विदेशी निवेश और कर संप्रभुता के बीच संतुलन

पाठ्यक्रम: GS2/ शासन; GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारत जब अपने द्विपक्षीय निवेश समझौतों (BITs) पर पुनः बातचीत कर उन्हें औपचारिक रूप दे रहा है, तब उसके सामने विदेशी निवेशकों के हितों की रक्षा करने और कर नीति निर्धारित करने के अपने संप्रभु अधिकार को बनाए रखने की चुनौती है।

द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) क्या है?

  • BIT दो देशों के बीच ऐसे समझौते हैं, जो एक देश के निवेशकों द्वारा दूसरे देश के क्षेत्र में किए गए निवेश की सुरक्षा के लिए नियम निर्धारित करते हैं।
  • इनका उद्देश्य निवेशकों को सरकारी मनमानी, भेदभावपूर्ण व्यवहार और गैरकानूनी अधिग्रहण से सुरक्षा प्रदान करके एक पूर्वानुमेय एवं स्थिर निवेश वातावरण सुनिश्चित करना है।
  • BIT के अंतर्गत निवेशक-राज्य विवाद निपटान (ISDS) की सुविधा भी प्रदान की जा सकती है। इसके माध्यम से पात्र विदेशी निवेशक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अधिकरणों के समक्ष मेजबान देश के विरुद्ध दावे प्रस्तुत कर सकते हैं।

द्विपक्षीय निवेश संधियों की प्रमुख विशेषताएँ

  • राष्ट्रीय व्यवहार : विदेशी निवेशकों को घरेलू निवेशकों की तुलना में कम अनुकूल व्यवहार नहीं दिया जाता।
  • निष्पक्ष एवं न्यायसंगत व्यवहार (FET): निवेशकों को मेजबान देश की मनमानी या भेदभावपूर्ण कार्रवाइयों से संरक्षण प्रदान किया जाता है।
  • निधियों का स्वतंत्र हस्तांतरण : निवेशक लागू नियमों के अधीन लाभ, लाभांश और पूँजी को एक देश से दूसरे देश में हस्तांतरित कर सकते हैं।
  • विवाद निपटान तंत्र : यह निवेशकों और मेजबान देशों अथवा विभिन्न देशों के बीच विवादों के समाधान के लिए प्रक्रियाएँ निर्धारित करता है।

BIT के संदर्भ में भारत की प्रगति

  • भारत के BIT ढाँचे का विकास: भारत ने वर्ष 1993 में अपना प्रथम मॉडल BIT अपनाया, जिसमें वर्ष 2003 में संशोधन किया गया।
    • अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से संबंधित कई विवादों के बाद, भारत ने दिसंबर 2015 में एक नया मॉडल BIT अपनाया, जो वर्ष 2016 में प्रभावी हुआ।
  • हाल के घटनाक्रम: भारत ने बेलारूस, किर्गिज गणराज्य, संयुक्त अरब अमीरात, उज़्बेकिस्तान और ब्राज़ील जैसे देशों के साथ BIT अथवा निवेश समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। ब्राज़ील के साथ समझौता निवेश सहयोग एवं सुविधा संधि के माध्यम से किया गया है।
    • केंद्रीय बजट 2025–26 में सरकार ने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करते हुए निवेशकों के लिए अधिक अनुकूल बनाने के उद्देश्य से BIT ढाँचे की समीक्षा की घोषणा की।

कर संप्रभुता का मुद्दा महत्त्वपूर्ण क्यों है?

  • कर संप्रभुता से तात्पर्य किसी राज्य के उस अधिकार से है, जिसके अंतर्गत वह अपने घरेलू कानूनी ढाँचे और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अनुरूप कर नीतियाँ निर्धारित करता है, कर लगाता है तथा कर कानूनों को लागू करता है।
  • सरकारों को राजस्व एकत्रण , सार्वजनिक व्यय का वित्तपोषण करने, कर अपवंचन को रोकने और यह सुनिश्चित करने के लिए इस अधिकार की आवश्यकता होती है कि व्यवसाय अर्थव्यवस्था में उचित योगदान दें।
  • हालाँकि, विदेशी निवेशक कुछ कर उपायों को निवेश संधियों के अंतर्गत चुनौती दे सकते हैं, यदि उन्हें लगता है कि ऐसे उपाय संधि के तहत प्राप्त संरक्षण का उल्लंघन करते हैं। इससे निवेशक संरक्षण और राज्य की नियामक शक्तियों के बीच संभावित टकराव उत्पन्न हो सकता है।

BIT से संबंधित चिंताएँ

  • असमान व्यवहार: विदेशी निवेशकों को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता तक पहुँच प्राप्त हो सकती है, जबकि घरेलू निवेशकों को सामान्यतः घरेलू न्यायालयों के माध्यम से उपचार प्राप्त करना पड़ता है।
  • कर संप्रभुता के लिए जोखिम: निवेशक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के माध्यम से सरकारी कर संबंधी निर्णयों को चुनौती दे सकते हैं, जिससे कर नीतियाँ निर्धारित करने और लागू करने की राज्य की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।
  • भारत की कर विवाद निपटान नीति से असंगति: BIT के अंतर्गत कर विवादों की अनुमति देना, घरेलू कानूनों और कर संधियों में निर्धारित तंत्रों के माध्यम से ऐसे विवादों का समाधान करने की भारत की प्राथमिकता के विपरीत हो सकता है।
  • अनुकूल मंच का चयन : निवेशक वैकल्पिक उपचार उपलब्ध होने के बावजूद कर विवादों के लिए निर्धारित विशिष्ट निपटान तंत्रों को दरकिनार करने हेतु BIT का उपयोग कर सकते हैं।

