कृषि की आगामी क्रांति: खाद्य सुरक्षा से किसानों की सतत समृद्धि की ओर

पाठ्यक्रम: GS3/कृषि

संदर्भ

  • भारत की कृषि की प्रगति, विद्यमान चुनौतियों तथा सतत विकास और किसानों की आय में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सुधारों का आकलन करना आवश्यक है।

भारतीय कृषि एवं उसका प्रदर्शन

  • कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला बनी हुई है। यह लगभग 46.1% कार्यबल को आजीविका प्रदान करती है तथा देश की खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और समावेशी विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • भारत खाद्यान्न की कमी की स्थिति से आगे बढ़कर अनेक कृषि जिंसों के प्रमुख उत्पादक एवं निर्यातक देशों में शामिल हो गया है।
  • कृषि विकास: वर्ष 2014-15 से 2025-26 के दौरान कृषि क्षेत्र की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर औसतन लगभग 4% वार्षिक रही।
    • कृषि विकास ने खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ किया है, किंतु अधिक तीव्र एवं समावेशी विकास की आवश्यकता बनी हुई है।
  • सिंचाई: सिंचाई के विस्तार में वृद्धि हुई है, हालाँकि कृषि अब भी मानसून की अनिश्चितता और क्षेत्रीय जल-संकट के प्रति संवेदनशील है।
  • कृषि व्यापार: वर्ष 2025-26 में कृषि निर्यात लगभग 53 अरब डॉलर तथा आयात लगभग 40 अरब डॉलर रहा।
    • इन आँकड़ों की अंतिम आधिकारिक व्यापारिक आँकड़ों से पुष्टि किया जाना आवश्यक है।
    • खाद्य तेल और दलहन अब भी प्रमुख आयात श्रेणियों में शामिल हैं।
  • खाद्य सुरक्षा: भारत में चावल और गेहूँ का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है। साथ ही, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के अंतर्गत पात्र लाभार्थियों को निःशुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाता है।

प्रमुख उपलब्धियाँ (2014-2026)

  • खाद्यान्न सुरक्षा: सिंचाई विकास, सरकारी खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने आवश्यक खाद्यान्नों की उपलब्धता को सुदृढ़ किया है।
  • सिंचाई का विकास: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के अंतर्गत ‘हर खेत को पानी’ और ‘प्रति बूँद अधिक फसल’ के माध्यम से सिंचाई के विस्तार तथा जल उपयोग दक्षता को बढ़ावा दिया जाता है।
  • फसल बीमा: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) किसानों को निर्धारित फसल क्षति के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करती है। दावों का समय पर निपटान और प्रभावी बीमा कवरेज का विस्तार अब भी महत्त्वपूर्ण है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा: प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम) सौर ऊर्जा से संचालित कृषि पंपों तथा विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा उत्पादन को प्रोत्साहित करता है।
  • कृषि विविधीकरण: मत्स्यपालन, दुग्ध उत्पादन, कुक्कुटपालन और बागवानी ग्रामीण रोजगार तथा कृषि आय बढ़ाने के अवसर प्रदान करते हैं।

भारतीय कृषि के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

  •  असंतुलित फसल प्रतिरूप: भारत में कृषि उत्पादन और माँग के बीच असंगति विद्यमान है। चावल और गेहूँ का अधिशेष उत्पादन होने के बावजूद दलहन तथा खाद्य तेलों के लिए आयात पर निर्भरता बनी हुई है।
    • सब्सिडी, सुनिश्चित सरकारी खरीद और स्थापित विपणन व्यवस्थाएँ कुछ विशेष फसलों को अधिक प्रोत्साहित करती हैं।
    • जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में धान की अत्यधिक खेती भूजल के क्षरण और पर्यावरणीय अवनति में योगदान देती है।
  •  किसानों की आय में अपर्याप्त वृद्धि: कृषि निवेश की बढ़ती लागत, भूमि जोतों का विखंडन, कीमतों में उतार-चढ़ाव और मोलभाव की कमजोर क्षमता किसानों की लाभप्रदता को सीमित करते हैं।
    • किसानों की वास्तविक आय दोगुनी करने का लक्ष्य अब तक पूरा नहीं हुआ है।
    • कृषि क्षेत्र की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि से प्रत्येक कृषक परिवार की वास्तविक आय में स्वतः वृद्धि सुनिश्चित नहीं होती।
  •  कमजोर कृषि मूल्य शृंखलाएँ: फल, सब्जियाँ, दूध और मछलियाँ शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुएँ हैं।
    • पर्याप्त शीतगृह सुविधाओं, प्रसंस्करण अवसंरचना और बाजारों से संपर्क के अभाव में किसानों को उनकी उपज का उचित प्रतिफल नहीं मिल पाता।
    • जलवायु परिवर्तन, चरम मौसमी घटनाएँ और मृदा स्वास्थ्य में गिरावट कृषि उत्पादकता के लिए अतिरिक्त खतरे उत्पन्न करते हैं।

