनसंख्या के कारण स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन, दीर्घकालिक देखभाल और वृद्ध-अनुकूल अवसंरचना की माँग बढ़ जाती है।
चीन में व्यापक जनसांख्यिकीय परिवर्तन
- 2025 के अंत तक: बीजिंग में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के 52.88 लाख निवासी थे, जो इसकी कुल जनसंख्या का 24.3% थे।
- निम्न प्रजनन दर: चीन की प्रजनन दर लगभग 1.0 से 1.2 है, जो प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से काफी कम है।
- वर्ष 2035 का अनुमान: बीजिंग के 33% से अधिक निवासियों की आयु 60 वर्ष या उससे अधिक होने की संभावना है, अर्थात लगभग प्रत्येक तीन व्यक्तियों में से एक व्यक्ति इस आयु वर्ग का होगा।
जनसंख्या की वृद्धावस्था के पीछे के कारण
- कम जन्म दर और कार्यबल में कमी : चीन की जनसंख्या में वर्ष 2022 से गिरावट आ रही है। एक-संतान नीति (1979 से 2015) और शहरी जीवन-यापन की उच्च लागत ने जन्म दर को निम्न स्तर पर बनाए रखा है।
- बढ़ती दीर्घायु : बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के कारण जीवन प्रत्याशा बढ़कर लगभग 78 वर्ष हो गई है। इससे वृद्ध जनसंख्या का अनुपात बढ़ रहा है, जबकि कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या घट रही है।
- जनसांख्यिकीय संक्रमण : बड़ी संख्या में वृद्ध आयु-वर्ग के लोग सेवानिवृत्ति की आयु में प्रवेश कर रहे हैं।
वृद्ध समाज के निहितार्थ
- कार्यबल में कमी : कार्यबल के आकार में कमी से मजदूरी बढ़ती है और विनिर्माण क्षेत्र में लागत संबंधी प्रतिस्पर्धात्मक लाभ कमजोर होता है। इससे कंपनियाँ स्वचालन अपनाने तथा भारत और वियतनाम जैसी कम लागत वाली अर्थव्यवस्थाओं में स्थानांतरण करने की ओर प्रेरित होती हैं।
- राजकोषीय दबाव : पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी व्यय बढ़ता है, जबकि अंशदान करने वाले लोगों की संख्या घटती है।
- बचत और आर्थिक विकास में कमी : वृद्ध जनसंख्या की बचत में कमी आती है तथा उपभोग के स्वरूप में बदलाव होता है, जिससे निवेश और संभावित GDP वृद्धि प्रभावित होती है।
- नए अवसर : ‘सिल्वर इकोनॉमी’ में स्वास्थ्य सेवाएँ, सहायक आवास, बीमा और वृद्धावस्था संबंधी प्रौद्योगिकी शामिल हैं, जो नए बाजारों के सृजन में योगदान देते हैं।
- वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ : चीन की वृद्ध होती जनसंख्या ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति को गति देती है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स और विनिर्माण क्षेत्रों में भारत के लिए अवसर बढ़ते हैं।
भारत की स्थिति
- लाभ प्राप्त करने का अवसर : भारत की मध्यिका आयु लगभग 28 वर्ष है और इसका जनसांख्यिकीय लाभांश लगभग 2040 के दशक तक बना रहने की संभावना है।
- वृद्धावस्था की प्रक्रिया जारी : वर्ष 2022 में भारत की 60 वर्ष और उससे अधिक आयु की जनसंख्या लगभग 10.5% थी, जिसके वर्ष 2050 तक लगभग 20% होने का अनुमान है (भारत वृद्धावस्था रिपोर्ट, 2023)। NFHS-5 के अनुसार, भारत की प्रजनन दर (2.0) पहले ही प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ चुकी है।
- क्षेत्रीय असमानता : दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या अधिक तीव्रता से वृद्ध हो रही है। वर्ष 2030 के मध्य तक केरल में वृद्ध जनसंख्या की हिस्सेदारी 20% से अधिक होने का अनुमान है, जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश में युवा जनसंख्या का अनुपात अधिक बना रहेगा। इससे राजकोषीय भार और प्रवासन का दबाव असमान रूप से बढ़ता है।
- मौजूदा नीतिगत ढाँचा : राष्ट्रीय वृद्धजन नीति (1999), माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम (2007), राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) के अंतर्गत पेंशन, अटल वयो अभ्युदय योजना तथा आयुष्मान भारत PM-JAY (जिसका विस्तार वर्ष 2024 में 70 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों तक किया गया)।
भारत के समक्ष चुनौतियाँ
- समृद्ध होने से पहले वृद्ध होना: भारत की प्रति व्यक्ति आय चीन की तुलना में काफी कम है। इसलिए भारत को सीमित राजकोषीय क्षमता और कमजोर सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के साथ जनसंख्या की वृद्धावस्था का सामना करना पड़ सकता है।
- पेंशन का अभाव : लगभग 90% श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं और उनमें से केवल एक छोटे हिस्से को पेंशन का लाभ प्राप्त है। इसलिए विशेष रूप से महिलाओं में वृद्धावस्था की गरीबी का वास्तविक जोखिम है।
- स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव : गैर-संचारी रोग, डिमेंशिया (मनोभ्रंश) और वृद्धावस्था संबंधी स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित क्षमता स्वास्थ्य व्यय को बढ़ाती है। स्वास्थ्य सेवाओं पर आउट ऑफ व्यय अभी भी अधिक है।
- कौशल और रोजगार के बीच असंगति : यदि युवाओं को रोजगार योग्य कौशल प्राप्त नहीं होते, तो जनसांख्यिकीय लाभांश का समुचित उपयोग नहीं हो पाएगा। महिलाओं की कम श्रमबल भागीदारी इस समस्या को अधिक गंभीर बनाती है।
भारत के लिए आगे की राह
- वर्तमान में जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग: कौशल भारत और उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के अंतर्गत कौशल विकास, विनिर्माण तथा महिलाओं की श्रमबल भागीदारी में निवेश किया जाना चाहिए।
- सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा : अटल पेंशन योजना, राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) तथा सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 का विस्तार गिग और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों तक करना एक प्रभावी कदम है।
- वृद्धावस्था संबंधी स्वास्थ्य सेवाएँ : जिला अस्पतालों में वृद्धावस्था चिकित्सा की विशेष इकाइयाँ स्थापित की जानी चाहिए तथा दीर्घकालिक देखभाल बीमा और घर-आधारित देखभाल को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- सिल्वर इकोनॉमी : लचीली कार्य व्यवस्था के माध्यम से वरिष्ठ नागरिकों के लिए आवासीय सुविधाओं, सहायक प्रौद्योगिकी और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- विकेंद्रीकृत नियोजन : क्षेत्रीय स्तर पर वृद्धावस्था से संबंधित असमानताओं को दूर करने के लिए वित्त आयोग के अंतरणों और राज्य-विशिष्ट रणनीतियों का उपयोग किया जाना चाहिए।
- पूर्वी एशिया से सीख : जनसंख्या संबंधी दमनकारी नीतियों से बचना चाहिए। इसके स्थान पर बाल देखभाल, आवास और कार्यस्थल संबंधी सहायक नीतियों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- यद्यपि चीन की वृद्ध होती जनसंख्या वैश्विक विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में भारत के लिए नए अवसर उत्पन्न कर सकती है, फिर भी भारत को उत्पादक रोजगार सृजित करने, कौशल में सुधार करने, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और अपनी भावी जनसांख्यिकीय वृद्धावस्था के लिए तैयारी करने की आवश्यकता है।
स्रोत:Firstpost
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