पाठ्यक्रम: GS2/ स्वास्थ्य
संदर्भ
- राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) के 80वें दौर, जिसमें जनवरी से दिसंबर 2025 की अवधि को शामिल किया गया है, ने भारत में चिकित्सा सेवाओं की सुलभता और वहनीयता को लेकर कई प्रश्न उठाए हैं।
चिकित्सा-जनित निर्धनता का दुष्चक्र क्या है?
- चिकित्सा-जनित निर्धनता का दुष्चक्र वह स्थिति है, जिसमें स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाला अत्यधिक व्यय किसी परिवार को निर्धनता की ओर धकेल देता है। इसके बाद आय और बचत में कमी के कारण उस परिवार के लिए समय पर तथा गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा प्राप्त करना कठिन हो जाता है।
- इससे एक दुष्चक्र उत्पन्न होता है, जिसमें बीमारी आर्थिक कठिनाइयों को उत्पन्न करती है और आर्थिक कठिनाइयाँ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को सीमित कर देती हैं।
- चिकित्सा-जनित निर्धनता मानव पूँजी और कार्यबल की उत्पादकता को कम करके आर्थिक विकास को भी बाधित करती है।
- वर्ष 2025 के एक अध्ययन के अनुसार, केवल किशोरों की मृत्यु और बीमारियों के कारण ही लगभग 38 अरब अमेरिकी डॉलर के आर्थिक उत्पादन की हानि हुई । यह वर्ष 2021 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 1.3% के बराबर था।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 80वें दौर के प्रमुख निष्कर्ष
- रोगग्रस्तता की दर्ज दर में वृद्धि: 75वें और 80वें दौर के बीच विगत 15 दिनों में किसी बीमारी से पीड़ित होने की सूचना देने वाले लोगों का अनुपात ग्रामीण भारत में 6.8% से बढ़कर 12.2% तथा शहरी भारत में 9.1% से बढ़कर 14.9% हो गया।
- निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर अत्यधिक निर्भरता: अस्पताल में भर्ती हुए बिना उपचार कराने वाले रोगियों में ग्रामीण भारत के 65.4% और शहरी भारत के 74.8% लोगों ने निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं से उपचार प्राप्त किया।
- उपचार लागत में बड़ा अंतर: अस्पताल में भर्ती हुए बिना उपचार कराने पर औसत प्रत्यक्ष व्यय ग्रामीण सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में ₹304, जबकि ग्रामीण निजी स्वास्थ्य केंद्रों में ₹1,541 था।
- अस्पताल में भर्ती होने की अधिक लागत: प्रसव को छोड़कर, अस्पताल में भर्ती होने पर प्रति व्यक्ति औसत प्रत्यक्ष व्यय ग्रामीण भारत में ₹31,484 और शहरी भारत में ₹38,688 था।
चिकित्सा-जनित निर्धनता का दुष्चक्र क्यों बना रहता है?
- सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमित क्षमता: चिकित्सकों, परिचारिकाओं, दवाओं, रोग-निदान सेवाओं और अस्पताल के बिस्तरों की कमी के कारण रोगियों को निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के पास जाना पड़ता है।
- गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुँच: ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों में विश्वसनीय तथा किफायती चिकित्सा सेवाएँ प्राप्त करने में अधिक कठिनाइयाँ आती हैं।
- आउट ऑफ़ पॉकेट व्यय का अधिक होना (OOPE): रोगियों को चिकित्सकीय परामर्श, दवाओं, जाँचों और अस्पताल में भर्ती होने का व्यय स्वयं वहन करना पड़ता है, जिससे परिवारों की बचत समाप्त हो जाती है।
- स्वास्थ्य बीमा की सीमाएँ: बीमा कवरेज होने मात्र से यह सुनिश्चित नहीं होता कि सूचीबद्ध अस्पताल निकट ही उपलब्ध होगा, समय पर उपचार मिल जाएगा अथवा सभी आवश्यक व्यय बीमा के अंतर्गत आ जाएँगे।
- उपचार में देरी और बीमारी का गंभीर होना: गरीब परिवार व्यय के कारण उपचार टाल देते हैं। इससे अपेक्षाकृत सामान्य और नियंत्रित की जा सकने वाली बीमारियाँ गंभीर तथा अधिक खर्चीली हो जाती हैं।
- आय और आजीविका की हानि: बीमारी के कारण रोगी या उसकी देखभाल करने वाले परिवार के सदस्य काम नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप, ठीक उसी समय घरेलू आय घट जाती है, जब चिकित्सा व्यय बढ़ रहा होता है।
सरकार द्वारा की गई पहलें
- आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY): इस योजना के अंतर्गत द्वितीयक और तृतीयक स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अस्पताल में भर्ती होने पर प्रति परिवार प्रतिवर्ष ₹5 लाख तक का स्वास्थ्य सुरक्षा कवच प्रदान किया जाता है।