अध्ययन: गुजरात का कृषि रूपांतरण (2001-2014)

  • गुजरात ने इस अवधि के दौरान कथित तौर पर 9% से अधिक की वार्षिक कृषि वृद्धि दर प्राप्त की।
  • इस रूपांतरण के प्रमुख कारक निम्नलिखित थे:
    • जल प्रबंधन: चेक डैमों के निर्माण और नर्मदा के जल तक बेहतर पहुँच ने सिंचाई के अवसरों का विस्तार किया।
    • विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति: कृषि एवं घरेलू विद्युत आपूर्ति के लिए अलग-अलग फीडर की व्यवस्था ने विद्युत आपूर्ति के बेहतर प्रबंधन में सहायता की।
    • ग्रामीण संपर्क: बेहतर सड़कों ने खेतों और बाजारों के बीच संपर्क को सुदृढ़ किया।
    • कृषि प्रसार सेवाएँ: कृषि महोत्सव के माध्यम से किसानों को सरकारी अधिकारियों, कृषि विशेषज्ञों और आधुनिक प्रौद्योगिकियों से जोड़ा गया।
    • प्रौद्योगिकी का अंगीकरण: भारत में वर्ष 2002 में व्यावसायिक खेती के लिए अनुमोदित बीटी कपास ने गुजरात के कपास क्षेत्र के विस्तार में योगदान दिया।
    • भारत के लिए प्रमुख सीख: सिंचाई, विद्युत, सड़कों, प्रौद्योगिकी और कृषि प्रसार सेवाओं में समन्वित निवेश कृषि विकास को गति दे सकता है। हालाँकि, नीतियों का निर्धारण क्षेत्रीय परिस्थितियों और पारिस्थितिक सीमाओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

आगे की राह: सतत कृषि अर्थव्यवस्था का निर्माण

  • फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन: उपयुक्त मूल्य समर्थन, सरकारी खरीद और लक्षित प्रोत्साहनों के माध्यम से दलहन एवं तिलहन की सापेक्ष लाभप्रदता बढ़ाई जानी चाहिए।
    • अप्रभावी कृषि निवेश सब्सिडी को कम जल उपयोग करने वाली फसलों को अपनाने वाले किसानों की सहायता के लिए पुनर्निर्देशित करने पर विचार किया जा सकता है।
    • हरियाणा और पंजाब सहित जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में ऐसी प्रोत्साहन योजनाओं का प्रायोगिक क्रियान्वयन किया जाना चाहिए। इसके साथ भूजल संरक्षण के मापनीय लक्ष्य भी निर्धारित किए जाने चाहिए।
  • कृषि-सौर ऊर्जा प्रणालियों को बढ़ावा: कृषि-सौर ऊर्जा प्रणाली के अंतर्गत उपयुक्त ऊँचाई और अंतराल पर सौर पैनल लगाकर एक ही भूमि पर फसल उत्पादन तथा सौर ऊर्जा उत्पादन किया जाता है।
    • व्यवहार्य कृषि-सौर ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए उपयुक्त सब्सिडी और लाभकारी विद्युत खरीद व्यवस्थाओं के माध्यम से पीएम-कुसुम योजना को अनुकूलित किया जा सकता है।
    • इससे किसान अन्नदाता के साथ-साथ ऊर्जादाता भी बन सकते हैं।
  • उच्च मूल्य वाली कृषि को सुदृढ़ करना: दुग्ध उत्पादन, मत्स्यपालन, कुक्कुटपालन, बागवानी और खाद्य प्रसंस्करण का विस्तार किया जाना चाहिए।
    • शीत शृंखला, भंडारण सुविधाओं, किसान उत्पादक संगठनों और निर्यात बाजारों तक पहुँच में सुधार किया जाना चाहिए।
    • कृषि अनुसंधान, डिजिटल माध्यमों से कृषि प्रसार सेवाओं और संस्थागत ऋण को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
  • जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा: सूक्ष्म सिंचाई, वर्षा जल संचयन और जलग्रहण क्षेत्र विकास का विस्तार किया जाना चाहिए।
    • मृदा संरक्षण, जलवायु-अनुकूल फसल किस्मों तथा जल के कुशल उपयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
    • कृषि प्रोत्साहनों को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में होने वाले मापनीय सुधारों से जोड़ा जाना चाहिए।