BIT के अंतर्गत कर विवादों के मामले

  • केयर्न एनर्जी विवाद : केयर्न एनर्जी ने पूर्वव्यापी कर उपायों को लेकर भारत के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की कार्यवाही शुरू की। वर्ष 2020 में मध्यस्थता अधिकरण ने केयर्न के पक्ष में निर्णय दिया।
  • वोडाफोन विवाद : वोडाफोन ने एक भारतीय कंपनी में अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी के अधिग्रहण से संबंधित भारत सरकार के पूर्वव्यापी कर दावे को चुनौती दी।
    • इस विवाद ने कर संबंधी निश्चितता तथा पूर्वव्यापी कराधान के विदेशी निवेश पर पड़ने वाले प्रभाव से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से सामने रखा।

निवेश विवाद निपटान के प्रति अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण

  • संयुक्त राष्ट्र का दृष्टिकोण: निवेश संधियों में सुधार से संबंधित अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं में इस बात पर विचार किया जा रहा है कि क्या निवेश विवाद निपटान की प्रक्रिया से कर उपायों को बाहर रखा जाना चाहिए, साथ ही सरकार की अपमानजनक या भेदभावपूर्ण कार्रवाइयों के विरुद्ध सुरक्षा भी बनाए रखी जानी चाहिए।
  • ब्राज़ील का दृष्टिकोण: ब्राज़ील के निवेश सहयोग एवं सुविधा समझौते सामान्यतः पारंपरिक निवेशक-राज्य मध्यस्थता के बजाय निवेश सुविधा, संयुक्त समितियों और राज्य-से-राज्य विवाद निपटान पर अधिक बल देते हैं।
  • पारस्परिक सहमति प्रक्रिया (MAP): कर संधियों में सामान्यतः MAP का प्रावधान होता है। इसके माध्यम से संबंधित देशों के सक्षम प्राधिकारी कर संधि के प्रावधानों की व्याख्या या उनके अनुप्रयोग से जुड़े विवादों को सुलझाने का प्रयास करते हैं।

आगे की राह

  • कर संबंधी अपवाद को स्पष्ट करना: भारत को यह स्पष्ट रूप से परिभाषित करना चाहिए कि कौन-से कर उपाय निवेश संधियों के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के दायरे से बाहर होंगे। साथ ही, लागू कानूनी दायित्वों का उल्लंघन करने वाली भेदभावपूर्ण कार्रवाइयों के विरुद्ध संरक्षण बनाए रखना चाहिए।
  • घरेलू विवाद निपटान को सुदृढ़ करना: निवेशकों को समयबद्ध निर्णय उपलब्ध कराने के लिए कर अधिकरणों और अपीलीय प्राधिकरणों को पर्याप्त संसाधन एवं क्षमता प्रदान की जानी चाहिए।
  • कर संबंधी निश्चितता में सुधार: स्पष्ट कर कानून, पूर्वानुमेय कार्यान्वयन और मनमाने पूर्वव्यापी परिवर्तनों के विरुद्ध सुरक्षा उपाय विवादों को कम कर सकते हैं। इससे सरकार की नियामक शक्तियों पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाए बिना निवेशकों का विश्वास बढ़ाया जा सकता है।
  • BIT का अनुभवजन्य मूल्यांकन: भारत को समय-समय पर यह आकलन करना चाहिए कि संधियों के अंतर्गत प्रदान किया गया संरक्षण वास्तव में निवेश प्रवाह और निवेशकों के विश्वास को बढ़ाता है या नहीं। इस मूल्यांकन में राजकोषीय एवं नियामक लागतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

निष्कर्ष

  • भारत को ऐसा निवेश ढाँचा विकसित करना होगा, जो कर संप्रभुता से समझौता किए बिना कानूनी स्पष्टता और प्रभावी उपचार उपलब्ध कराए तथा न्याय तक पहुँच में असमानता उत्पन्न न करे।
  • एक न्यायसंगत निवेश व्यवस्था को न केवल निवेशकों को राज्य की मनमानी कार्रवाइयों से सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए, बल्कि सार्वजनिक हित में विनियमन करने की सरकार की शक्ति को भी बनाए रखना चाहिए और सभी करदाताओं के लिए न्याय सुनिश्चित करना चाहिए।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: द्विपक्षीय निवेश संधियों (BITs) का उद्देश्य विदेशी निवेश को बढ़ावा देना है, लेकिन इनके कारण कर संप्रभुता और न्याय तक समान पहुँच को लेकर चिंताएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। इनसे संबंधित चुनौतियों की चर्चा कीजिए तथा निवेशक संरक्षण एवं भारत की नियामक स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करने के उपाय सुझाइए।

स्रोत: IE

 

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