- 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी भारतीय नागरिक अपनी आय अथवा सामाजिक-आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना स्वास्थ्य कवरेज के पात्र हैं।
- आयुष्मान भारत का दूसरा प्रमुख घटक आयुष्मान आरोग्य मंदिर (AAM) है, जो लोगों तक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच को अधिक सुलभ बनाता है।
- किफायती दवाएँ और रोग-निदान सेवाएँ:
- प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना: कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करती है।
- अमृत औषधि केंद्र: आवश्यक दवाएँ और चिकित्सा प्रत्यारोपण रियायती कीमतों पर उपलब्ध कराते हैं।
- प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA): वर्ष 2016 में आरंभ इस अभियान के अंतर्गत प्रत्येक महीने की 9 तारीख को गर्भवती महिलाओं को निःशुल्क, सुनिश्चित और गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान की जाती हैं।
- स्वास्थ्य सेवाओं का डिजिटलीकरण:
- स्वस्थ भारत पोर्टल: एकीकृत डिजिटल मंच है, जिसका उद्देश्य विभिन्न राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों को एक ही मंच पर उपलब्ध कराना है।
- ई-संजीवनी: दूरस्थ चिकित्सकीय परामर्श की सुविधा प्रदान करती है और विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों तक पहुँच बेहतर बनाती है।
- गैर-संचारी रोगों की रोकथाम एवं उपचार: हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और आघात जैसे गैर-संचारी रोग भारत में होने वाली कुल मृत्युओं के लगभग 60% के लिए उत्तरदायी हैं।
- इस चुनौती से निपटने के लिए गैर-संचारी रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण का राष्ट्रीय कार्यक्रम (NP-NCD) शीघ्र पहचान, रोग-निदान और उपचार के लिए स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ कर रहा है।
- रोग नियंत्रण एवं लक्षित कार्यक्रम:
- राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम: रोग की पहचान और उपचार कवरेज में सुधार करने के साथ-साथ क्षय रोग की घटनाओं में कमी लाने में सहायक रहा है।
- राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन: वर्ष 2047 तक सिकल सेल रोग के उन्मूलन के उद्देश्य से रोग की जाँच और पहचान पर ध्यान केंद्रित करता है।
- प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम: निःशुल्क डायलिसिस सेवाएँ प्रदान करके रोगियों के आउट ऑफ़ पॉकेट व्यय को कम करता है।

आगे की राह
- क्षेत्रीय असमानताओं का समाधान: स्वास्थ्य संसाधनों को उन ग्रामीण क्षेत्रों और राज्यों की ओर निर्देशित किया जाना चाहिए, जहाँ सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच सीमित है अथवा वर्तमान सुविधाओं पर अत्यधिक दबाव है।
- केवल अवसंरचना नहीं, परिणामों का आकलन: स्वास्थ्य सेवाओं के मूल्यांकन में प्रतीक्षा अवधि, दवाओं की उपलब्धता, उपचार की गुणवत्ता, रोगियों के स्वास्थ्य परिणामों और परिवारों पर पड़ने वाले वित्तीय भार को शामिल किया जाना चाहिए।
- वर्तमान स्वास्थ्य सुविधाओं के संचालन में सुधार: यह सुनिश्चित करना प्राथमिकता होनी चाहिए कि स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त कर्मचारी, आवश्यक दवाएँ, रोग-निदान सेवाएँ, उपकरण और नियमित तथा विश्वसनीय कार्य-समय उपलब्ध हों।
निष्कर्ष
- सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का उद्देश्य केवल बीमा उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को समय पर, किफायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करना होना चाहिए।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ करने और आउट ऑफ़ पॉकेट व्यय को कम करने की आवश्यकता है, ताकि बीमारी किसी परिवार को निर्धनता के दुष्चक्र में न धकेल सके।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत में स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाला आउट ऑफ़ पॉकेट व्यय निर्धनता और वित्तीय असुरक्षा का एक प्रमुख कारण बना हुआ है। इसके कारणों की चर्चा कीजिए तथा इसे कम करने के लिए उपयुक्त उपाय सुझाइए। |
स्रोत: BS