निष्कर्ष

  • भारत को अनाज में आत्मनिर्भरता से आगे बढ़कर किसानों की आय में वृद्धि, पोषण सुरक्षा और पारिस्थितिक स्थिरता पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
  • फसल विविधीकरण, सुदृढ़ कृषि मूल्य शृंखलाएँ और नवीकरणीय ऊर्जा कृषि को अधिक लाभकारी एवं जलवायु-सहिष्णु बना सकते हैं। इससे विकसित भारत 2047 के व्यापक लक्ष्य की प्राप्ति में सहायता मिलेगी।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: भारतीय कृषि के समक्ष विद्यमान प्रमुख चुनौतियों की विवेचना कीजिए तथा पर्यावरणीय सततता सुनिश्चित करते हुए किसानों की आय में वृद्धि के उपाय सुझाइए। 

स्रोत: IE

 

Other News

पाठ्यक्रम: GS2/शासन संदर्भ सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को लागू हुए 21 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस अवसर पर पारदर्शिता संबंधी लेखा-परीक्षणों और सूचना तक सार्वजनिक पहुँच में सुधार के बावजूद स्वैच्छिक सूचना प्रकटीकरण में बनी हुई कमियों पर ध्यान केंद्रित हुआ है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/भारतीय अर्थव्यवस्था; औद्योगिक नीति और आर्थिक विकास संदर्भ वर्ष 2026 में, जब ‘मेक इन इंडिया’ पहल अपने 12वें वर्ष में प्रवेश कर रही है, तब विनिर्माण, निर्यात और रोजगार पर इसके प्रभावों का आकलन एक बार पुनः भारत के औद्योगिक रूपांतरण को लेकर चर्चा का विषय बन गया है।...
Read More

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीयसंबंध; GS 3/जलवायु परिवर्तन संदर्भ भारत की वर्ष 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता ने एकतरफा जलवायु-संबद्ध व्यापार उपायों, विशेषकर यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM), तथा साझा कार्बन लेखांकन मानकों की आवश्यकता पर बहस को पुनः गति प्रदान की है। जलवायु एजेंडा और वैश्विक व्यापार के बारे में ...
Read More

पाठ्यक्रम: GS2/वैश्विक संस्थान; GS3/स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे संदर्भ हाल ही में, न्यूयॉर्क में आयोजित महामारी की रोकथाम, तैयारी और प्रतिक्रिया (PPPR) पर संयुक्त राष्ट्र की उच्चस्तरीय बैठक (HLM) में भारत ने वैश्विक समन्वय को सुदृढ़ करने का समर्थन किया। साथ ही, भारत ने समानता, राष्ट्रीय संप्रभुता और सुदृढ़ स्वास्थ्य प्रणालियों...
Read More

पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/पर्यावरण संदर्भ हाल ही में नई दिल्ली में जलवायु-लचीले जल प्रबंधन पर केंद्रित 9वें भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह (IIWW) का आयोजन किया गया, जिसमें भारत के जल तक पहुँच के विस्तार से आगे बढ़कर सतत, दक्ष और लचीली जल प्रणालियाँ सुनिश्चित करने की दिशा में हुए संक्रमण को...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा बुनियादी ढांचा संदर्भ हाल ही में, भारत ने 300 GW गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित क्षमता का आँकड़ा पार कर लिया है, जो कुल विद्युत उत्पादन क्षमता का 54% से अधिक है। किंतु तीव्र गति से बढ़ रही परिवर्तनशील नवीकरणीय ऊर्जा को विद्युत प्रणाली में समाहित करना वितरण क्षेत्र...
Read More

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन संदर्भ भारत निर्वाचन आयोग की हालिया आलोचना ने इसकी वैधानिकता, जवाबदेही और संवैधानिक औचित्य से जुड़े प्रश्नों को उत्पन्न कर दिया है। पृष्ठभूमि निर्वाचक नामावली में हेरफेर: मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चिंताएँ व्यक्त की गई हैं। विशेष रूप से कुछ क्षेत्रों...
Read More
scroll to top